उसने उसे देखा…
उसने भी शायद उसे देखा—
“देखने” और “शायद” देखने को
किसी और ने भी देख लिया…
और फिर—
अनगिनत किस्से
जुड़ते चले गए
किस्सागोई के सिलसिलों में।
मुँह-दर-मुँह,
नमक-मिर्च की सोहबत में,
एक मामूली सा लम्हा
इश्क़ का अफ़साना बन गया…
और वे—
चर्चाओं में आ गए।
उन्हें खबर भी न थी…
पर उनके ज़िक्र में
प्यार, इज़हार और मनुहार
धीरे-धीरे शामिल होते चले गए।
सबसे अजीब बात—
उन्हें अपने ही इश्क़ की खबर
खबरदार करती खबरों से हुई।
अब तो “वर्मा”
बस इसी फ़िराक में है—
कि ये किस्से
उन तक भी पहुँचें…
और जब पहुँचें—
तो एक सच बन जाएँ।
ताकि ये किस्सा…
सिर्फ किस्सा न रहे।






