शनिवार, 7 मार्च 2026

सूरज को अल्टिमेटम

सूरज,
तुम्हारी निष्पक्षता पर
अब संदेह होने लगा है।

लगता है
रोशनी का वितरण भी
अब किसी फाइल में अटका हुआ है।

झोपड़ियों तक पहुँचने से पहले
तुम्हारी किरणें
अक्सर अट्टालिकाओं की बालकनी में
आराम करने लगती हैं।

अगर यह सच नहीं है
तो अपनी रश्मियों को आदेश दो
वे उतरें
उन तंग गलियों में भी
जहाँ अँधेरा
सिर्फ रात नहीं,
पीढ़ियों की विरासत है।

जरा वहाँ भी ठहरो, सूरज,
जहाँ सुबह आने में
अब तक सदियाँ लग जाती हैं।

और अगर यह काम
तुम्हारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता,
तो साफ़-साफ़ बता दो।

क्योंकि फिर
हम इंतज़ार नहीं करेंगे।

हम अपने हाथों से
दीपक जलाएँगे,
जुगनुओं को साथ मिलाएँगे,
और उन गलियों में रोशनी ले जाएँगे
जहाँ अँधेरा
सिंहासन पर बैठा है।

यह एक अंतिम सूचना है
अगर अपनी सत्ता का
बिखराव नहीं देखना चाहते
तो समझ लो

अब लोग आसमान की ओर
कम देखते हैं,
अपने हाथों की ओर
ज़्यादा।

क्योंकि जब इंसान जाग जाता है,
तो उसे सुबह के लिए
सूरज की ज़रूरत नहीं पड़ती।

बुधवार, 4 मार्च 2026

गर्भ पर पहरा

 

तैनात हैं...

चारों ओर!

धर्म के, जाति के

और तथाकथित 'संस्कारों' के

वे स्वयंभू सैनिक, जो डर से पैदा हुए हैं।

वे घेरा डाले खड़े हैं... 

उस नन्ही सी कोख पर,

उन्हें 'गर्भ' पर कब्ज़ा करना है।

 

उन्हें डर है

कहीं यह नवजात

उन्मुक्त हवाओं की सोहबत में न आ जाए,

कहीं जन्म लेते ही वह

सूरज की सीधी रोशनी को 'सत्य' न मान ले।

 

इसलिए

इससे पहले कि वह 'मनुष्य' बने,

वे उसकी देह पर पहचान का 'टैग' टाँक देना चाहते हैं।

वे चाहते हैं... 

उसकी पहली मासूम किलकारी में

अपनी नफरतों का 'घोषणापत्र' भर देना!

 

वे आतंकित हैं

कहीं वह सवाल न सीख जाए,

कहीं उसकी जुबान 'क्यों' का उच्चारण न कर दे,

कहीं वह

विरासत में मिली इन 'दीवारों' को,

बाहर जाने का 'दरवाज़ा' न समझ ले!

 

उनकी साजिश गहरी है

वे चाहते हैं, पहली साँस के साथ

उसके फेफड़ों में 'खौफ' की हवा भर दी जाए,

और पहली धड़कन की दस्तक पर ही

सड़ी-गली मर्यादाओं का भारी 'ताला' जड़ दिया जाए।

 

क्योंकि...

वे जानते हैं

जिस दिन वह सचमुच 'मनुष्य' हो गया,

उनके गढ़े हुए पत्थर के 'देवता' नंगे हो जाएँगे...

और उनकी सदियों पुरानी 'सत्ता'—

महज़ एक कोरी अफ़वाह बनकर रह जाएगी!

रविवार, 1 मार्च 2026

अलगौझे की लड़ाई


तब,
हमारे गाँव में
अलगौझे की लड़ाइयाँ
अक्सर पनप जाया करती थीं।

दोनों भाई
खेत की मेड़ों से लेकर
आँगन की देहरी तक
डोरी तानकर
अपना-अपना हिस्सा नापते थे।

नापते-नापते
सम्मान की दूरी भी घट जाती
आप’ उतरकर
सीधे तू’ हो जाता,
बातों में लाठी उग आती,
शब्द बारूद की तरह फटते।

लड़ते-लड़ते
गालियाँ
उनके मुँह से यूँ फिसलतीं
जैसे घर की ही दीवार
अपने ही हाथों दरक रही हो।

तभी
भीतर से माँ निकलती,
चौखट पर आकर
खड़ी हो जाती बहन।

माँ कहती
तुम दोनों
मेरी कोख के हिस्से हो।

बहन कहती
दीवारें बाँट लो,
पर माँ का आँगन
मत बाँटना।

और देखो,
जो अभी-अभी
एक-दूसरे का खून पी जाने को थे,
वही
चुपचाप
एक ही लोटे से पानी पी लेते
जैसे पानी नहीं,
लाज पी रहे हों।

दरअसल
अलगौझे की लड़ाई
ज़मीन की नहीं होती थी
वह अहंकार की फसल थी,
जिसे
माँ की आँखों का पानी
हर बार काट देता था।


अलगौझा = बंटवारा

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

प्रेम का पाइथागोरस


समकोण त्रिभुज का
लंब बनूँ मैं,
तुम बन जाना आधार।

 

प्रेमाकुल अधरों पर
अधरों का स्पर्श,
क्षण भर में
बन जाए अंगार।

 

जब मिलन-बिंदु पर
हम आरोपित होंगे,
भावों के वर्ग
एकाकार होंगे

तब प्रेम के योग से
सिद्ध यही होगा,
दोनों के विस्तार में
कर्ण-सा विस्तार होगा।

 

तुम और मैं अलग कहाँ,
बस रूप हैं दो आकार
भुजा-भुजा का प्रेम ही
है जीवन का है सार।

 

पाइथागोरस सा शाश्वत सच,

हमारी रूह में समाएगा।

जब तुम और मैं एक होंगे,

जीवन 'कर्ण' बन जाएगा।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

“दो मुर्दों की बातचीत / प्यास”


गंगा किनारे
मणिकर्णिका घाट पर
दो मुर्दे लाए गए,
अन्य व्यवस्था होने तक
चिलचिलाती धूप में
अगल-बगल लिटाए गए।

 

अचानक एक मुर्दे ने
दूसरे से पूछा
तुम भी मर गए हो क्या?”

दूसरा मुस्कुराया और बोला
और क्या मैं यहाँ
आराम करने आया हूँ!


दोनों हल्के-हल्के हँस पड़े।

 

दोनों बातूनी थे।
एक ने कहा
मरने के बाद बड़ा मज़ा आया दोस्त,
जिनके लिए मैं ज़िंदगी भर बोझ था,
आज वही
मुझे अपने कंधों पर उठाकर लाए हैं।

 

कुछ देर बाद
पहला फिर बोला
यार, धूप बहुत तेज़ है,
प्यास लग रही है ...

और अभी हमें

चिता में भी जलना है
सामने गंगा बह रही है,
कहो तो
थोड़ा पानी ले आऊँ?”

 

दूसरा हल्के से हँसा

“तुम क्यो चिता से डरे हो

लगता है पहली बार मरे हो

और,

पानी की प्यास तो
ज़िंदगी में ही नहीं बुझी,
अब मौत के बाद
क्या जल्दी है?”

 

थोड़ा ठहरकर बोला

सच कहूँ दोस्त,
प्यास हमें पानी की नहीं थी
दो घूँट सुकून की,
थोड़ी-सी इज़्ज़त की,
और एक मुट्ठी भर इंसानियत की।

 

गंगा बहती रही,
धूप जलती रही,
और दोनों मुर्दे
पहली बार
ज़िंदगी को समझते रहे।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

निडर राजा और जिद्दी प्रश्न

एक निडर राजा था,
उसे किसी से डर नहीं लगता था।
डरता था तो बस—
प्रेस कॉन्फ़्रेंस से।

मंत्रिपरिषद ने समझाया—
“महाराज, प्रेस कॉन्फ़्रेंस से
अच्छा प्रभाव पड़ता है।”

राजा ने
काफ़ी सोच-विचार के बाद
हिम्मत जुटाई।

एक अर्से बाद
प्रेस कॉन्फ़्रेंस रखी गई।

पत्रकार कतार में खड़े थे—
कुछ नया पूछने को,
कुछ पुराना टटोलने को।

तभी उनकी नज़र पड़ी
राजा के सूचना-पट्ट पर—
जिस पर साफ़ लिखा था:

“प्रश्नों के साथ
अंदर आना सख़्त मना है।”

केवल वही पत्रकार
अंदर आ पाएँगे
जो सिर्फ़
हाँ में हाँ मिलाएँगे।

प्रवेश-द्वार पर तलाशी ली गई,
जो प्रश्नों के साथ आए—
वे गिरफ़्तार कर लिए गए,
और उनके प्रश्न
तार-तार कर दिए गए।

पर कुछ जिद्दी प्रश्न
पीछे के दरवाज़े से
अंदर प्रवेश कर गए...

प्रश्नों की भनक लगते ही
राजा सुरक्षा घेरे में छिपकर
गुप्त मार्ग से होते हुए
सभाकक्ष से बाहर हो गए।

अंततः
आधिकारिक विज्ञप्ति जारी की गई—

“राजा पूर्णतः निडर हैं,
केवल कुछ असामाजिक प्रश्नों के कारण
स्थिति का आंशिक पुनर्मूल्यांकन
अत्यंत सावधानीपूर्वक
किया जा रहा है।

प्रेस स्वतंत्र है—
बशर्ते वह
उत्तर पहले से जानती हो।”

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

पर्दों के पीछे का देश

 

लगता है हमारा
धर्म-प्रचार तंत्र
जंग खा गया है,
तभी तो लोगों को
जय श्रीरामऔर
अल्लाहु अकबरके बीच
अचानक याद आ जाती है
अपनी भूख,
अपनी बेरोज़गारी,
अपने बच्चों की फीस,
और खाली जेबों का कोहराम।

बदहाली को
खुशहाली बताने वाला सॉफ्टवेयर
कहीं से भी आयात कर लो,
आँकड़ों की चमक में
सच्चाई का चेहरा
लहूलुहान ही सही।

और हाँ,
थोक के भाव में तिरपाल मँगवा लो
कि बुलडोज़रों के न्यायसे
जो मलबे बचे हैं,
उन्हें ढंकना अभी बाकी है।

आख़िर
अंतरराष्ट्रीय मेहमान आने वाले हैं,
उन्हें शहर दिखेगा
देश नहीं,
सजावट दिखेगी
हक़ीक़त नहीं।

सड़कों पर रंग होगा,
दीवारों पर नारे होंगे,
और पर्दों के पीछे
लोग अपने ही जीवन से
बेदख़ल खड़े होंगे।

क्योंकि स्वागत की परंपरा में
हमने यह हुनर सीख लिया है
सच को छिपाकर
व्यवस्था को मुस्कुराना।

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

इश्क़ का गुरुत्वाकर्षण

इश्क़ इकतरफ़ा नहीं होता,
वह सिर्फ़ अधूरा होता है
जब तक उसके भीतर
भावनाओं का भार कम होता है।

ब्रह्मांड का एक सरल-सा नियम है
हर कण
हर कण को खींचता है।
कोई किसी से बिल्कुल अलग नहीं,
बस दूरियाँ बढ़ जाती हैं,
या फिर
द्रव्यमान कम पड़ जाता है।

इंसान भी तो कण ही है
भावनाओं से बना हुआ,
यादों से भरा हुआ,
उम्मीदों की परिक्रमा करता हुआ।

कभी दिल हल्का पड़ जाता है,
कभी एहसासों का वजन घट जाता है,
और हम समझ लेते हैं
इश्क़ एकतरफ़ा है।

लेकिन सच यह है
जहाँ आकर्षण सच्चा हो,
वहाँ खिंचाव देर से सही,
होता ज़रूर है।

जिस दिन
जज़्बातों का द्रव्यमान बढ़ेगा,
और अहंकार की दूरियाँ घटेंगी,
उस दिन
वो भी महसूस करेगा
तुम्हारी ओर खिंचती हुई
अपने दिल की कक्षा।

क्योंकि प्रेम
कोई चमत्कार नहीं
यह भी प्रकृति का नियम है।

और हाँ,
इश्क़ में भी
गुरुत्वाकर्षण
चुपचाप काम करता है।