शनिवार, 6 जून 2026

एक अनुपस्थित रूदाली

 

सुना था
किसी मौत पर
पुराने समय में
राजघरानों में
रुदन के लिये
रूदालियाँ बुलाई जाती थीं।

मणिपुर मारा जा रहा है।

वह कई बार
मर भी चुका है।

अब वह
अपने ही मरने का दृश्य देखने के लिये
तटस्थ भाव से
खड़ा हो जाता है।

अपने जिस्म को
छलनी होते हुए,
अपने घरों को
जलते हुए,

और अपने अस्तित्व को
किसी अख़बार के कोने में छपे
एक समाचार में बदलते हुए
देखता रहता है।

उसने सीख लिया है
कि हर चीख
सुर्ख़ी नहीं बनती,

और हर मौत के हिस्से में
शोक नहीं आता।

मत भूलो

सत्ता का काम
शोक मनाना नहीं,
शोक पर वक्तव्य देना है;

और कई बार
वक्तव्य भी नहीं।

सत्ता
दुःख में सहभागी होने,
आँसू बाँटने,
या रूदालियाँ भेजने के लिये
नहीं होती।

वैसे भी
वह व्यस्त रहती है
चुनावी मंचों पर,

जहाँ हर हाल में
मुस्कुराना पड़ता है;

वहाँ आँकड़ों की जगह है,
आँसुओं की नहीं,

और रूदन
किसी भी विजय-गीत के साथ
अच्छा नहीं लगता।

इसलिये,

जब कोई नहीं आएगा
तुम्हारे मृतकों के लिये रोने,

जब कोई नहीं लिखेगा
तुम्हारे दुःख का इतिहास,

जब तुम्हारी आग
दूर बैठे लोगों के लिये
महज़ एक समाचार भर रह जाएगी,

तब

अपनी ही मौत पर
तुम्हें स्वयं ही
रूदाली बनना होगा।

और अपनी ही राख के सामने
खड़े होकर
अपने लिये रोना होगा।

गुरुवार, 4 जून 2026

सपनों का मलबा

कुछ पेपर लीक पर
इतना शोर क्यों है?
निष्पक्ष परीक्षाओं पर
इतना ज़ोर क्यों है?

आख़िर
आत्महत्याएँ हुई ही कितनी हैं?
कुछ गिनी-चुनी।

जो कि उम्मीद से कम है
लोकतंत्र के गणित में
ये संख्याएँ हैं बेकार

आख़िर क्या-क्या देखेगी

बेचारी सरकार।

 

और फिर बेईमानी भी तो

एक प्रक्रिया है

ईमानदारी और धैर्य परीक्षण की

आपको क्या लगता है,
हम सो रहे हैं?
हम भी आप जितना ही
चिंतित हो रहे हैं।

पिछली बार जब पेपर लीक हुआ था,
हम जाँच आयोग लाए थे;
उसकी जाँच अभी चल रही है,
हाँ यह सच है कि

नतीजे नहीं आए थे।

धैर्य रखिए,
व्यवस्था काम कर रही है;
हर घोटाले पर
एक नई फ़ाइल तैयार हो रही है।

छात्र सपनों के मलबे में दबें
तो दबे रहें,
महत्त्वपूर्ण यह है कि
जाँच की प्रक्रिया
निरंतर जारी है।

रविवार, 31 मई 2026

झूठे आश्वासनों का थक्का

पूरे शहर में
दहशत पसरी हुई थी।

लोग अभी पिछली महामारी की राख से
पूरी तरह बाहर भी नहीं निकले थे
कि एक नई, अनजान मौत
फिर गलियों में उतर आई।

लोग मर रहे थे
बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के।
न तेज़ बुखार,
न खाँसी,
न शरीर पर कोई साफ़ निशान।

अस्पताल भरे पड़े थे।
दवाइयाँ असर खो चुकी थीं।
विशेषज्ञ
अपनी-अपनी स्क्रीन पर झुके
संभावनाओं की सुरंगों में
कारण तलाश रहे थे।

तभी किसी ने कहा
क्यों न किसी मृतक का
पोस्टमार्टम किया जाए?”

सुझाव असुविधाजनक था,
फिर भी स्वीकार कर लिया गया।

एक शव
सफ़ेद रोशनी से भरी मेज़ पर लिटाया गया।
डॉक्टरों की टीम ने
घंटों उसकी नसें, ऊतक,
रक्त और जीवन का इतिहास टटोला।

आख़िरकार रिपोर्ट आई

शरीर के अधिकांश अंग
सामान्य पाए गए।
रक्त प्रवाह भी संतुलित था।

लेकिन हृदय के निकट
एक गाढ़ा थक्का जमा मिला
झूठे आश्वासनों का।

यह धीरे-धीरे बनता रहा
जब से मृतक ने
अपने हिस्से की रोटी,
रोज़गार
और सम्मानजनक जीवन का सपना देखा था।

इसके अतिरिक्त
रक्त में धार्मिक घृणा के सूक्ष्म कण
असामान्य मात्रा में पाए गए,
जो लंबे समय से
उसकी संवेदनाओं को
भीतर ही भीतर नष्ट कर रहे थे।

रिपोर्ट पढ़ते ही
कमरे में सन्नाटा भर गया।

फिर अचानक
कुछ वरिष्ठ विशेषज्ञ बुलाए गए।
रिपोर्ट रोक दी गई।
शब्द बदले गए।
निष्कर्ष संशोधित हुए।

और अंततः
जनता के लिए नई रिपोर्ट जारी की गई

मृतक अपनी निजी आदतों
और अव्यवस्थित जीवनशैली के
स्वयं जिम्मेदार पाए गए।

इसके साथ ही
फाइल बंद कर दी गई।

टीवी चैनलों को निर्देशित किया गया
भव्यताओं का उत्सव दिखाने को,
अख़बारों को
नई सुर्खियाँ चुनने को।

और इस पर
विधिवत अमल हुआ।

शहर
जीवित बने रहने की आदिम इच्छा में
एक बार फिर
धीरे-धीरे
रेंगने लगा।

गुरुवार, 28 मई 2026

आम आदमी नंगा है

 

बाकी सब भला चंगा है,
बस आम आदमी नंगा है।

 

महलों में उत्सव जारी है,
सड़कों पर फैला दंगा है।

 

इतना पाप धुला जल में

कि मैली हो गई गंगा है।

 

बेरंग भूख की बस्ती में

आश्वासन रंग-बिरंगा है।

 

समझ रहे जिनको दाता

सच में वो भिखमंगा है।

 

जिसको उडता देख रहे

वह महज एक पतंगा है।

 

धरती में है बीज बहुत

यह तो एक सारंगा* है।

 

* सारंगा = एक प्रकार की छोटी नाव जो एक ही लकड़ी की बनती है

रविवार, 24 मई 2026

युद्ध, ऊर्जा संकट और प्रेम

युद्ध की विभीषिका भी
बुझा नहीं पाती
प्रेम की लौ को,
क्योंकि वह मोहताज नहीं
किसी बाह्य ऊर्जा की।

सदियों से कोशिश की गई
हार्मूज़ अवरुद्ध कर
इसकी आपूर्ति रोकने की।

कभी खाप के माध्यम से,
तो कभी ऑनर किलिंग करके,
उस पर बम बरसाए गए।

फिर भी
हर मलबे के नीचे से
किसी जिद्दी अंकुर की तरह
फूट पड़ता है प्रेम।

आज जिस तरह दुनिया
युद्धजनित ऊर्जा-संकट से
हाहाकार कर रही है,
प्रेम के लिए तो
ये परिस्थितियाँ
चिर-परिचित हैं;
वह तो अक्सर
अभाव, प्रतिबंध
और प्रतिरोध की अँधेरी सुरंगों में ही
सबसे अधिक परिपुष्ट होता है।

क्योंकि
नफ़रत की हर सत्ता
सीमाओं में क़ैद होती है,
पर प्रेम
हर बार
सीमाएँ लाँघकर
जी उठता है।

बुधवार, 20 मई 2026

प्रश्नवाचक से पूर्णविराम तक

प्रश्नों का जन्म
उत्तर से पहले होना
एक स्वाभाविक प्रक्रिया है—
यही होना चाहिए,
और
बरसों से यही होता आया था।

प्रश्न जन्म लेते थे
किसी बेचैनी की कोख से,
किसी अन्याय की चुभन से,
किसी मासूम जिज्ञासा
या
अधूरी समझ की प्यास से।

तब
उत्तर धीरे-धीरे खोजे जाते थे—
बहसों, तर्कों, असहमतियों
और
अनगिनत ठोकरों के बीच।

मगर
दौर बदला,
विरासत बदली,
और
व्यवस्था भी बदल गई।

अब
पहले उत्तर गढ़े जाते हैं—
चमकदार कमरों में,
बंद दरवाज़ों के पीछे,
सुविधाजनक निष्कर्षों की तरह।

फिर
उनके अनुरूप
प्रश्न रचे जाते हैं—
जैसे किसी अपराध के बाद
सबूत तैयार किए जाते हैं।

आज के प्रश्न
अक्सर अपनी शक्ल बदलते मिलते हैं—
प्रश्नवाचक चिन्ह से हटकर
पूर्णविराम बनते हुए।

वे प्रश्न नहीं लगते अब,
निर्णय लगते हैं;
जिनमें जिज्ञासा नहीं,
पूर्वनिर्धारित आग्रह धड़कता है।

उनकी दृष्टि में
सत्य की तलाश नहीं,
बल्कि
भीड़ को किसी तय उत्तर तक
हाँक ले जाने की युक्ति होती है।

और फिर
ये प्रश्न
अविकसित भ्रूण-से जन्मे शिशु-से
असक्त सिद्ध होते हैं—
न ठीक से साँस ले पाते हैं,
न प्रतिरोध कर पाते हैं,
न अपने पैरों पर
ठहर पाते हैं।

वे
अपनी सार्थकता सिद्ध करने से पहले ही
सत्ता, प्रचार और शोर के
कृत्रिम ऑक्सीजन पर
जीने को विवश हो जाते हैं।

सबसे भयावह यह नहीं
कि उत्तर पहले लिखे जा रहे हैं—
बल्कि यह है कि
सार्थक प्रश्नों के इस विकृत रूपांतरण के बीच
नए प्रश्नों का जन्म ही बाधित हो गया है।

और इस मौन प्रक्रिया में
लोकतंत्र
स्वयंभू होता जा रहा है।

शुक्रवार, 15 मई 2026

मरने से पहले की मौत

 

लोग बताते हैं कि
मरने से ठीक पहले तक
वह ज़िंदा था
क्योंकि
उसकी साँसें चल रही थीं,
वह चल रहा था।

पर सच तो यह है कि
वह मरने से बहुत पहले ही
मर गया था।

बातूनी था
पर बोलता नहीं था,
सोचने लायक बातों पर भी
वह सोचता नहीं था।

अक्सर
वह बिना चेहरे के
भीड़ में खड़ा मिलता था।

उसके मरने के लक्षण
पहली बार तब दिखे,
जब उसके माथे की सलवटें
ज़िंदा रहने की ललक में
धीरे-धीरे
अदृश्य हो गईं।

आज जब वह
फाइनली मर गया है,
तो लोग दुखी हैं
क्योंकि
अब उन्हें पहली बार
उसकी मौत दिखाई दी है।

मंगलवार, 12 मई 2026

शाख़-ए-वजूद

कुछ इस तरह फुसफुसाती है हवा,
शायद कोई ग़ज़ल सुनाती है हवा।

सुकून फिर भला कैसे नसीब हो,
ज़ख्मों को रोज़ छेड़ जाती है हवा।

यादों की राख अब भी गर्म है कहीं,
धीरे-धीरे फिर सुलगाती है हवा।

तुम्हें भूलने में उम्र गुज़र गई,
तेरा ही नाम दोहराती है हवा।

जब  जानना चाहा हाल तुम्हारा,
हर बार बात टाल जाती है हवा।

तुम्हारी ख़ुशबू पुरवाई बनकर,
शाख़-ए-वजूद हिलाती है हवा।

बीते दिनों की अनकही वो बातें,
न जाने कहाँ से लाती है हवा।

वर्मादिल को लाख संभालो मगर,
पल भर में सब उड़ा जाती है हवा।

शुक्रवार, 8 मई 2026

हवा शराबी हौ (भोजपुरी गज़ल)

लोग कहलन कि हमरे चाल में खराबी हौ,
सच इ बा कि तोहरे गाँव के हवा शराबी हौ।

गुलाबो दुबक जाला कवनो कोना-अंतरा में,
तोहरे गाल के रंगत त अइसन गुलाबी हौ।

तोहरे हँसी से खिल जाला हमार जिनगी,
जइसे बंजर धरती पर बरखा नवाबी हौ।

तोहरा--हमरा पर जे लोग उठावेला उंगली,
सच कहा त ओनहीं में असली खराबी हौ।

तोहरे बातन में मिठास त बहुत बा लेकिन,
कबहूँ-कबहूँ लागेला थोड़ा हिसाबी हौ।

तोहरे हँसी से खिल उठेला जिनगी के मौसम,
छँट गइल अन्हेरा काहे कि रात महताबी हौ।

हम खामोश बानी त आउर कुछ ना समझs,
हमार चुप्पी तोहरे नाम चिट्ठी जवाबी हौ।

तोहरे संगे बितावल हर इक लम्हा लागे,
जइसे किस्सा पुरान, मगर लाजवाबी हौ।

वर्मादिल के बात कागज पर उतार देला,
सच कहीं त एहमें ओकरे कामयाबी हौ।