बुधवार, 27 मई 2026

आम आदमी नंगा है

 

बाकी सब भला चंगा है,
बस आम आदमी नंगा है।

 

महलों में उत्सव जारी है,
सड़कों पर फैला दंगा है।

 

इतना पाप धुला जल में

कि मैली हो गई गंगा है।

 

बेरंग भूख की बस्ती में

आश्वासन रंग-बिरंगा है।

 

समझ रहे जिनको दाता

सच में वो भिखमंगा है।

 

जिसको उडता देख रहे

वह महज एक पतंगा है।

 

धरती में है बीज बहुत

यह तो एक सारंगा* है।

 

* सारंगा = एक प्रकार की छोटी नाव जो एक ही लकड़ी की बनती है

रविवार, 24 मई 2026

युद्ध, ऊर्जा संकट और प्रेम

युद्ध की विभीषिका भी
बुझा नहीं पाती
प्रेम की लौ को,
क्योंकि वह मोहताज नहीं
किसी बाह्य ऊर्जा की।

सदियों से कोशिश की गई
हार्मूज़ अवरुद्ध कर
इसकी आपूर्ति रोकने की।

कभी खाप के माध्यम से,
तो कभी ऑनर किलिंग करके,
उस पर बम बरसाए गए।

फिर भी
हर मलबे के नीचे से
किसी जिद्दी अंकुर की तरह
फूट पड़ता है प्रेम।

आज जिस तरह दुनिया
युद्धजनित ऊर्जा-संकट से
हाहाकार कर रही है,
प्रेम के लिए तो
ये परिस्थितियाँ
चिर-परिचित हैं;
वह तो अक्सर
अभाव, प्रतिबंध
और प्रतिरोध की अँधेरी सुरंगों में ही
सबसे अधिक परिपुष्ट होता है।

क्योंकि
नफ़रत की हर सत्ता
सीमाओं में क़ैद होती है,
पर प्रेम
हर बार
सीमाएँ लाँघकर
जी उठता है।

बुधवार, 20 मई 2026

प्रश्नवाचक से पूर्णविराम तक

प्रश्नों का जन्म
उत्तर से पहले होना
एक स्वाभाविक प्रक्रिया है—
यही होना चाहिए,
और
बरसों से यही होता आया था।

प्रश्न जन्म लेते थे
किसी बेचैनी की कोख से,
किसी अन्याय की चुभन से,
किसी मासूम जिज्ञासा
या
अधूरी समझ की प्यास से।

तब
उत्तर धीरे-धीरे खोजे जाते थे—
बहसों, तर्कों, असहमतियों
और
अनगिनत ठोकरों के बीच।

मगर
दौर बदला,
विरासत बदली,
और
व्यवस्था भी बदल गई।

अब
पहले उत्तर गढ़े जाते हैं—
चमकदार कमरों में,
बंद दरवाज़ों के पीछे,
सुविधाजनक निष्कर्षों की तरह।

फिर
उनके अनुरूप
प्रश्न रचे जाते हैं—
जैसे किसी अपराध के बाद
सबूत तैयार किए जाते हैं।

आज के प्रश्न
अक्सर अपनी शक्ल बदलते मिलते हैं—
प्रश्नवाचक चिन्ह से हटकर
पूर्णविराम बनते हुए।

वे प्रश्न नहीं लगते अब,
निर्णय लगते हैं;
जिनमें जिज्ञासा नहीं,
पूर्वनिर्धारित आग्रह धड़कता है।

उनकी दृष्टि में
सत्य की तलाश नहीं,
बल्कि
भीड़ को किसी तय उत्तर तक
हाँक ले जाने की युक्ति होती है।

और फिर
ये प्रश्न
अविकसित भ्रूण-से जन्मे शिशु-से
असक्त सिद्ध होते हैं—
न ठीक से साँस ले पाते हैं,
न प्रतिरोध कर पाते हैं,
न अपने पैरों पर
ठहर पाते हैं।

वे
अपनी सार्थकता सिद्ध करने से पहले ही
सत्ता, प्रचार और शोर के
कृत्रिम ऑक्सीजन पर
जीने को विवश हो जाते हैं।

सबसे भयावह यह नहीं
कि उत्तर पहले लिखे जा रहे हैं—
बल्कि यह है कि
सार्थक प्रश्नों के इस विकृत रूपांतरण के बीच
नए प्रश्नों का जन्म ही बाधित हो गया है।

और इस मौन प्रक्रिया में
लोकतंत्र
स्वयंभू होता जा रहा है।

शुक्रवार, 15 मई 2026

मरने से पहले की मौत

 

लोग बताते हैं कि
मरने से ठीक पहले तक
वह ज़िंदा था
क्योंकि
उसकी साँसें चल रही थीं,
वह चल रहा था।

पर सच तो यह है कि
वह मरने से बहुत पहले ही
मर गया था।

बातूनी था
पर बोलता नहीं था,
सोचने लायक बातों पर भी
वह सोचता नहीं था।

अक्सर
वह बिना चेहरे के
भीड़ में खड़ा मिलता था।

उसके मरने के लक्षण
पहली बार तब दिखे,
जब उसके माथे की सलवटें
ज़िंदा रहने की ललक में
धीरे-धीरे
अदृश्य हो गईं।

आज जब वह
फाइनली मर गया है,
तो लोग दुखी हैं
क्योंकि
अब उन्हें पहली बार
उसकी मौत दिखाई दी है।

मंगलवार, 12 मई 2026

शाख़-ए-वजूद

कुछ इस तरह फुसफुसाती है हवा,
शायद कोई ग़ज़ल सुनाती है हवा।

सुकून फिर भला कैसे नसीब हो,
ज़ख्मों को रोज़ छेड़ जाती है हवा।

यादों की राख अब भी गर्म है कहीं,
धीरे-धीरे फिर सुलगाती है हवा।

तुम्हें भूलने में उम्र गुज़र गई,
तेरा ही नाम दोहराती है हवा।

जब  जानना चाहा हाल तुम्हारा,
हर बार बात टाल जाती है हवा।

तुम्हारी ख़ुशबू पुरवाई बनकर,
शाख़-ए-वजूद हिलाती है हवा।

बीते दिनों की अनकही वो बातें,
न जाने कहाँ से लाती है हवा।

वर्मादिल को लाख संभालो मगर,
पल भर में सब उड़ा जाती है हवा।

शुक्रवार, 8 मई 2026

हवा शराबी हौ (भोजपुरी गज़ल)

लोग कहलन कि हमरे चाल में खराबी हौ,
सच इ बा कि तोहरे गाँव के हवा शराबी हौ।

गुलाबो दुबक जाला कवनो कोना-अंतरा में,
तोहरे गाल के रंगत त अइसन गुलाबी हौ।

तोहरे हँसी से खिल जाला हमार जिनगी,
जइसे बंजर धरती पर बरखा नवाबी हौ।

तोहरा--हमरा पर जे लोग उठावेला उंगली,
सच कहा त ओनहीं में असली खराबी हौ।

तोहरे बातन में मिठास त बहुत बा लेकिन,
कबहूँ-कबहूँ लागेला थोड़ा हिसाबी हौ।

तोहरे हँसी से खिल उठेला जिनगी के मौसम,
छँट गइल अन्हेरा काहे कि रात महताबी हौ।

हम खामोश बानी त आउर कुछ ना समझs,
हमार चुप्पी तोहरे नाम चिट्ठी जवाबी हौ।

तोहरे संगे बितावल हर इक लम्हा लागे,
जइसे किस्सा पुरान, मगर लाजवाबी हौ।

वर्मादिल के बात कागज पर उतार देला,
सच कहीं त एहमें ओकरे कामयाबी हौ।

सोमवार, 4 मई 2026

स्वयं की वापसी

वह गहन अवसाद में था
और
सिर पकड़कर
सशरीर बैठ गया

उसने अजनबियों से
मदद मांगी
लोग ठिठककर आगे बढ़ गए

उसने अपने अज़ीज़ों को पुकारा
वे आए—
आश्वासन दिए,
हाथ बढ़ाए,
मगर फिर अधर में ही
छोड़कर चल दिए

अंततः
हर उम्मीद से परे जाकर
उसने खुद का हाथ पकड़ा
और
आहिस्ता-आहिस्ता
सशरीर खड़ा हो गया

शुक्रवार, 1 मई 2026

औज़ार नहीं, इंसान हैं ये

 

आज मजदूर दिवस है,
पर
मजदूर को
आज भी काम पर जाना है
उसे यह दिन
कैलेंडर में नहीं,
पेट में महसूस होता है।

औज़ारों के साथ
औज़ार बन जाना
उनकी नियति है।
किसी सभ्य नगर में
अक्सर चौराहों पर
इनका भी हाट लगता है
जहाँ
कोई चमचमाती कार से उतरकर
इन्हें
दिन भर के लिए
खरीद लेता है।

शाम होते-होते
वे फिर
वापस रख दिए जाते हैं
उसी चौराहे पर
अगले दिन
फिर बिकने के इंतज़ार में।

इनका आवास
शहर के नक्शे से बाहर होता है,
क्योंकि
इनके हिस्से में
कोई स्थायी पता नहीं होता।

निर्माणाधीन अट्टालिकाओं के साये में,
बजबजाती नालियों के किनारे,
तिरपालों और अधूरे सपनों के बीच
ये बसते हैं
उन्हीं इमारतों के पास
जिन्हें वे बनाते हैं,
पर
जिनमें कभी रह नहीं पाते।

आज के दिन
व्याख्यानों के केंद्र में
इन्हें रखा जाएगा
और
मंच से उतरते ही
फिर
हाशिए पर धकेल दिया जाएगा।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

व्यवस्था की लाश

जीतू मुंडा,
तुमने अपनी बहन का कंकाल उठाया
यह साबित करने के लिए
कि वह सचमुच मर गई है।

 

पर तुम भूल गए
जिनके सामने तुम खड़े थे,
उनके कंधों पर पहले से ही
सच और संवेदना की लाशें सड़ रही थीं।

 

उनकी आँखों की शर्म
और कानों की सुनवाई
किसी अंधे गोदाम में गिरवी रखी जा चुकी थी,
जहाँ हर चीख
फाइल बन जाती है,
और हर फाइल पर
धूल की सरकारी चादर डाल दी जाती है।

 

फिर भी
तुम हारे नहीं,

 

क्योंकि तुम्हारे कंधे पर
सिर्फ एक कंकाल नहीं था,
पूरी अंधी व्यवस्था का
जिंदा सबूत लटका हुआ था।


रविवार, 26 अप्रैल 2026

पसलियों की गणना

सुना है
जनगणना होने वाली है,
और इन दिनों
मकान गिने जा रहे हैं।

काश
इस गणना से पहले
हो पाती
बेमकानों की गिनती।

तुम गिन लोगे
छत, दीवार, खिड़कियाँ, पर्दे
पर छूट जाएगा
वो घर”,
जिसने आसमान को ही
अपनी छत मान लिया है।

तुम्हारे आँकड़ों में दर्ज होंगे
ईंट, पत्थर, फर्श की डिज़ाइन
एक सजी-संवरी संख्या-तालिका,
पर नहीं होगा कोई पता
उनका,
जिनकी रातें
फुटपाथों, डिवाइडरों
और सड़कों के किनारों पर कटती हैं
जहाँ हवा भी
पहुँचने से पहले
हिचकती है।

क्या तुम्हारे प्रपत्र में
कोई जगह है
उनके लिए
जिनका शरीर ही मकान है,
झलकती पसलियाँ दीवार,
हथेलियाँ दरवाज़े,
और आँखें
एक अधखुली खिड़की,
जिससे झाँकती है
भूख, ठंड और इंतज़ार?

या फिर इस बार भी
वे सिर्फ अनुमानबनेंगे,
औपचारिकताओं में दर्ज होकर
आँकड़ों की भीड़ में
बिना गिने ही
गायब कर दिए जाएँगे?

और अंत में
जब गिने जा रहे हैं
मकान और इंसान,
तो क्या कभी
पीड़ा और संत्रास की भी
कोई गणना होगी?

या फिर
दर्द हमेशा की तरह
आँकड़ों से बाहर ही
बेघर रह जाएगा

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

विलुप्त होती प्रजाति

एक समय था—
जब ईमानदार और सच्चरित्र लोग
बहुतायत में पाए जाते थे।

पर बदले हुए इस माहौल में
वे खुद को ढाल न सके,
न सीख पाए समझौतों की भाषा—

और फिर
डार्विन के सिद्धांत के अनुसार
धीरे-धीरे
विलुप्त होते गए।

अब बची हैं बस
उनकी कहानियाँ,
कुछ दुर्लभ किस्से—
जिन्हें सुनकर
लोग मुस्कुरा देते हैं,
मानो कोई कल्पना हो।

मगर यह पूरी सच्चाई नहीं—
इस प्रजाति का
सम्पूर्ण विनाश अभी हुआ नहीं है।

दृष्टिगोचर न सही,
भीड़ भरे शहरों में
वे बुझती हुई बत्तियाँ हैं—
जो हर झोंके के साथ
और मद्धम पड़ती हैं,
पर अभी भी जल रही हैं।

शायद वे सुषुप्त हैं,
अनुकूल समय की प्रतीक्षा में—
या फिर
हमारी नज़रों से बचकर
अब भी
ईमानदारी जी रहे हैं।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

आज़ादी का भ्रम

चलते-चलते अक्सर मैं
किसी चौराहे पर रुकता हूँ,
अनगिनत पैरों के निशानों के बीच
अपने निशान खोजता हूँ।

पर ठहरकर जब देखता हूँ—
तो चौंक जाता हूँ,
ये सारे निशान
मेरे ही पैरों के होते हैं।

सच तो ये है—
मंज़िल की तलाश में
मैं हर रास्ते पर चला हूँ,
हर मोड़ को अपनी मर्ज़ी समझा है।

और हर चौराहा
मुझे यही समझाता रहा—
कि चुनना मेरा हक़ है।

जबकि हक़ीक़त ये थी—
हर बार
मेरे सामने रखे गए थे
पहले से तय रास्ते।

और मैं—
आज़ादी के भ्रम में
उसी रास्ते पर निकल पड़ता रहा,

बस…
अगले चौराहे तक।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

अधूरी पूर्णता

किसी ने पूछा था क्या है कविता?”
मैंने कहा

कविता अविरल प्रवाह है,
स्वयं से मिलने की अथक चाह है।
यह कोई प्रयोग नहीं,
यह तो अथाह है
जिसे मापा नहीं जा सकता,
सिर्फ महसूस किया जा सकता है।

कविता शब्दों में कैद नहीं होती
वह शब्दों से टकराती है,
उन्हें तोड़ती है,
और खामोशी को भी आवाज़ दे जाती है।

जहाँ भाषा हार मान लेती है,
वहीं से कविता अपनी ज़िद शुरू करती है।

कविता कोई निष्कर्ष नहीं
वह तो एक दरवाज़ा है,
जो हर बार खुलता है
किसी नए अर्थ की ओर।

कविता सिर्फ शुरुआत है
और वही कविता सबसे पूरी है
जो अधूरी रह जाती है,
क्योंकि
कविता कभी पूरी नहीं होती।