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शनिवार, 14 मार्च 2026

तालियों से सच बदलता नहीं ---


दर्द के गाँव में ठहर कर देखिये
मौत से पहले ही मर कर देखिये

 

भूख की आँखों में जलते प्रश्न हैं,
उनसे आँखें आप भर कर देखिये

 

तालियों से सच बदलता ही नहीं,
आईनों से भी गुज़र कर देखिये

 

रात कितनी भी सियाही ओढ़ ले,
एक दीया फिर भी धर कर देखिये

 

सिंहासन काँपेगा इक दिन यक़ीनन,
जनता में जाकर उतर कर देखिये

 

‘वर्मा’ सच बोल दे तो चुभेगा ज़रूर,

कलेजे पे पत्थर को धर कर तो देखिये

रविवार, 6 नवंबर 2016

खुशबू

जिंदगी की तलाश में
वह बैठा रहता है
शहंशाही अंदाज़ लिए 
कूड़े के ढेर पर,
नाक पर रूमाल रखे
आते-जाते लोगो को
निर्विकार भाव से
देखते हुए गुनगुनाता है
‘कुण्डी मत खड़काना राजा’
सिर्फ आज की नहीं
यह तो है
रोज की कहानी
कालोनी से आने वाला
कूड़े से लदा ट्रक
जब खाली होकर चला जाएगा
वह सड़ते हुए
रोटियों की ‘खुशबू’ से सराबोर हो
एक और दिन के लिए
जिंदगी पायेगा

कितना फर्क हैं ना
हमारी खुशबू और 
उसकी खुशबू में 

शुक्रवार, 21 मई 2010

उँगलियॉ बेचैन हैं ज़ख्म कुरेदने वाले~~

मत करो प्रश्न
उत्तर नहीं पाओगे
और फिर निरुत्तर रहकर
ख़ुद ही पर झुंझलाओगे

प्रतिउत्तर में आएंगे
सैकड़ो प्रश्नों के जाल
और फिर तुम्हारा अस्तित्व ही
बन जाएगा एक सवाल
क्या हुआ गर प्रहरी सो गया
मत ढूढो गर तुम्हारा कुछ खो गया
बचा सको तो बचा लो
तुम्हारे पास जो कुछ बचा है
खोये को ढूढ़ते ढूढ़ते तुम
बचे को भी खो दोगे
अपने हालात पर फिर
फूट फूट कर रो दोगे

रुदन और क्रंदन तभी सार्थक हैं
जब दिलासे की थपथपाहट मिले
दर्द का बयां तब करो
जब संवेदना की आहट मिले
नमक मल देंगे वे
गर दिखलाओगे छाले
अपने ज़ख्म मत दिखलाओ
उँगलियॉ बेचैन हैं
ज़ख्म कुरेदने वालों की

जो करना है करो
पर प्रश्न मत करो
उत्तर नहीं पाओगे
और फिर निरुत्तर रहकर
ख़ुद ही पर झुंझलाओगे