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गुरुवार, 29 जनवरी 2026

चुप भी इक गुनाह है (गज़ल)

 

लुटेरों के हाथों में अब है कमान,

डरी सहमी बैठी है हर इक दुकान।

 

जहाँ खोद बुनियाद सब चुप खड़े,

हैं लरज़ते हुए आज खामोश मकान।

 

गए ढूँढने जो यहाँ क़ातिलों को,

मिला उनके हाथों में क़त्ल-ओ-सामान।

 

थी बस्ती कभी ख़्वाब की रौशनी,

बना मोड़ हर आज तो श्मशान।

 

उठी जब भी ज़ुल्मों के ख़िलाफ़ उँगली,

बदलने लगे चेहरे सब हुक्मरान।

 

जहाँ लोग वहशी, वहीं ख़ौफ़ है,

थमी हर ढलान और थमा तूफ़ान।

 

गुनाह है ये 'वर्मा' कि तुम चुप रहो,

जले शहर और सब को है इत्मिनान।


लरज़ते = कांपते 

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

"स्पर्शबिंदु" - "The Tangent"


मैं जानता हूँ—
तुम मुझे समग्र रूप से
स्पर्शित नहीं कर सकती
क्योंकि
तुम एक सरल रेखा हो
और मैं—वृत्त।


तुम्हारा स्पर्श
किसी एक बिंदु पर
आकर ठहर जाता है,
जबकि मेरा अस्तित्व
घूमता रहता है
अपने ही केंद्र के चारों ओर।

तुम आगे बढ़ती हो
दिशा के भरोसे,
मैं लौट आता हूँ
हर बार
खुद तक।


हम मिलते हैं—
संभवतः
किसी स्पर्शबिंदु पर,
पर वहीं
हमारी असहमति भी जन्म लेती है—
तुम आगे बढ़ जाना चाहती हो,
और मैं
उस क्षण को
पूरा करना चाहता हूँ।


इसलिए
तुम मुझे छू तो सकती हो,
समेट नहीं सकती—
जैसे रेखा
वृत्त को
समझ तो ले,
पर बन नहीं सकती।

चलो, एक सहमति बनाएँ कि
हम न रेखा रहें, न वृत्त—
हम एक नया आयाम बनें,
जहाँ ठहरना भी गति हो,
और भटकना भी
एक मंज़िल।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

प्यास का प्रमाण-पत्र

 

गंगा—

तुम
अपनी निश्छल लहरों के संग
हर पत्थर को छूती
आगे बढ़ती रहीं।

तुमने
कभी नहीं पूछा—
किस जात का है यह पत्थर,
किस धर्म का है यह किनारा।

तुम
बस बहती रहीं।

लेकिन—
हरिद्वार आते-आते
तुम
मज़हबी कैसे हो गईं, गंगा?


यहाँ—
तुम्हारे ही किनारों ने
कब
और क्यों
उठा लीं तख़्तियाँ—
“यहाँ ग़ैर-हिन्दू का प्रवेश वर्जित है!”


गंगा!
यह तुम्हारी भाषा तो नहीं थी।

क्या कभी
तुम्हारे किनारों को
तख़्तियाँ थमाने वालों ने
उन नालों का हिसाब दिया—
जो तुम्हारे अस्तित्व को
गंदा करते हैं?

क्या कभी उन्होंने बताया
कि उन नालों में
किस-किस धर्म का
मल-मूत्र
तुम्हें सौंपा जा रहा है?

क्या जल भी
अब पहचान माँगता है?
क्या प्यास
अब प्रमाण-पत्र देखती है?

अगर ऐसा है—
तो फिर बहना छोड़ दो, गंगा।

क्योंकि
जो नदी
मनुष्य से छोटी हो जाए,
वह नदी नहीं रहती—
सिर्फ़
एक दीवार
बन जाती है।

बुधवार, 21 जनवरी 2026

ज़रूरी है युद्ध—


ज़रूरी है युद्ध—
किसी ज़मीन के लिए नहीं,
किसी झंडे के लिए नहीं,
ज़रूरी है युद्ध
उस थाली के ख़िलाफ़
जिसमें रोज़
अन्याय परोसा जाता है
और कहा जाता है—
चुप रहो,
यही राष्ट्र है।

ज़रूरी है युद्ध

उस भाषा के ख़िलाफ़
जो हत्या को
“सामान्य क्षति”
और भूख को
“संयोग” कहती है।

सवाल यहाँ बदतमीज़ी हैं,
असहमति गुनाह,
और चुप्पी—
देशभक्ति।

हम तालियाँ बजाते रहे
और आकाश बिकता रहा।
हम चुप रहे—
और वही
सबसे बड़ा अपराध था।

याद रखो—
तानाशाही
तालियों से पैदा होती है,
और आज़ादी
एक अकेली
काँपती आवाज़ से।

ज़रूरी है युद्ध—
क्योंकि शांति के नाम पर
हर असहमत आवाज़ के सामने
हादसों के गड्ढे तैनात किये जा रहे हैं.
इसलिए—
यह कोई नारा नहीं,
कोई उत्सव नहीं।

बस इतना जान लो—
ज़रूरी है
यह युद्ध।

सोमवार, 19 जनवरी 2026

'ना' को बाहर आने दो

 

थाली-ताली बहुत बजा ली,

अब असली स्वर को आने दो,

जो भाषा सच को निगल गई,

उस भाषा को मर जाने दो।

 

अकेले होने का डर तज दो,

तुम भीड़ में भी तन्हा हो,

अब काँपते होंठों से ही सही,

पर 'ना' को बाहर आने दो।

 

जो मस्तक झुकते आए हैं,

अब उन्हें जरा तन जाने दो,

जो न्याय की बाँसुरी टूट गई,

उसे फिर से स्वर बन जाने दो।

 

बाज़ार सजा है झूठों का,

तुम अपना सच ले अड़ जाओ,

इतिहास लिखे जो कायरता,

उस पन्ने को फट जाने दो।

 

ज़मीर की सूखी धरती पर,

विद्रोह के अंकुर फूटने दो,

जो ज़ंजीरें रूह को जकड़े हैं,

उन कड़ियों को अब टूटने दो।

 

मत पूछो अंजाम क्या होगा,

बस कदम को आगे बढ़ने दो,

जो राख दबी है सीने में,

उसे शोला बनकर जलने दो।

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

तुम : एक संभावना (गज़ल)

 

तुम आसपास कहीं नहीं, फिर भी हवा हो क्या
ख़यालों की सरगोशी की तुम सदा हो क्या

शाख़-ए-वजूद हिल उठे, एहसास जी उठें
कुछ अधमरे जज़्बातों की तुम दवा हो क्या

लबों से कुछ कहो न कहो, आँखें कह गईं
बिन छुए दिल को मिल जाए जो, वो दुआ हो क्या

नींदों के दरमियाँ तुम सपनों में आ गईं
बिखरी हुई सी ज़ुल्फ़ों की तुम अदा हो क्या

जिस दर्द से गुज़र गईं, वो दर्द ही न रहा
पत्थर को भी पिघला दे, ऐसी रवा हो क्या

नब्ज़ देखी नहीं तुमने, हाल कह दिया
मेरे हर टूटे लफ़्ज़ की तुम पुनर्नवा हो क्या

“वर्मा” जो ठंड में भी सुलगता रहा चुपचाप
उस सुलगन को संभाले जो, वो तवा हो क्या

बुधवार, 14 जनवरी 2026

"अनावश्यक मनुष्य"

 

औज़ारों और मशीनों के पास

नहीं होते—

अपने दिमाग़,

दिल और विवेक।

वे अनभिज्ञ रहते हैं परिणाम से,

चलते हैं संकेतों पर— नेपथ्य से।

 

नेपथ्य में मीटिंग्स होती हैं,

नीतियाँ गढ़ी जाती हैं,

और जीवित संघर्षों को

स्लाइडों में बदल दिया जाता है।

 

धीरे-धीरे इंसान को भी

प्रशिक्षित किया गया—

सोचना प्रोटोकॉल से बाहर न जाए,

महसूस करना अनप्रोडक्टिव न लगे,

और विवेक –

डेटा की तरह मापा जा सके।

 

अब औज़ार

और आदमी में अंतर बस इतना है—

एक में बोल्ट जड़े हैं, दूसरे में भय।

दोनों को सौंप दिए जाते हैं

पूर्वनिर्धारित लक्ष्य,

और जो लक्ष्य से हटे—

वह “अनुशासनहीन” कहलाता है,

चाहे वह मनुष्य ही क्यों न हो।

 

सब कुछ ठीक चलता रहेगा।

बस,

इंसान और उसकी ज़रूरत

खत्म हो जाएगी।

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

Unsent — दिल का ड्राफ्ट

 

मैंने अपने एहसासों को
हर रात
ईमेल के ज़रिये भेजा है तुम्हें—
बिना Subject के,
ताकि तुम सीधे दिल तक पहुँच सको।

हर शब्द लिखते वक़्त
उँगलियाँ काँपती थीं,
जैसे Send बटन
किसी इकरार का दरवाज़ा हो।

मैंने लिखा—
आज चाँद कुछ ज़्यादा ही
तुम्हारी तरह लग रहा है,
मैंने लिखा—
तुम्हारी ख़ामोशी भी
मेरे दिन भर की थकान उतार देती है।

पर हर बार
मेरे एहसास
रास्ते में ही ठहर गए—
क्योंकि तुम्हारा Inbox
पहले से भरा हुआ था
नामों से,
वादों से,
और शायद
उन ख़्वाबों से
जिनमें मेरा ज़िक्र नहीं था।

मैंने फिर भी भेजना नहीं छोड़ा,
क्योंकि प्रेम
Reply का इंतज़ार नहीं करता,
वह तो बस
पहुँचने की उम्मीद पर
ज़िंदा रहता है।

शायद किसी दिन
तुम पुराने मेल्स हटाओ,
कुछ यादें Archive में डालो,
और तब
मेरे एहसासों की कोई पंक्ति
अनायास ही खुल जाए—

तब तुम पढ़ोगी
कि कोई था
जो तुम्हें पाने की नहीं,
सिर्फ़
तुम तक पहुँचने की
कोशिश करता रहा।

"वो जो 'Drafts' में रह गए जज्बात थे,

उन्हें भी पता था कि –

मंज़िल शायद नहीं मिलेगी।

पर कलम ने हार नहीं मानी,

क्योंकि कुछ प्रेम कहानियाँ –

मुकम्मल होने के लिए नहीं,

बस महसूस किए जाने के लिए लिखी जाती हैं।"

 

और अगर कभी
तुम्हें लगे
कि किसी अनजान रात
दिल बेवजह भारी है—
समझ लेना,
कोई मेल, बिना खुले ही
तुम्हारे भीतर
पहुँच गया था।

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

'मीज़ान-ए-फ़न' ..... (ग़जल)

 

बहर-ओ-क़ाफ़िया की उलझन में रहा मैं इस क़दर,

मेरे हाथों से ही निकलकर इक ग़ज़ल चली गई।

 

लफ़्ज़ ही तौले किए मीज़ान-ए-फ़न पर उम्र भर,

वक़्त की ठहरी हुई वो हर इक हलचल चली गई।

 

ढूँढते ही रह गए माअनी हम हर इक शेर में,

जो हक़ीक़त में थी कहनी, बात टल चली गई।

 

सोचा था ठहरेगी वो दो पल यहाँ मेरे पास ही,

आँख झपकी और वो मोहक झलक चली गई।

 

जो अनकहा था, बस वही ज़िंदा रहा है आज भी,

जो कही थी हमने, वो बनके सदा चली गई।

 

'वर्मा' अपने फ़न को तो हमने बचा ही लिया मगर,

ज़िंदगी जो हाथ में थी, बस वो कल चली गई।



  • बहर-ओ-क़ाफ़िया = 'वह, जो अनुसरण करता है' (ग़जल के नियमो का अनुसरण)
  • लफ़्ज़ = शब्द
  • मीज़ान-ए-फ़न = कला का संतुलन
  • माअनी  = मायने

मंगलवार, 30 दिसंबर 2025

संस्कारों में लिपटी रोटी | Bread Wrapped in Ritual

आदमकद होती जा रही हैं
भूखों की शक्लें—
ढक दो रोटियाँ
संस्कारों से।

तारों के सपने दिखाओ,
इन्हें इनके अपने दिखाओ—
उलझनें और बड़ी करो,
हिन्दू–मुस्लिम में उलझाओ।

इनकी मुट्ठियाँ पकड़कर
थोड़ी कर दो ऊँची,
बना दो इन्हें—
तख़्तियाँ और कूची।

ये गुमराह हो जाएँगे—
कपड़े पहना दो खादी के,
तमगे टाँग दो
सजग राष्ट्रवादी के।

जब ये पूछें—
“कहाँ हैं रोटियाँ?”
कहना—
“तुम्हें रोटियों की पड़ी है?
देखते नहीं—
देश और तुम्हारा धर्म
ख़तरे में है!”

जब सड़कों पर शोर बढ़े—
नया कोई उत्सव गढ़ देना,
इतिहास की धूल झाड़कर
‘गौरव’ की बातें जड़ देना।

और जब ये माँगें ‘इंसाफ़’—
तुम ‘इंतकाम’ की आग लगा देना,
कह देना—
“तुम सिपाही हो देश के,”
और त्याग का
एक भारी पत्थर
सीने पर रख देना।