शहर
त्रस्त था
अँधेरों से।
उन्होंने
संविधान में संशोधन किया
और
अँधेरे का नाम
उजाला रख दिया।
फिर
मीडिया ने घोषित कर दिया—
अब शहर में
अँधेरा नहीं है,
सिर्फ़
उजाला दिखाई देता है।
संस्कारित-सभ्यों के बीच आदमखोर कबीले क्यूं हैं ?
शहर
त्रस्त था
अँधेरों से।
उन्होंने
संविधान में संशोधन किया
और
अँधेरे का नाम
उजाला रख दिया।
फिर
मीडिया ने घोषित कर दिया—
अब शहर में
अँधेरा नहीं है,
सिर्फ़
उजाला दिखाई देता है।
आमतौर पर
सत्ता
कान रहित होती है,
और उसकी अ-आंख होती है
जो
देखती कम,
दिखाती अधिक हैं।
जनता
की वे चीखें
जिनसे
दीवारें तक
भरभराकर गिर सकती हैं,
सत्ता की चौखट तक पहुँचते-पहुँचते
फुसफुसाहट में बदल जाती हैं।
फिर
सत्ता
उस फुसफुसाहट का
अनुवाद करती है—
अपनी सुविधा की भाषा में,
और
रिटर्न गिफ्ट की तरह
वही अनुवाद
जनता को लौटा देती है।
उसका
मुँह
टीवी और रेडियो हैं,
जो हर चीख को
ध्वनिपरिवर्तक की तरह
उपलब्धियों के शोर में
बदल देते हैं।
भूख—
आँकड़ा बन जाती है,
बेरोज़गारी—
आश्वासन,
दमन—
व्यवस्था,
और प्रतिरोध—
विकास में बाधा।
लेकिन
हर आवाज़
इतनी आसानी से
नहीं मरती।
कुछ
स्वर
इतिहास की राख में
दबे हुए अंगार होते हैं।
वे
चुप रहते हैं,
सुलगते रहते हैं,
समय की प्रतीक्षा करते हैं।
फिर
एक दिन
वे राख झाड़कर उठते हैं
और
अपनी ही भाषा में
बोलते हैं।
उस
दिन
सत्ता के सारे
ध्वनिपरिवर्तक
शोर करते रह जाते हैं—
मगर
बधिर हो जाते हैं।
क्योंकि
कुछ आवाज़ें
सुनी नहीं जातीं,
वे इतिहास लिखती हैं।
ऊँची जाति वाले ने
नीची जाति वाले से कहा—
तुम नीची जाति के हो।
नीची जाति वाला
कुछ नहीं बोला।
बस
चुपचाप
ढूँढने निकल पड़ा—
अपने से नीची
जाति वाले को।
और इस तरह
जाति की सीढ़ी
एक पायदान और
लंबी हो गई।
धवल
कागज़ पर
स्याही
धब्बा नहीं होती,
वह
कागज़ का श्रृंगार होती है।
कभी
उसी स्याही ने
"वंदे
मातरम्" लिखा था,
और
उसी स्याही ने
दमन के परचम को
स्याह कर दिया था।
उसी
स्याही ने
"खोल
दो" लिखा,
तो
विभाजन की सियासत का
नंगा चेहरा
दुनिया के सामने रख दिया।
स्याही
इंकलाब का
दूसरा नाम है।
कालिख
नहीं जानती
स्याही की ताक़त।
उसे
क्या मालूम—
काला होना
और
इतिहास लिखना,
दो अलग-अलग बातें हैं।
और
जब
सत्ता के इशारे पर
यही स्याही
जनसंघर्ष के
आदमकद चेहरे पर
उछाली जाती है,
तब
वही स्याही
चेहरे पर
कुछ ऐसा लिखती है
कि
चेहरा
काला नहीं होता,
बल्कि
रक्ताभ हो
दमक उठता है।
हवा
में गूँज रही है
एक पंक्ति—
"लड़की होकर गाली दे रही है।"
पर
इससे पहले
किसी ने कब कहा था—
"लड़का होकर गाली दे रहा है?"
या
फिर—
"लड़की होकर भी चुप क्यों रहती है?"
उनका
प्रतिकार
यदि गालियों की शक्ल में भी फूटा,
तो याद रखिए—
हर गाली से पहले
बहुत-सी अनसुनी चीखें
दम तोड़ चुकी होती हैं।
मैं
गालियों का पक्षधर नहीं,
प्रतिकार का पक्षधर हूँ।
फिर
भी
गालियाँ
देती लड़कियाँ
मुझे अच्छी लगती हैं,
क्योंकि गालियाँ
इस मुक्ति की
पहली सीढ़ी भर हैं।
प्रतिकार
के इस स्वर को
एक दिन
गालियों से परे
अपना मुहावरा गढ़ना होगा।
तंग
गलियों से निकलकर
खुले आसमान में
अपनी आवाज़ की
पहचान बनानी होगी।
कुछ शब्द
बिना बोले
निःशब्द कर
देते हैं।
कुछ शब्द
बहुत बोलते
हैं,
पर उन्हें
सुनता कोई
नहीं।
वाक्यों के
अर्थ
ज़रूरी नहीं
कि
शब्दों के
अर्थ से
मेल खाएँ।
अक्सर
शब्द कुछ और
कहते हैं,
और वाक्य
कुछ और।
कभी-कभी
महज़ एक
अल्पविराम,
या एक
अर्धविराम,
अर्थ को
अनर्थ तक
पहुँचा देता है।
फ़र्क देखिए—
बोलो मत, सुनो।
और
बोलो, मत सुनो।
ध्वनि-विज्ञान
भी
कहाँ समझ पाया
है
शब्दों की
पूरी यात्रा।
कभी
अस्फुट-सा
उच्चरित
महज़ तीन शब्द—
"आई लव
यू"
किसी एक कान
में नहीं,
पूरे अस्तित्व
में
प्रतिध्वनित
होते हैं,
और फिर
अनुनाद बनकर
बहुत दूर तक
गूँजते रहते
हैं।
पहले होर्डिंग का जन्म
यक़ीनन
पहले झूठ के साथ हुआ होगा।
और सतरंगी पहला झूठ
शायद
भाषा के आविष्कार के साथ
जन्मा होगा।
भाषा-विहीन समय में
झूठ
अगर था भी,
तो गूँगा था—
अपने ही भीतर
कैद।
फिर
जैसे-जैसे
हम
सभ्य (तथाकथित) होते गए,
झूठ ने
शब्द ओढ़ लिए,
फिर रंग,
फिर नारे,
फिर मुस्कराते चेहरे।
और एक दिन
वही आवरण
होर्डिंग बन गया।
क्योंकि
होर्डिंग
और कुछ नहीं—
झूठ का
सबसे विशाल चेहरा है।
मेरे दिल में
जितना भी प्रेम था,
सब मैंने फिक्स
डिपॉजिट में
तुम्हारे पास रख
दिया।
अब मैं उसके ब्याज से ही
अपना काम चला रहा हूँ,
कभी यादों की आमदनी से,
कभी जुदाई की देयता से
हिसाब मिला रहा हूँ।
मेरे मन में अक्सर
फिक्स डिपॉजिट
तोड़कर
मूल प्रेम वापस लेने
का
विचार भी आया।
पर उस दृढ अनुबंध की
शर्तें
याद आ जाती हैं,
जिसमें अवधि के
स्थान पर
सिर्फ एक शब्द लिखा
था—
"निर्बाध"।
और फिर अगर
मैं अनुबंध तोड़ भी
दूँ,
तो कैसे संभाल
पाऊँगा
वह समस्त प्रेम—
जिसमें मेरे प्रेम
का मूलधन
और तुम्हारे प्रेम
का ब्याज
दोनों शामिल हैं।
क्योंकि यह सिर्फ
जमा पूँजी नहीं,
एक साझा खाता है,
जिसकी हर एक किस्त
में
हम दोनों का होना जरूरी
है।
एक नाबालिग चिड़िया
उड़ान का संतुलन सीख रही थी।
उसकी आँखों में
बस आसमान की ऊँचाइयाँ थीं।
तभी
उड़ान पर अपना एकाधिकार समझने वाले
बीस-बाइस गिद्ध
उस पर टूट पड़े,
और नोच डाला
उसका पूरा आकाश।
कई सफेद कबूतर
इस पूरी वारदात के गवाह थे।
उन्होंने
धीरे से नज़रें फेर लीं
और शांति का मुखौटा ओढ़े
आसमान निहारते रहे।
उनका तर्क था—
यदि वे हस्तक्षेप करते,
तो उनके शफ़्फ़ाक वजूद पर
दाग़ लग जाता।
फिर देखते-ही-देखते
हर नुक्कड़ पर
एक नुची हुई चिड़िया
दम तोड़ती दिखाई देने लगी।
कुछ शुतुरमुर्ग भी थे,
जो सच से ज़्यादा
रेत की तलाश में थे।
कुछ मोमबत्तियाँ जलीं,
कुछ नारे गूँजे,
कुछ तस्वीरें बदलीं,
कुछ बयान आए,
कुछ आश्वासन दिए गए।
मगर
गिद्धों की उड़ान पर
कभी कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगा।
और अंत में—
कठघरे में
हर बार
चिड़िया ही खड़ी मिली।
हँसते हुए चेहरे ओढ़े अक्सर
ये रोते हैं,
पता है फसल का हश्र, फिर भी बोते हैं।
चीखती हुई भूख में
क्या-क्या खोते हैं.,
पेट और पीठ अब गले लगकर
रोते हैं।
बंद मकानों में झाँकना नहीं
चाहिए,
वहाँ उघड़े हुए बेहाल सपने
सोते हैं।
आँकड़ों की दीवार आवाज़
घोंट देती है,
रिसते छप्पर सच को बारिश
में डुबोते हैं।
मत पूछना कि कितने हलाक हो
गए,
चादर में लिपटे ख़्वाब भी
अब रोते हैं।
ख़ुद का ही जिस्म ख़ुद उठाकर
ढोते हैं।
चुम्बन और चुम्बक में
केवल ध्वन्यात्मक साम्य ही नहीं,
स्वभाव का रिश्ता भी है।
दोनों खींच लेते हैं
अपने-अपने ध्रुव की ओर।
चुम्बकीय फ्लक्स* की
अदृश्य लय में
विपरीत ध्रुव
प्रगाढ़ आलिंगन में बँध जाते हैं।
फिर अलग होने के लिए
अतिरिक्त बल लगाना पड़ता है।
अमूर्त प्रेम
जब मूर्त होने लगता है,
तो वह
संकोच के हल्के स्पर्श से
होकर गुजरता है।
स्पर्शजनित अनुनाद
दैहिक कायनात को प्रकम्पित करता है;
वहीं से जन्म लेता है
एक चुम्बन,
जो प्रगाढ़ आलिंगन को आमंत्रित करता है।
उस
क्षण
आकर्षण का अदृश्य फ्लक्स
दो देहों को
एक अनुभव में बदल देता है।
*फ्लक्स = चुम्बकीय बल रेखाएँ
मैंने
एक शब्दकोश के
समस्त शब्दों को
निर्देशित किया—
एक कविता के लिए।
और उन्हें
एक विस्तृत जाल की तरह
फैला दिया
शब्दों से
शब्द टकराते रहे,
कुछ इधर,
कुछ उधर
बिखरते रहे।
पर कविता के नाम पर
उपलब्धि वही रही—
वह इस जाल में नही फंसी
और फिसल गयी
मैंने
हार नहीं मानी।
इस बार
कुछ अलग करने की ठानी।
शब्दकोश से
बाहर निकल आया,
और
चिंतन के भीतर उतर गया।
वहीं
मुझे कुछ शब्द मिले—
परेशान,
सहमे,
प्रतीक्षारत।
वे ऐसे दिखे
जैसे
अभी-अभी रोपे गए
धान के नन्हे पौधे—
जिन्हें
कविता नहीं,
बस
थोड़ा-सा पानी,
थोड़ी-सी धूप
और
बहुत-सा समय चाहिए था।
मैंने
उन्हें फिर
निर्देशित नहीं किया
किसी कविता में ढलने के लिए।
बस उन्हें समय दिया
वे शब्द नहीं,
बीज थे।
समयांतराल के बाद
वे फूटे,
अंकुराए,
और जब कविता बने—
तो पता चला,
शब्द नहीं रो रहे थे,
एक नन्ही बच्ची रो रही थी।
और
कुछ शब्दों की शक्लें
क्षत-विक्षत कबूतरों जैसी थीं—
जिनकी उड़ान
किसी गिद्ध ने
उड़ने से पहले ही
नोच डाली थी।
रोटियों
से खेलने वाले
रोटियों के लिए तरसते
भूखे लोगों को
रोटियाँ बाँटते हैं।
फ़र्क़ बस इतना है कि
ये रोटियाँ
आटे से नहीं,
आँकड़ों से गढ़ी जाती हैं।
इनका जन्म
खेतों और चूल्हों में नहीं,
सात सितारा होटलों के
ठंडे, चमकदार कमरों में होता है,
जहाँ भूख पर
लंबी-लंबी चर्चाएँ होती हैं,
मगर
भूख
कभी उस मेज़ तक नहीं पहुँचती।
इन रोटियों पर
धार्मिक वैमनस्य की
मीठी परत चढ़ा दी जाती है,
और कृत्रिम आँकड़ों से
ढक दिया जाता है
भूख के सूचकांक का गिरता हुआ सच।
फिर
भूखे और नंगे लोग
अनजाने ही
एक ऐसे चक्रव्यूह में उतर जाते हैं
जहाँ
रोटियों की जगह
नारे परोसे जाते हैं,
और वे
अपने खाली पेट की आवाज़ दबाकर
उसी व्यवस्था की
जय-जयकार करने लगते हैं
जो उनकी थाली में
रोटी कभी नहीं आती—
सिर्फ़ रोटी के आँकड़े आते हैं।
इंसान औ' इंसानियत की कमी है, बाकी सब ठीक है,
हैवानियत की गिरफ़्त
में ज़मीं है, बाकी सब ठीक है।
अट्टहास और विद्रूप
हँसी से गूँज रहा है पूरा शहर,
मुस्कानों के पीछे चेहरा मातमी है, बाकी
सब ठीक है।
सच बोलना, इंसाफ माँगना अब जुर्म ठहरा है यहाँ,
ज़िंदगी बिखर जाना
लाज़िमी है, बाकी सब ठीक है।
ख़ौफ़ के साये में
पल रही हर नई पीढ़ी की ख़ामोशी,
हर ज़ेहन में एक
अनकही कमी है, बाकी सब ठीक है।
भूख की आँखों में
सपनों का आख़िरी दीपक बुझ गया,
आँकड़ों में तिलस्मी ख़ुशहाली थमी है, बाकी
सब ठीक है।
लब सिल गए हैं डर के मारे शहर के हर
गवाह के,
क़ातिल के हक़ में हर गवाही थमी है, बाकी
सब ठीक है।
बच्चों के बस्ते में किताबों की जगह नफ़रतें रख दीं,
रूह-ए-तालीमआज सहमी-सहमी है, बाकी
सब ठीक है।
'वर्मा' सच लिखने की आदत छोड़ भी दे तो कैसे छोड़े,
स्याही में आज भी ज़िंदा आदमी
है, बाकी सब ठीक है।
अक्सर
मैं
अपने घर के बाहर
पत्र-पेटी में
एक कोरा काग़ज़ डाल देता हूँ।
फिर
चाभी से उसे खोलता हूँ,
जैसे डाकिया
अभी-अभी तुम्हारा ख़त छोड़ गया हो।
उस कोरे काग़ज़ को
भीतर लाकर
बड़े मनोयोग से पढ़ता हूँ।
यक़ीन मानो,
उस ख़त की चुप्पी
तुम्हारी चुप्पी से
हूबहू मेल खाती है।
तुम्हारी इसी ख़ामोशी ने
न जाने कितना कुछ
कहे जाने से,
और कितना कुछ
सुने जाने से
वंचित कर दिया।
पर
यह भी सच है—
जब-जब
तुमने अपने होंठ भींचकर
शब्दों को क़ैद करना चाहा,
तुम्हारी आँखें
चुपके से
सारी चुगली कर जाती थीं।
उस
कोरे काग़ज़ पर
आज भी
तुम्हारी वही चुगलखोर आँखें
उभर आती हैं।
और तुम्हारी अनुपस्थिति में भी
इस कोरे काग़ज़ के सहारे
हमारे बीच बचा हुआ
वह अनकहा संवाद
फिर से जी लेता हूँ।