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बुधवार, 21 जनवरी 2026

ज़रूरी है युद्ध—


ज़रूरी है युद्ध
किसी ज़मीन के लिए नहीं,
किसी झंडे के लिए नहीं,
ज़रूरी है युद्ध
उस थाली के ख़िलाफ़
जिसमें रोज़
अन्याय परोसा जाता है
और कहा जाता है
चुप रहो,
यही राष्ट्र है।

ज़रूरी है युद्ध

उस भाषा के ख़िलाफ़
जो हत्या को
सामान्य क्षति
और भूख को
संयोगकहती है।

सवाल यहाँ बदतमीज़ी हैं,
असहमति गुनाह,
और चुप्पी
देशभक्ति।

हम तालियाँ बजाते रहे
और आकाश बिकता रहा।
हम चुप रहे
और वही
सबसे बड़ा अपराध था।

याद रखो
तानाशाही
तालियों से पैदा होती है,
और आज़ादी
एक अकेली
काँपती आवाज़ से।

ज़रूरी है युद्ध
क्योंकि शांति के नाम पर
हर असहमत आवाज़ के सामने
हादसों के गड्ढे तैनात किये जा रहे हैं.
इसलिए
यह कोई नारा नहीं,
कोई उत्सव नहीं।

बस इतना जान लो
ज़रूरी है
यह युद्ध।

सोमवार, 19 जनवरी 2026

'ना' को बाहर आने दो

 

थाली-ताली बहुत बजा ली,

अब असली स्वर को आने दो,

जो भाषा सच को निगल गई,

उस भाषा को मर जाने दो।

 

अकेले होने का डर तज दो,

तुम भीड़ में भी तन्हा हो,

अब काँपते होंठों से ही सही,

पर 'ना' को बाहर आने दो।

 

जो मस्तक झुकते आए हैं,

अब उन्हें जरा तन जाने दो,

जो न्याय की बाँसुरी टूट गई,

उसे फिर से स्वर बन जाने दो।

 

बाज़ार सजा है झूठों का,

तुम अपना सच ले अड़ जाओ,

इतिहास लिखे जो कायरता,

उस पन्ने को फट जाने दो।

 

ज़मीर की सूखी धरती पर,

विद्रोह के अंकुर फूटने दो,

जो ज़ंजीरें रूह को जकड़े हैं,

उन कड़ियों को अब टूटने दो।

 

मत पूछो अंजाम क्या होगा,

बस कदम को आगे बढ़ने दो,

जो राख दबी है सीने में,

उसे शोला बनकर जलने दो।

बुधवार, 14 जनवरी 2026

"अनावश्यक मनुष्य"

 

औज़ारों और मशीनों के पास

नहीं होते

अपने दिमाग़,

दिल और विवेक।

वे अनभिज्ञ रहते हैं परिणाम से,

चलते हैं संकेतों परनेपथ्य से।

 

नेपथ्य में मीटिंग्स होती हैं,

नीतियाँ गढ़ी जाती हैं,

और जीवित संघर्षों को

स्लाइडों में बदल दिया जाता है।

 

धीरे-धीरे इंसान को भी

प्रशिक्षित किया गया

सोचना प्रोटोकॉल से बाहर न जाए,

महसूस करना अनप्रोडक्टिव न लगे,

और विवेक

डेटा की तरह मापा जा सके।

 

अब औज़ार

और आदमी में अंतर बस इतना है

एक में बोल्ट जड़े हैं, दूसरे में भय।

दोनों को सौंप दिए जाते हैं

पूर्वनिर्धारित लक्ष्य,

और जो लक्ष्य से हटे

वहअनुशासनहीनकहलाता है,

चाहे वह मनुष्य ही क्यों न हो।

 

सब कुछ ठीक चलता रहेगा।

बस,

इंसान और उसकी ज़रूरत

खत्म हो जाएगी।

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

Unsent — दिल का ड्राफ्ट

 

मैंने अपने एहसासों को
हर रात
ईमेल के ज़रिये भेजा है तुम्हें
बिना Subject के,
ताकि तुम सीधे दिल तक पहुँच सको।

हर शब्द लिखते वक़्त
उँगलियाँ काँपती थीं,
जैसे Send बटन
किसी इकरार का दरवाज़ा हो।

मैंने लिखा
आज चाँद कुछ ज़्यादा ही
तुम्हारी तरह लग रहा है,
मैंने लिखा
तुम्हारी ख़ामोशी भी
मेरे दिन भर की थकान उतार देती है।

पर हर बार
मेरे एहसास
रास्ते में ही ठहर गए
क्योंकि तुम्हारा Inbox
पहले से भरा हुआ था
नामों से,
वादों से,
और शायद
उन ख़्वाबों से
जिनमें मेरा ज़िक्र नहीं था।

मैंने फिर भी भेजना नहीं छोड़ा,
क्योंकि प्रेम
Reply का इंतज़ार नहीं करता,
वह तो बस
पहुँचने की उम्मीद पर
ज़िंदा रहता है।

शायद किसी दिन
तुम पुराने मेल्स हटाओ,
कुछ यादें Archive में डालो,
और तब
मेरे एहसासों की कोई पंक्ति
अनायास ही खुल जाए

तब तुम पढ़ोगी
कि कोई था
जो तुम्हें पाने की नहीं,
सिर्फ़
तुम तक पहुँचने की
कोशिश करता रहा।

"वो जो 'Drafts' में रह गए जज्बात थे,

उन्हें भी पता था कि

मंज़िल शायद नहीं मिलेगी।

पर कलम ने हार नहीं मानी,

क्योंकि कुछ प्रेम कहानियाँ

मुकम्मल होने के लिए नहीं,

बस महसूस किए जाने के लिए लिखी जाती हैं।"

 

और अगर कभी
तुम्हें लगे
कि किसी अनजान रात
दिल बेवजह भारी है
समझ लेना,
कोई मेल, बिना खुले ही
तुम्हारे भीतर
पहुँच गया था।

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

'मीज़ान-ए-फ़न' ..... (ग़जल)

 

बहर-ओ-क़ाफ़िया की उलझन में रहा मैं इस क़दर,

मेरे हाथों से ही निकलकर इक ग़ज़ल चली गई।

 

लफ़्ज़ ही तौले किए मीज़ान-ए-फ़न पर उम्र भर,

वक़्त की ठहरी हुई वो हर इक हलचल चली गई।

 

ढूँढते ही रह गए माअनी हम हर इक शेर में,

जो हक़ीक़त में थी कहनीबात टल चली गई।

 

सोचा था ठहरेगी वो दो पल यहाँ मेरे पास ही,

आँख झपकी और वो मोहक झलक चली गई।

 

जो अनकहा थाबस वही ज़िंदा रहा है आज भी,

जो कही थी हमनेवो बनके सदा चली गई।

 

'वर्माअपने फ़न को तो हमने बचा ही लिया मगर,

ज़िंदगी जो हाथ में थीबस वो कल चली गई।



  • बहर-ओ-क़ाफ़िया = 'वह, जो अनुसरण करता है' (ग़जल के नियमो का अनुसरण)
  • लफ़्ज़ = शब्द
  • मीज़ान-ए-फ़न = कला का संतुलन
  • माअनी  = मायने

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

अरावली: एक असहज सवाल

 

अब तक सोये बुलडोज़रों को
आख़िर काम मिलेगा,
अरावलीतुझे अब
एक नया नाम मिलेगा।

जिसे पहाड़ कहा जाता था
वह प्लॉट कहलायेगा,
हर चोटी का कद अब
फ़ाइल में नापा जायेगा।

तू अपनी ऊँचाई खुद
कभी क्यों नहीं नापता?
तू सियासतों की फितरत
अब तक क्यों नहीं भापता?

कुर्सी से दिखता जो ऊँचा
वही तुझे महान लगे,
धरती की चीखें तुझे
अब तक क्यों अनजान लगे?

यह विकास नहीं
यह माप बदलने की साज़िश है,
जहाँ बुलडोज़र सच है
और पहाड़ एक बार-बार उठता
असहज सवाल है।


याद रख!
इतिहास ऊँचाई नहीं पूछेगा,
इतिहास नीयत नापेगा।

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

जिस्म की फसल

 

उसके बच्चे भूखे थे।
और सत्ता
रोज़ नए नारे बो रही थी।


वह किसान
बीज बोता गया
मिट्टी, पानी, मौसम
सबसे संधि करता गया

पर घोषणा-पत्र तो उगे
फसल नहीं उगे।


उसके बच्चे भूखे थे
उसने अपना हाथ बो दिया
पसीने का टैक्स भरा
मेहनत को मतदान बनाया
पर फसल नहीं उगे।

क्योंकि यहाँ वोट की गिनती होती है
भूख की नहीं!


वह पैर बोता गया
नौकरियाँ! शहर! आवाज़!
पर फसल नहीं उगने थे
नहीं उगे!

क्योंकि रोज़गार की रिपोर्ट में
किसान का नाम नहीं आता!

अब वह अपने जिस्म का हर हिस्सा
लोकतंत्र के नाम पर बो रहा था!
आवाज़ बोई— 

तो देशद्रोह लगा।
माँग बोई— 

तो एंटी-नेशनल हो गया!

उसने धरती में
खुद को गाड़ दिया।
हड्डियाँ बो दीं
लहू बो दिया
अस्तित्व बो दिया।

और उसी वक़्त
फसल लहलहाने लगी
बाज़ार खिल उठा
सत्ताएँ मुस्कुराईं
शेयर-भाव चढ़ गए
राष्ट्रवाद का पोस्टर चमक गया!


लेकिन बच्चों की थाली
आज भी थे खाली

फिर भी
मंचों पर भाषण गूंजे:
किसान हमारी रीढ़ है!

वह ज़िंदा थाइसलिए सवाल पूछता था,
मर गयातो आकड़ा बन गया!

वह भूखा थाइसलिए बोझ था,
मर गयातो सौदा हो गया!


उसकी मौत पर भीड़ का मुनाफ़ा है।
और अगर तुम्हें ग़ुस्सा नहीं आया
तो समझ लो,
तुम भीकिसी की फसल हो!

सच तो यह है कि
समाज की फसल
ज़िंदगी बोकर ही उगती है!

शनिवार, 13 दिसंबर 2025

कितने 'तुम' --

 

कभी सोचा है तुमने
कितने आईने खड़े हो जाते हैं
एक-दूसरे के आमने-सामने,
जब तुम
खुद को निहारती हो?

कभी देखा है तुमने
आईने को शरमाते हुए
जब तुम हल्के से
एक आँख दबाती हो,
और प्रतिबिम्ब
धीरे-धीरे मुस्कुरा उठता है?

कौन खींचेगा यह रेखा
कि तुम आईना देखती हो
या आईना
तुम्हें देख रहा होता है?

सच तो यह है कि
आईना हर रोज़
तुम्हारा इंतज़ार करता है
तुम्हारी आँखों के आईने में
खुद को देखने के लिए।

और क्या देखा है तुमने
आईने को बिखरते हुए
ठीक उसी क्षण,
जब तुम
मुड़कर चली जाती हो।


@ रूमानियत भी जरूरी है. 

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

लहरों से डरता हुआ तैराक ...


मत पूछिए ये दिल चाक-चाक क्यूँ है
एहसासों को पत्थर की पोशाक क्यूँ है?

हालात का तर्जुमा तुम्हारी निगाहों में है
फिर दर्द छुपाने पुरजोर फ़िराक क्यूँ है?

तुम्हारे आंकड़ों पर यकीन करें भी कैसे?
जहर भरा आखिर फिर खुराक क्यूँ है?

माना परिंदे छोड़े गए हैं उड़ान भरने को
नकेल से बंधी फिर इनकी नाक क्यूँ है?

खुद ही संभालो मत मांगो सहारा तुम
लहरों से डरा हुआ भला तैराक क्यूँ है?

रविवार, 6 नवंबर 2016

खुशबू

जिंदगी की तलाश में
वह बैठा रहता है
शहंशाही अंदाज़ लिए 
कूड़े के ढेर पर,
नाक पर रूमाल रखे
आते-जाते लोगो को
निर्विकार भाव से
देखते हुए गुनगुनाता है
‘कुण्डी मत खड़काना राजा’
सिर्फ आज की नहीं
यह तो है
रोज की कहानी
कालोनी से आने वाला
कूड़े से लदा ट्रक
जब खाली होकर चला जाएगा
वह सड़ते हुए
रोटियों की ‘खुशबू’ से सराबोर हो
एक और दिन के लिए
जिंदगी पायेगा

कितना फर्क हैं ना
हमारी खुशबू और 
उसकी खुशबू में 

सोमवार, 2 अगस्त 2010

कबूतर! तुम कब सुधरोगे ? ~~



कबूतर!
तुम कब सुधरोगे ?
आख़िर तुम क्यों कभी
मन्दिर के अहाते में उतरते हो
तो कभी
मस्ज़िद के आले में ठहरते हो?
क्या तुम्हें पता नहीं है
इनका आपस में
कोई वास्ता नहीं है,
मन्दिर से मस्ज़िद तक
या मस्ज़िद से मन्दिर तक
कोई रास्ता नहीं है.

.
अरे! अगर तुममें
इतनी भी अक्ल नहीं है,
तो क़्यों नहीं तुम हमसे सीखते हो?
क्यों नहीं तुम भी रट लेते हो
हमारी बौद्धिक पुस्तकों की भाषा,
जिनमें हमें बताया गया है-
मन्दिर में हिन्दू पूजा करते हैं,
मस्ज़िद में मुसलमाँ सजदा करते हैं
जिनमें यह नहीं बताया गया है
ईद, होली भारत का प्रमुख त्यौहार है
वरन जो बतलाता है
ईद मुसलमानों का त्यौहार है
और
होली, दीवाली हिन्दुओं का है पर्व.

.
अरे! हमसे सीखो
हम अपना धर्म बचाने के लिए
क्या नहीं करते हैं,
कभी बारूद बनकर मारते हैं
तो कभी बारूद से मरते हैं।
एक तुम हो-
जिसे आनी चाहिए शरम
तुम्हें अब तक ये सलीका नहीं आया
कि पहचान सको अपना धरम.
तुम कहाँ थे जब
मन्दिर हथौड़ा लिए खड़ा था,
मस्ज़िद ख़ंजर लिये
हर राह में अड़ा था?
तुम तो सबक लो
हमारी उन्नत सभ्यता से
हम बेशक खुद को नहीं जानते हैं,
पर अपना-अपना धरम
बखूबी पहचानते हैं.

.
अरे तुम तो
उस दिन से डरो
जब तुम मरोगे!
उस दिन भी क्या तुम
यही करोगे?
कबूतर तुम कब सुधरोगे?