शनिवार, 21 मार्च 2026

नमक-मिर्च की सोहबत

 

उसने उसे देखा…
उसने भी शायद उसे देखा—

“देखने” और “शायद” देखने को
किसी और ने भी देख लिया…

और फिर—
अनगिनत किस्से
जुड़ते चले गए
किस्सागोई के सिलसिलों में।

मुँह-दर-मुँह,
नमक-मिर्च की सोहबत में,
एक मामूली सा लम्हा
इश्क़ का अफ़साना बन गया…
और वे—
चर्चाओं में आ गए।

उन्हें खबर भी न थी…
पर उनके ज़िक्र में
प्यार, इज़हार और मनुहार
धीरे-धीरे शामिल होते चले गए।

सबसे अजीब बात—
उन्हें अपने ही इश्क़ की खबर
खबरदार करती खबरों से हुई।

अब तो “वर्मा”
बस इसी फ़िराक में है—
कि ये किस्से
उन तक भी पहुँचें…

और जब पहुँचें—
तो एक सच बन जाएँ।

ताकि ये किस्सा…
सिर्फ किस्सा न रहे।

बुधवार, 18 मार्च 2026

कूड़ेदान में प्रश्न

 

हमारे आँकड़े आत्मनिर्भर हैं,
क्योंकि संकलन
धृतराष्ट्रीय आँखें करती हैं।

संजय के रंगीन चश्मे के पीछे
अनुवादक आँखें
विनाश को विकास बताती हैं।

मायावी शब्दबाण सिद्धहस्त हैं
अश्वत्थामा मारा गया
के तर्ज पर
संधान करने को।

यहाँ हर पराजय
रणनीतिक विजय कहलाती है,
हर कराह
उत्सव का शोर बन जाती है।

भूख को
संयम” लिख दिया जाता है,
और बेरोज़गारी को
आत्मनिर्भरता का अवसर

सबसे कष्टदायी है
सार्थक प्रश्नों को
किसी कुंवारी की कोख से जन्मे
नवजात-सा
कूड़े के ढेर में पड़ा देखना।

धृतराष्ट्र प्रसन्न हैं
क्योंकि दरबार में
संजय अभी भी वही देख रहा है
जो उसे
दिखाने को कहा गया है।

शनिवार, 14 मार्च 2026

तालियों से सच बदलता नहीं ---


दर्द के गाँव में ठहर कर देखिये
मौत से पहले ही मर कर देखिये

 

भूख की आँखों में जलते प्रश्न हैं,
उनसे आँखें आप भर कर देखिये

 

तालियों से सच बदलता ही नहीं,
आईनों से भी गुज़र कर देखिये

 

रात कितनी भी सियाही ओढ़ ले,
एक दीया फिर भी धर कर देखिये

 

सिंहासन काँपेगा इक दिन यक़ीनन,
जनता में जाकर उतर कर देखिये

 

वर्मासच बोल दे तो चुभेगा ज़रूर,

कलेजे पे पत्थर को धर कर तो देखिये

बुधवार, 11 मार्च 2026

हुनर का नया व्याकरण

एक मछली थी—
उसे तैरना नहीं आता था।
वह धारा के साथ
बस बह रही थी।

धूप पड़ी,
लहरें चमकीं—
और उसकी लाचारी
प्रतिभा घोषित हो गई।

भीड़ ने कहा—
“देखो, कैसी तैराक है!”

कुछ तथाकथित विद्वानों ने
उसके बहाव को
नया सिद्धांत बताया।

एक समिति बैठी—
और उसे
राष्ट्रीय तैराक घोषित कर दिया।

फिर एक दिन
धारा रुक गई।
मछली भी रुक गई।

तब पता चला—
वह तैर नहीं रही थी,
बस बह रही थी।

दरअसल
इस देश में
बहाव के साथ बहना ही
सबसे बड़ा हुनर है।

और जो सचमुच
तैरना जानते हैं,
और छद्म तैराकी के खिलाफ
आवाज़ उठाते हैं—

वे अक्सर
खतरनाक
और अपराधी
घोषित कर दिए जाते हैं।

सोमवार, 9 मार्च 2026

सूरज को अल्टिमेटम

 

सूरज,
तुम्हारी निष्पक्षता पर
अब संदेह होने लगा है।

लगता है
रोशनी का वितरण भी
अब किसी फाइल में अटका हुआ है।

झोपड़ियों तक पहुँचने से पहले
तुम्हारी किरणें
अक्सर अट्टालिकाओं की बालकनी में
आराम करने लगती हैं।

अगर यह सच नहीं है
तो अपनी रश्मियों को आदेश दो
वे उतरें
उन तंग गलियों में भी
जहाँ अँधेरा
सिर्फ रात नहीं,
पीढ़ियों की विरासत है।

जरा वहाँ भी ठहरोसूरज,
जहाँ सुबह आने में
अब तक सदियाँ लग जाती हैं।

और अगर यह काम
तुम्हारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता,
तो साफ़-साफ़ बता दो।

क्योंकि फिर
हम इंतज़ार नहीं करेंगे।

हम अपने हाथों से
दीपक जलाएँगे,
जुगनुओं को साथ मिलाएँगे,
और उन गलियों में रोशनी ले जाएँगे
जहाँ अँधेरा
सिंहासन पर बैठा है।

यह एक अंतिम सूचना है
अगर अपनी सत्ता का
बिखराव नहीं देखना चाहते
तो समझ लो

अब लोग आसमान की ओर
कम देखते हैं,
अपने हाथों की ओर
ज़्यादा।

क्योंकि जब इंसान जाग जाता है,
तो उसे सुबह के लिए
सूरज की ज़रूरत नहीं पड़ती।

बुधवार, 4 मार्च 2026

गर्भ पर पहरा

 

तैनात हैं...

चारों ओर!

धर्म के, जाति के

और तथाकथित 'संस्कारों' के

वे स्वयंभू सैनिक, जो डर से पैदा हुए हैं।

वे घेरा डाले खड़े हैं... 

उस नन्ही सी कोख पर,

उन्हें 'गर्भ' पर कब्ज़ा करना है।

 

उन्हें डर है

कहीं यह नवजात

उन्मुक्त हवाओं की सोहबत में न आ जाए,

कहीं जन्म लेते ही वह

सूरज की सीधी रोशनी को 'सत्य' न मान ले।

 

इसलिए

इससे पहले कि वह 'मनुष्य' बने,

वे उसकी देह पर पहचान का 'टैग' टाँक देना चाहते हैं।

वे चाहते हैं... 

उसकी पहली मासूम किलकारी में

अपनी नफरतों का 'घोषणापत्र' भर देना!

 

वे आतंकित हैं

कहीं वह सवाल न सीख जाए,

कहीं उसकी जुबान 'क्यों' का उच्चारण न कर दे,

कहीं वह

विरासत में मिली इन 'दीवारों' को,

बाहर जाने का 'दरवाज़ा' न समझ ले!

 

उनकी साजिश गहरी है

वे चाहते हैं, पहली साँस के साथ

उसके फेफड़ों में 'खौफ' की हवा भर दी जाए,

और पहली धड़कन की दस्तक पर ही

सड़ी-गली मर्यादाओं का भारी 'ताला' जड़ दिया जाए।

 

क्योंकि...

वे जानते हैं

जिस दिन वह सचमुच 'मनुष्य' हो गया,

उनके गढ़े हुए पत्थर के 'देवता' नंगे हो जाएँगे...

और उनकी सदियों पुरानी 'सत्ता'—

महज़ एक कोरी अफ़वाह बनकर रह जाएगी!

रविवार, 1 मार्च 2026

अलगौझे की लड़ाई


तब,
हमारे गाँव में
अलगौझे की लड़ाइयाँ
अक्सर पनप जाया करती थीं।

दोनों भाई
खेत की मेड़ों से लेकर
आँगन की देहरी तक
डोरी तानकर
अपना-अपना हिस्सा नापते थे।

नापते-नापते
सम्मान की दूरी भी घट जाती
आप’ उतरकर
सीधे तू’ हो जाता,
बातों में लाठी उग आती,
शब्द बारूद की तरह फटते।

लड़ते-लड़ते
गालियाँ
उनके मुँह से यूँ फिसलतीं
जैसे घर की ही दीवार
अपने ही हाथों दरक रही हो।

तभी
भीतर से माँ निकलती,
चौखट पर आकर
खड़ी हो जाती बहन।

माँ कहती
तुम दोनों
मेरी कोख के हिस्से हो।

बहन कहती
दीवारें बाँट लो,
पर माँ का आँगन
मत बाँटना।

और देखो,
जो अभी-अभी
एक-दूसरे का खून पी जाने को थे,
वही
चुपचाप
एक ही लोटे से पानी पी लेते
जैसे पानी नहीं,
लाज पी रहे हों।

दरअसल
अलगौझे की लड़ाई
ज़मीन की नहीं होती थी
वह अहंकार की फसल थी,
जिसे
माँ की आँखों का पानी
हर बार काट देता था।


अलगौझा = बंटवारा