एक समय था—
जब ईमानदार और सच्चरित्र लोग
बहुतायत में पाए जाते थे।
पर बदले हुए इस माहौल में
वे खुद को ढाल न सके,
न सीख पाए समझौतों की भाषा—
और फिर
डार्विन के सिद्धांत के अनुसार
धीरे-धीरे
विलुप्त होते गए।
अब बची हैं बस
उनकी कहानियाँ,
कुछ दुर्लभ किस्से—
जिन्हें सुनकर
लोग मुस्कुरा देते हैं,
मानो कोई कल्पना हो।
मगर यह पूरी सच्चाई नहीं—
इस प्रजाति का
सम्पूर्ण विनाश अभी हुआ नहीं है।
दृष्टिगोचर न सही,
भीड़ भरे शहरों में
वे बुझती हुई बत्तियाँ हैं—
जो हर झोंके के साथ
और मद्धम पड़ती हैं,
पर अभी भी जल रही हैं।
शायद वे सुषुप्त हैं,
अनुकूल समय की प्रतीक्षा में—
या फिर
हमारी नज़रों से बचकर
अब भी
ईमानदारी जी रहे हैं।











