प्रश्नों का जन्म
उत्तर से पहले होना
एक स्वाभाविक प्रक्रिया है—
यही होना चाहिए,
और
बरसों से यही होता आया था।
प्रश्न जन्म लेते थे
किसी बेचैनी की कोख से,
किसी अन्याय की चुभन से,
किसी मासूम जिज्ञासा
या
अधूरी समझ की प्यास से।
तब
उत्तर धीरे-धीरे खोजे जाते थे—
बहसों, तर्कों, असहमतियों
और
अनगिनत ठोकरों के बीच।
मगर
दौर बदला,
विरासत बदली,
और
व्यवस्था भी बदल गई।
अब
पहले उत्तर गढ़े जाते हैं—
चमकदार कमरों में,
बंद दरवाज़ों के पीछे,
सुविधाजनक निष्कर्षों की तरह।
फिर
उनके अनुरूप
प्रश्न रचे जाते हैं—
जैसे किसी अपराध के बाद
सबूत तैयार किए जाते हैं।
आज के प्रश्न
अक्सर अपनी शक्ल बदलते मिलते हैं—
प्रश्नवाचक चिन्ह से हटकर
पूर्णविराम बनते हुए।
वे प्रश्न नहीं लगते अब,
निर्णय लगते हैं;
जिनमें जिज्ञासा नहीं,
पूर्वनिर्धारित आग्रह धड़कता है।
उनकी दृष्टि में
सत्य की तलाश नहीं,
बल्कि
भीड़ को किसी तय उत्तर तक
हाँक ले जाने की युक्ति होती है।
और फिर
ये प्रश्न
अविकसित भ्रूण-से जन्मे शिशु-से
असक्त सिद्ध होते हैं—
न ठीक से साँस ले पाते हैं,
न प्रतिरोध कर पाते हैं,
न अपने पैरों पर
ठहर पाते हैं।
वे
अपनी सार्थकता सिद्ध करने से पहले ही
सत्ता, प्रचार और शोर के
कृत्रिम ऑक्सीजन पर
जीने को विवश हो जाते हैं।
सबसे भयावह यह नहीं
कि उत्तर पहले लिखे जा रहे हैं—
बल्कि यह है कि
सार्थक प्रश्नों के इस विकृत रूपांतरण के बीच
नए प्रश्नों का जन्म ही बाधित हो गया है।
और इस मौन प्रक्रिया में
लोकतंत्र
स्वयंभू होता जा रहा है।










