शनिवार, 6 दिसंबर 2025

नकारे गये अस्तित्व की कहानी


वह टोटो चलाती है,

लोगों को 'मेट्रो स्टेशन'

छोड़कर आती है।

"अबे ओ-देखकर चल!" -

यह उसका जुमला है।

 

उसे गालियों से भी

परहेज नहीं है,

असल में गालियाँ

उसकी ढाल हैं, कवच हैं,

जिनसे वह

हर दिन टकराते

उस रूखे संसार को

थोड़ा-सा दूर रखती है।

 

वह इसके माध्यम से

अपने नकारे गये अस्तित्व की

कहानी सड़क पर लिखती है.

धूल-धक्कड़ में

अपने सपनों का नाम

धीरे-धीरे उकेरती है।

 

वह सड़क-संस्कृति को

आत्मसात कर चुकी है -

जानती है कि यहाँ

धीरे चलने वालों को

धक्का मिलता है,

और खामोश रहने वालों की

कोई सुनवाई नहीं होती।

 

वह जानती है -

डरकर नहीं -

लड़कर ही

अपना हक मिलता है।

उसके चेहरे पर

झिलमिलाता पसीना

उसकी जद्दोजहद का

सबसे खूबसूरत आभूषण है।

 

वह रोज साबित करती है -

कि एक औरत

सिर्फ गाड़ी ही नहीं चलाती -

अपने हिस्से की दुनिया भी

खुद चलाती है।

गुरुवार, 4 दिसंबर 2025

मिट न सकी लिपि

कितनी गूँजती हैं
खामोशी से कही बातें;
न जाने कहाँ गुम हो गईं
रोशनी से नहाई रातें।

 

स्मृतियों में सिमट गई है
पलकें झपकाकर
सब कुछ कह देने वाली वह अदा;
होंठ तो खुलते भी नहीं थे
जब तुम बोलती थी।

 

रूबरू होने पर

छुईमुई सी सकुचाकर

नज़र झुकाकर -

पैरो के अंगूठे से जमीन पर  

जो कुछ लिखती थी तुम

मिट नही पाई वह लिपि

मैं अब भी उसे

पढने की फिराक मे हूँ

 

तुम्हारे अनछुए स्पर्श को

अनुवादित करने मे संलग्न हैं

मेरी मानस उंगलिया निरंतर,

आज नही तो कल

शायद मिल ही जाये अर्थ

मंगलवार, 2 दिसंबर 2025

सत्ता का स्व-घोषित घोषणापत्र

 

हाँ, हमें याद हैं

हमारे द्वारा किए गए

तमाम वायदे।

हमने पहले भी कहा था

और आज भी कह रहे हैं -

कभी न कभी

हम इन्हें पूरा करेंगे।

अभी तो हम व्यस्त हैं -

अपने ही अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में।

फेहरिस्त लम्बी है -

अपने-अपनों के लिए विशेष आवंटन,

तमाम योजनाओं का उद्घाटन,

जो जमीन पर नहीं,

फाईलों में दम तोड़ देंगी।

अरे, राज्यों के चुनाव से पहले

हमें गढ़ने हैं -

धार्मिक उन्माद के नारे

देखते नहीं अभी हम व्यस्त हैं -

मंदिरों के बुर्ज पर झंडोत्तोलन में,

कैमरों के सामने

संयुक्त रूप से पूजन में।

 

प्रदूषण-प्रदूषण मत चिल्लाओ

हम इस विषय पर

पंचतारा होटलों में महत्वपूर्ण

परिचर्चाओं की-

एक लम्बी श्रृंखला चला रहे हैं।

समाधान मिलते ही

हम काम भी करेंगे।

बहुत शीघ्र हम प्रदूषणग्रस्त इलाकों का -

हवाई सर्वेक्षण भी करेंगे।

कल ही तो हमने इस विषय पर

एक लम्बा व्याख्यान दिया था।

 

शायद तुमने

हमारी एडवाइजरी पढ़ने की

जहमत नहीं उठाई

इतना ही अगर है डर

तो ...

मत छोड़ो अपना घर।

 

‘‘डरो मत -

प्रदूषण बढ़ने पर

नया नारा जारी करना भी

हमारे एजेंडे में है।’’

रविवार, 30 नवंबर 2025

अर्थ-विसर्जन (The Immersion of Meaning)


चलते चलते 

ये कहाँ आ गया मैं

जुमलों की घास उगी है जहाँ

शब्द बिखरे पड़े हैं

पर अर्थ खो दिए हैं 

- खुद अपने अर्थ

 

रास्ते भटक गए हैं

और ढूढ रहे हैं 

अपने ही पदचिह्न

सिसक रहीं हैं जहाँ सिसकियाँ

हर कथन पर जहाँ हावी हैं हिचकियाँ

 

मेरे ही सवाल

मेरे ही सामने

लेकर खड़ी हो गईं हैं

सवालों की तख्तियाँ

जवाब नदारत है

 

लौटना चाहता हूँ मैं अब,

पर कैसे?

तंज भरे बगावती तेवर के साथ

पैरों ने 

साफ शब्दों में मना कर दिया है।

 

कल शायद मिलूँ

किसी अखबार के

‘‘जनहित सूचना’’ के काॅलम में 

जहाँ लिखा होगा -

‘‘जिसने अर्थ खोजे थे,

वही अर्थ उसे ही निगल गए।’’

शनिवार, 29 नवंबर 2025

“तुम्हारी सोच जलेगी — वह नहीं।” .... (पत्नी कोई वस्तु या खिलौना नही)

 

पत्नी होती है
सहचर, साथी,
चलती है कदम से कदम,
पर तुम्हारी परछाई बनकर नहीं।

वह थकती है, सोचती है,
उलझती है, टूटती है,
और फिर खुद ही
अपने टुकड़ों को जोड़कर
फिर खड़ी हो जाती है
जबकि तुम
आज भी उसके वजूद को
सिर्फ भूमिकासमझने की भूल करते हो।

तुम्हारी वो सड़ी हुई
सामंतवादी सोच
जिसे तुम परवरिश का नाम देते हो
हर बार उसे खिलौना बनाती है,
सामान समझती है,
और बराबरी से तुम्हें
अजीब-सा डर लगने लगता है।

पर सुनो
वह कोई वस्तु नहीं,
न तमाशा, न खिलौना।
वह एक पूरा मन है,
पूरा वजूद
जिसे तुम चाहो या न चाहो,
वह हमेशा बराबरी पर ही खड़ी रहेगी।

अगर तुम्हें औरत में आज भी

चीज़, खिलौना या वस्तु नज़र आती है,
तो तुम्हे ज़रूरत है -
अपनी सोच का पोस्टमॉर्टम करने की।

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

"जानबूझकर अधूरा"

 

पहले हर काम मैं

परफ़ेक्शन से कर देता था,

और वो उलझ जाती थीं

क्योंकि उन्हें मौका नहीं मिलता था

मुझसे शिकवा करने का।

 

मैं समझता हूँ,

तानों में भी एक गहरा अपनापन होता है,

और नाराजगीकभी-कभी

सबसे प्यारी भाषा बन जाती है।

 

अब जान-बूझकर

करता हूँ मंथर गति से कार्य और

छोड़ देता हूँ एक न एक त्रुटि

ताकि वो डाँटें,

बुदबुदाएँ,

और फिर होंठों की कोरों पर

हल्की-सी जीत की मुस्कान लिये

चलती फिरें पूरे घर में।

 

लोग कहते हैं

प्यार देना, निभाना, सँभालना होता है,

पर मैंने सीखा है

कभी-कभी प्यार,

जानबूझकर अपूर्ण होने में भी होता है।

मंगलवार, 25 नवंबर 2025

“पीड़ा का मैग्मा — और आसन्न विस्फोट”

 


जमा हो रहा है
असीमित मात्रा में
लोगों के अन्दर पीड़ा का मैग्मा

जिसे बाहर आने पर
उन्होंने प्रतिबंध लगा रखा है

यह मैग्मा
दिनप्रतिदिन
संघनित हो रहा है,
और दबाव
लगातार बढ़ रहा है

उसे तलाश है
उस सूक्ष्म रास्ते की
जहाँ उनका पहरा
कमज़ोर पड़ता है,
और वह फूट सके
बिना किसी अनुमति के।

मत भूलिए
जिस दिन
यह ज्वालामुखी फूटेगा,

निकलेगी असीमित मात्रा में
दमित तपिश,
आक्रोश का लावा,
और संपीड़ित घुटन की राख।

और उस दिन
नहीं बचा पाओगे
अपने तमाम
सुरक्षित महलों को,
गुप्त ठिकानों को,
बुलेटप्रूफ़ काँच की दीवारों को,

जहाँ बैठकर
तुम
इन पर नियंत्रण करते रहे हो।

क्योंकि प्रकृति की तरह
मानव भी सहता है,
पर अनंत नहीं।

शनिवार, 22 नवंबर 2025

एहसासो के शव

 

मैं अक्सर
कमरे का दरवाज़ा खोलने से डरता हूँ,
क्योंकि मुझे पता है
कमरे के अंदर बिना सुसाइड नोट के
पंखे से लटके मिलेंगे
मेरे कुछ एहसास;

कोने में कहीं दुबके मिलेंगे
मेरे कुछ टूटे हुए विश्वास

कुर्सी पर बैठे मिलेंगे
कुछ अधूरे फ़ैसले,
जो अब भी तारीख़ पूछते हैं
कब पूरी हिम्मत जुटाकर
हम उन्हें अंजाम देंगे।

अलमारी में तह लगाकर रखे मिलते हैं
बीते दिनों के ख़त,
जिनकी साँसें अब भी चलती हैं,
और जैसे ही छूता हूँ
लफ़्ज़ फिर से ताज़ा हो जाते हैं।

और मेज़ पर पड़ी डायरी में
कुछ पन्ने आधे लिखे रहते हैं,
मानो इंतज़ार हो किसी ऐसे कल का
जिस पर भरोसा करना
हमने बहुत पहले छोड़ दिया था।

इसलिए मैं दरवाज़ा खोलने से डरता हूँ
क्योंकि उस कमरे के कोने में
उल्टा लटका मकड़ा भी
मेरी बेबसी पर हँसेगा,
और मैं
खुद को बचाने के लिए
फिर से मुस्कुराता मुखौटा पहन लूँगा।

शनिवार, 15 नवंबर 2025

मुझे अच्छी लगती हैं वे लड़कियाँ

मुझे अच्छी लगती हैं वे लड़कियाँ

जो झीरी-भर रोशनी को
क़िस्मत का वरदान मानने से इंकार कर देती हैं
जो अँधेरे की औक़ात
पहले ही कदम पर तय कर देती हैं।

जिन्हें उम्रभर
बंद खिड़कियाँ मिलीं,
हवा सिर्फ़ कहानियों में
फिर भी जिनके सीने में
एक दरवाज़ा लगातार लात मारता रहा।

मुझे वे लड़कियाँ अच्छी लगती हैं
जो संस्कारों की जंग खाई ज़ंजीरें
उँगली में पकड़कर तोड़ देती हैं,
जिन्हें चुप करवाने वाली हर आवाज़
उनकी हँसी में दम तोड़ देती है।

और सबसे ज़्यादा
वो लड़कियाँ
जो चेतावनी पढ़कर भी
सिगरेट सुलगा लेती हैं;
क्योंकि वे तंबाकू नहीं जलातीं
वे हर मत’, हर चुप’,
हर लड़की होकर?को
धुएँ में बदलकर उड़ा देती हैं।

वे कश नहीं लेतीं
वे विद्रोह फूँकती हैं।
वे धुआँ नहीं उड़ातीं
वे अपनी आज़ादी का
पहला झंडा आसमान में गाड़ देती हैं।


वैधानिक चेतावनी : सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिये अत्यंत हानिकारक है.

गुरुवार, 13 नवंबर 2025

ब्लास्ट हो चुका है #DelhiBlast


ब्लास्ट हो चुका है,

अब यह शहर

हाई अलर्ट पर रहेगा तीन-चार दिनों तक।

सारे तंत्र व्यस्त हो जाएंगे —

आंकड़े छुपाने में,

और अपनी अहमियत दर्शाने में।

प्रेस कॉन्फ़्रेंस में चेहरों पर

गंभीरता की नक़ाबें चढ़ाई जाएंगी,

मलवे के बीच

कैमरों के लिए संवेदनाएँ दिखाई जाएंगी।

फिर सब सामान्य हो जाएगा,

जैसे कुछ हुआ ही न हो —

सिवाय उन घरों के

जहाँ अब भी धुआँ उठ रहा है। 

गुरुवार, 6 नवंबर 2025

ज़ख्मों की दास्ताँ -


 न कागज़ चाहिए, न चाहिए कलम,

दिल ही काफी है लिखने को ग़म


हर एक जख्म में दास्ताँ लिखी है,

तुम जो पढ़ लो तो हो जाए कम


शीशे का दिल मेरा बिखर जायेगा

तोड दो, ताकि अब टूट जाये भरम


जमाने ने बना दिया है पत्थर सा -

नजर भर के देख लो हो जाऊँ नरम


रास्तों ने गलत पता बताया तुम्हारा

सर्द हवाये भी अब ढा रही हैं सितम


‘तुम’ बिन मुकम्मल करे ये कहानी

वर्मा’ किधर से ला पायेगा वो दम


सोमवार, 3 नवंबर 2025

अनछुआ स्पर्श -----

जानना है मुझे - बर्फ या अंगारा हो

मेरे लिए तुम मुकम्मल सहारा हो


टिकते क्यूँ नहीं एक दर पर तुम

यकीनन - तुम तो कोई सैय्यारा हो


बहुत सूकुन है तुम्हारी सोहबत में

शायद तुम दरिया का किनारा हो


बेचैन 'नैन' तुम्हारे कर रहे चुगली

संदेशों के शायद तुम हरकारा हो


बेसब्र मन तो मानता ही नहीं है

'अनछुआ स्पर्श' शायद दुबारा हो


"वर्मा" ये इश्क़ अब तर्क कैसे करे,

दर्द देने वाला जब इतना प्यारा हो


गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

धर्म खतरे में है

 







वह व्यस्त था 

अपने कारोबार में

वह खुश था 

अपने परिवार में

वह रात को देर से सोया था

सुमधुर सपने में खोया था

अचानक वह झिझोड़कर उठाया गया

और उसे बताया गया 

‘‘सोओ मत’’  

‘‘अगले चौराहे पर तुम्हारा धर्म खतरे में है’’

‘‘तुम चलो हम आते हैं’’

"औरों को भी जगाते हैं"

आँख मलते हुए वह जागा

असलहे इकट्ठा किया

धर्म पताका हाथ में लिया

और चौराहे की ओर भागा

उसने बहुत ढ़ूढा 

अपने उस धर्म को जो खतरे में था

पर नहीं मिला

दूसरे धर्म के लोग भी वहाँ आए हुए थे

वे भी इसी तरह 

झिझोड़े और जगाए हुए थे

वह अपनी धर्म पताका लहराते हुए 

उनसे ही भिड़ गया

देखते देखते वहाँ

भीषण जंग छिड़ गया

वह गिरता रहा-पड़ता रहा

पर बेखौफ लड़ता रहा।

नेपथ्य से आवाजें आ रही थी -

लड़ो हम आ रहे हैं।

उसने हौसला नहीं खोया

और जोश से भर गया

बुलंद आवाज में लगाया नारा

कई लोगों को खंजर मारा

कई लोगों को मौत के घाट उतारा

इन सबके दौरान

एक खंजर उसके अन्दर भी गया

और लड़ते-लड़ते 

अन्ततोगत्वा वह भी मर गया

तदुपरान्त सरकार द्वारा प्रायोजित

आंसू बहाने वाले बुलाए गए

और जमकर टी वी शो में

आंकड़ों के तीर चलाए गए


यकीन मानिए

जब ये सब रक्तरंजित हो रहे थे

इन सबके धर्म

अपने नीड़ में सुरक्षित सो रहे थे


चित्र : गूगल 


गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

‘टारगेट’ पर तेरा सर (गजल)

 


दवा की जगह वे जहर रखेंगे

हालात पे फिर वे नजर रखेंगे

 

यूँ तो हौसला देंगे दौड़ने का

मगर रास्ते में वे पत्थर रखेंगे

 

खबरों के लिए ही संग चलेंगे

नजरों में पर वे नश्तर रखेंगे

 

बाखबर रहना झोपड़ी में अपने

पटरियों पर तुम्हारा घर रखेंगे

 

नया शौक है निशानेबाजी का

टारगेटपर वे तेरा सर रखेंगे


'वर्मा' कत्ल करके तेरा, तुम्हे ही

कातिल ठहराने का असर रखेंगे