मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

भूख: विकास की अनचाही गलती

क्या कहारोज़गार चाहिए?
तुम भूखे हो?
शर्म नहीं आती!
इस तरह तो तुम
देश को बदनाम करने की
साज़िश रच रहे हो।

क्या तुम्हें नहीं पता
हमारा देश
विश्व अर्थव्यवस्था के
तीसरे पायदान पर है?

हमारी उपलब्धियाँ देखो
धर्म-रक्षा के नाम पर
करोड़ों रुपये
पानी की तरह बहाए जा रहे हैं।

क्या तुम्हारी भूख
धर्म से बड़ी है?

उपलब्धियों का आँकड़ा
इतना विशाल है
कि केरल, कश्मीर और
बंगाल की फ़ाइलों से निकलकर
कुछ नाम
विदेशी फ़ोल्डरों तक पहुँच गए

जहाँ अपराध
सत्ता से भी
ज़्यादा नंगा है।

सुनो
तुम्हारे पेट की यह मरोड़
भूख नहीं,
विकास की राह का
एक बहुत बड़ा रोड़ा है।

क्या तुम्हें नहीं दिखतीं
आसमान छूती मूर्तियाँ?
क्या उनकी चमक में
तुम्हारी झुर्रियाँ
मिट नहीं जानी चाहिए थीं?

और हाँ
जब विदेशी अख़बारों में
हमारा नाम आता है,
तो सीना गर्व से
चौड़ा हो जाता है।

मुद्दा चाहे
फ़ाइल्सका हो
या घोटालोंका
नाम तो हुआ न!

तो चुप रहो।
अपनी अंतड़ियों को समझाओ
कि राष्ट्रहित में
कभी-कभी
भूखा रहना ही
सबसे शुद्ध
देशभक्ति है।

शनिवार, 31 जनवरी 2026

जो चुप है वही ज़िंदा है


माना रेप हुआ है
पर घबराइए मत
नगर के चरित्र पर
इससे कोई दाग़ नहीं पड़ता।
दाग़ तो कपड़ों पर लगते हैं
संस्थाओं पर नहीं।

यह रेप नहीं है
यह एक प्रक्रिया है
जो कभी-कभी
अनुशासन सिखाने के लिए
अपने आप घट जाती है।

अपराधी की तलाश व्यर्थ है
क्योंकि यहाँ
हर आदमी
सम्मानित है
कोई पिता है
कोई पति
कोई संस्कारी मतदाता।


और सबसे बड़ी बात—
रेपिस्ट भी इसी सम्मानित समाज का अंग है।


औरत अगर टूटी है
तो इसका मतलब यह नहीं
कि किसी ने तोड़ा है
संभव है
वह पहले से ही
कमज़ोर थी।

कत्ल हुआ है
हाँ, हुआ है
पर हत्या शब्द
बहुत असभ्य है
इसे यूँ कहिये
जीवन की समयपूर्व समाप्ति


पोस्टमॉर्टम बताता है
चाक़ू मिला
पर हाथ नहीं मिला
गोली मिली
पर उँगली नहीं मिली
इसलिए
हत्यारा नहीं मिला।

वैसे भी
मरा हुआ आदमी
क्या साबित करेगा?

जो ज़िंदा हैं
उनकी गवाही ज़्यादा ज़रूरी है
और ज़िंदा वही है
जो चुप है।

न्यायालय की दीवारों पर
इंसाफ़ टंगा है
पर पहुँच से बाहर
ठीक सीसीटीवी की तरह
सब देखता है
कुछ नहीं पकड़ता।


अख़बारों से अनुरोध है
इसे सनसनी न बनाएँ
यह नगर
संवेदनशील नहीं
सुसंस्कृत है।

और अंत में
एक सर्वसम्मत निर्णय
यह अपराध नहीं
यह एक आँकड़ा था
जो गलती से
इंसान बन गया।

गुरुवार, 29 जनवरी 2026

चुप भी इक गुनाह है (गज़ल)

 

लुटेरों के हाथों में अब है कमान,

डरी सहमी बैठी है हर इक दुकान।

 

जहाँ खोद बुनियाद सब चुप खड़े,

हैं लरज़ते हुए आज खामोश मकान।

 

गए ढूँढने जो यहाँ क़ातिलों को,

मिला उनके हाथों में क़त्ल-ओ-सामान।

 

थी बस्ती कभी ख़्वाब की रौशनी,

बना मोड़ हर आज तो श्मशान।

 

उठी जब भी ज़ुल्मों के ख़िलाफ़ उँगली,

बदलने लगे चेहरे सब हुक्मरान।

 

जहाँ लोग वहशी, वहीं ख़ौफ़ है,

थमी हर ढलान और थमा तूफ़ान।

 

गुनाह है ये 'वर्मा' कि तुम चुप रहो,

जले शहर और सब को है इत्मिनान।


लरज़ते = कांपते 

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

"स्पर्शबिंदु" - "The Tangent"


मैं जानता हूँ
तुम मुझे समग्र रूप से
स्पर्शित नहीं कर सकती
क्योंकि
तुम एक सरल रेखा हो
और मैंवृत्त


तुम्हारा स्पर्श
किसी एक बिंदु पर
आकर ठहर जाता है,
जबकि मेरा अस्तित्व
घूमता रहता है
अपने ही केंद्र के चारों ओर।

तुम आगे बढ़ती हो
दिशा के भरोसे,
मैं लौट आता हूँ
हर बार
खुद तक।


हम मिलते हैं
संभवतः
किसी स्पर्शबिंदु पर,
पर वहीं
हमारी असहमति भी जन्म लेती है
तुम आगे बढ़ जाना चाहती हो,
और मैं
उस क्षण को
पूरा करना चाहता हूँ।


इसलिए
तुम मुझे छू तो सकती हो,
समेट नहीं सकती
जैसे रेखा
वृत्त को
समझ तो ले,
पर बन नहीं सकती।

चलो, एक सहमति बनाएँ कि
हम न रेखा रहें, न वृत्त
हम एक नया आयाम बनें,
जहाँ ठहरना भी गति हो,
और भटकना भी
एक मंज़िल।

रविवार, 25 जनवरी 2026

हस्ताक्षर में साज़िश

 

चलो जाँच-जाँच खेलते हैं
सच को छिपाने के लिए यह ज़रूरी है।

जाँच रिपोर्ट में
पोस्टमार्टम, फ़ॉरेंसिक
जैसे शब्द शामिल करना मत भूलना
शब्दों से लाश ढँक दी जाती है
ताकि बदबू बयान न दे।

सबसे बड़ी बात,
बलात्कार शब्द को फटकने भी मत देना,
वरना लोग
मोमबत्तियाँ लेकर सड़कों पर आ जाएँगे।

कारण-ए-मौत को
परिस्थितिजन्य लिख देना,
और परिस्थितियाँ
हम तय करेंगे।

खून अगर सड़क पर फैला हो
तो लिखना
नमूने सुरक्षित नहीं थे।

आँसू अगर गवाह हों
तो लिखना
भावनात्मक साक्ष्य अमान्य है।

और सुनो
घटनास्थल पर गाड़ियों का हुजूम दौड़ाते रहना,
मीडिया से कहनाजाँच जारी है।

कैमरों की फ़्लैश चमके
तो नज़रें झुकाए रखना,
ताकि लगे कि तुम काम कर रहे हो।

जाँच पूरी हो जाए
तो फ़ाइल पर धूल जमने देना
धूल भी एक तरह का
राष्ट्रीय सुरक्षा कवच है।

अंत में निष्कर्ष जोड़ देना
कोई साज़िश नहीं पाई गई”,
क्योंकि साज़िश
हमेशा रिपोर्ट लिखने वालों के
हस्ताक्षर में होती है।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

प्यास का प्रमाण-पत्र

 

गंगा

तुम
अपनी निश्छल लहरों के संग
हर पत्थर को छूती
आगे बढ़ती रहीं।

तुमने
कभी नहीं पूछा
किस जात का है यह पत्थर,
किस धर्म का है यह किनारा।

तुम
बस बहती रहीं।

लेकिन
हरिद्वार आते-आते
तुम
मज़हबी कैसे हो गईं, गंगा?


यहाँ
तुम्हारे ही किनारों ने
कब
और क्यों
उठा लीं तख़्तियाँ
यहाँ ग़ैर-हिन्दू का प्रवेश वर्जित है!


गंगा!
यह तुम्हारी भाषा तो नहीं थी।

क्या कभी
तुम्हारे किनारों को
तख़्तियाँ थमाने वालों ने
उन नालों का हिसाब दिया
जो तुम्हारे अस्तित्व को
गंदा करते हैं?

क्या कभी उन्होंने बताया
कि उन नालों में
किस-किस धर्म का
मल-मूत्र
तुम्हें सौंपा जा रहा है?

क्या जल भी
अब पहचान माँगता है?
क्या प्यास
अब प्रमाण-पत्र देखती है?

अगर ऐसा है
तो फिर बहना छोड़ दो, गंगा।

क्योंकि
जो नदी
मनुष्य से छोटी हो जाए,
वह नदी नहीं रहती
सिर्फ़
एक दीवार
बन जाती है।

बुधवार, 21 जनवरी 2026

ज़रूरी है युद्ध—


ज़रूरी है युद्ध
किसी ज़मीन के लिए नहीं,
किसी झंडे के लिए नहीं,
ज़रूरी है युद्ध
उस थाली के ख़िलाफ़
जिसमें रोज़
अन्याय परोसा जाता है
और कहा जाता है
चुप रहो,
यही राष्ट्र है।

ज़रूरी है युद्ध

उस भाषा के ख़िलाफ़
जो हत्या को
सामान्य क्षति
और भूख को
संयोगकहती है।

सवाल यहाँ बदतमीज़ी हैं,
असहमति गुनाह,
और चुप्पी
देशभक्ति।

हम तालियाँ बजाते रहे
और आकाश बिकता रहा।
हम चुप रहे
और वही
सबसे बड़ा अपराध था।

याद रखो
तानाशाही
तालियों से पैदा होती है,
और आज़ादी
एक अकेली
काँपती आवाज़ से।

ज़रूरी है युद्ध
क्योंकि शांति के नाम पर
हर असहमत आवाज़ के सामने
हादसों के गड्ढे तैनात किये जा रहे हैं.
इसलिए
यह कोई नारा नहीं,
कोई उत्सव नहीं।

बस इतना जान लो
ज़रूरी है
यह युद्ध।

सोमवार, 19 जनवरी 2026

'ना' को बाहर आने दो

 

थाली-ताली बहुत बजा ली,

अब असली स्वर को आने दो,

जो भाषा सच को निगल गई,

उस भाषा को मर जाने दो।

 

अकेले होने का डर तज दो,

तुम भीड़ में भी तन्हा हो,

अब काँपते होंठों से ही सही,

पर 'ना' को बाहर आने दो।

 

जो मस्तक झुकते आए हैं,

अब उन्हें जरा तन जाने दो,

जो न्याय की बाँसुरी टूट गई,

उसे फिर से स्वर बन जाने दो।

 

बाज़ार सजा है झूठों का,

तुम अपना सच ले अड़ जाओ,

इतिहास लिखे जो कायरता,

उस पन्ने को फट जाने दो।

 

ज़मीर की सूखी धरती पर,

विद्रोह के अंकुर फूटने दो,

जो ज़ंजीरें रूह को जकड़े हैं,

उन कड़ियों को अब टूटने दो।

 

मत पूछो अंजाम क्या होगा,

बस कदम को आगे बढ़ने दो,

जो राख दबी है सीने में,

उसे शोला बनकर जलने दो।

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

तुम : एक संभावना (गज़ल)

 

तुम आसपास कहीं नहीं, फिर भी हवा हो क्या
ख़यालों की सरगोशी की तुम सदा हो क्या

शाख़-ए-वजूद हिल उठे, एहसास जी उठें
कुछ अधमरे जज़्बातों की तुम दवा हो क्या

लबों से कुछ कहो न कहो, आँखें कह गईं
बिन छुए दिल को मिल जाए जो, वो दुआ हो क्या

नींदों के दरमियाँ तुम सपनों में आ गईं
बिखरी हुई सी ज़ुल्फ़ों की तुम अदा हो क्या

जिस दर्द से गुज़र गईं, वो दर्द ही न रहा
पत्थर को भी पिघला दे, ऐसी रवा हो क्या

नब्ज़ देखी नहीं तुमने, हाल कह दिया
मेरे हर टूटे लफ़्ज़ की तुम पुनर्नवा हो क्या

“वर्मा” जो ठंड में भी सुलगता रहा चुपचाप
उस सुलगन को संभाले जो, वो तवा हो क्या

गुरुवार, 15 जनवरी 2026

Zero Watt वाला प्रेम


मुझे 'Zero Watt' वाला प्रेम पसंद है

जो धीमा ही सही, पर

अविराम चले,

बिना शोर के,

बिना दिखावे के,

बस एक धुंधली सी रोशनी देता हुआ।

 

यह प्रेम ऊर्जा जलाता नहीं,

ऊर्जा सहेजता है

यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त है।

 

वह 1000 Watt का बल्ब

पूरे शहर को रौशन करने की ज़िद में

खुद को जला बैठता है,

और अपनी ही तपिश से

फ्यूज हो जाता है।

 

जबकि Zero Watt का बल्ब

न बहुत चमकता है,

न तालियाँ बटोरता है,

पर जल्दी टूटता भी नहीं,

और न जल्दी फ्यूज होता है

 

शायद... लंबा चलना हो तो

थोड़ा कम जलना ज़रूरी है।