शनिवार, 4 जुलाई 2026

अंकुरित शब्द

 

मैंने
एक शब्दकोश के
समस्त शब्दों को
निर्देशित किया

एक कविता के लिए।

और उन्हें

एक विस्तृत जाल की तरह
फैला दिया

शब्दों से
शब्द टकराते रहे,
कुछ इधर,
कुछ उधर
बिखरते रहे।

पर कविता के नाम पर
उपलब्धि वही रही
वह इस जाल में नही फंसी

और फिसल गयी

मैंने
हार नहीं मानी।

इस बार
कुछ अलग करने की ठानी।

शब्दकोश से बाहर निकल आया,
और
चिंतन के भीतर उतर गया।

वहीं
मुझे कुछ शब्द मिले
परेशान,
सहमे,
प्रतीक्षारत।

वे ऐसे दिखे
जैसे
अभी-अभी रोपे गए
धान के नन्हे पौधे

जिन्हें
कविता नहीं,
बस
थोड़ा-सा पानी,
थोड़ी-सी धूप
और
बहुत-सा समय चाहिए था।

मैंने
उन्हें फिर
निर्देशित नहीं किया
किसी कविता में ढलने के लिए।

बस उन्हें समय दिया

वे शब्द नहीं,
बीज थे।

समयांतराल के बाद

वे फूटे,
अंकुराए,
और जब कविता बने

तो पता चला,
शब्द नहीं रो रहे थे,
एक नन्ही बच्ची रो रही थी।

और
कुछ शब्दों की शक्लें
क्षत-विक्षत कबूतरों जैसी थीं
जिनकी उड़ान
किसी गिद्ध ने
उड़ने से पहले ही
नोच डाली थी

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

आँकड़ों की रोटी

 

रोटियों से खेलने वाले
रोटियों के लिए तरसते
भूखे लोगों को
रोटियाँ बाँटते हैं।

फ़र्क़ बस इतना है कि
ये रोटियाँ
आटे से नहीं,
आँकड़ों से गढ़ी जाती हैं।

इनका जन्म
खेतों और चूल्हों में नहीं,
सात सितारा होटलों के
ठंडे, चमकदार कमरों में होता है,

जहाँ भूख पर
लंबी-लंबी चर्चाएँ होती हैं,
मगर
भूख
कभी उस मेज़ तक नहीं पहुँचती।

इन रोटियों पर
धार्मिक वैमनस्य की
मीठी परत चढ़ा दी जाती है,

और कृत्रिम आँकड़ों से
ढक दिया जाता है
भूख के सूचकांक का गिरता हुआ सच।

फिर
भूखे और नंगे लोग
अनजाने ही
एक ऐसे चक्रव्यूह में उतर जाते हैं

जहाँ
रोटियों की जगह
नारे परोसे जाते हैं,

और वे
अपने खाली पेट की आवाज़ दबाकर
उसी व्यवस्था की
जय-जयकार करने लगते हैं

जो उनकी थाली में
रोटी कभी नहीं आती
सिर्फ़ रोटी के आँकड़े आते हैं।

सोमवार, 29 जून 2026

.... बाकी सब ठीक है

 

इंसान औ' इंसानियत की कमी है, बाकी सब ठीक है,
हैवानियत की गिरफ़्त में ज़मीं है, बाकी सब ठीक है।

अट्टहास और विद्रूप हँसी से गूँज रहा है पूरा शहर,
मुस्कानों के पीछे चेहरा मातमी है, बाकी सब ठीक है।

सच बोलना, इंसाफ माँगना अब जुर्म ठहरा है यहाँ,
ज़िंदगी बिखर जाना लाज़िमी है, बाकी सब ठीक है।

ख़ौफ़ के साये में पल रही हर नई पीढ़ी की ख़ामोशी,
हर ज़ेहन में एक अनकही कमी है, बाकी सब ठीक है।

भूख की आँखों में सपनों का आख़िरी दीपक बुझ गया,
आँकड़ों में तिलस्मी ख़ुशहाली थमी है, बाकी सब ठीक है।

लब सिल गए हैं डर के मारे शहर के हर गवाह के,
क़ातिल के हक़ में हर गवाही थमी है, बाकी सब ठीक है।

बच्चों के बस्ते में किताबों की जगह नफ़रतें रख दीं,
रूह-ए-तालीमआज सहमी-सहमी है, बाकी सब ठीक है।

'वर्मा' सच लिखने की आदत छोड़ भी दे तो कैसे छोड़े,
स्याही में आज भी ज़िंदा आदमी है, बाकी सब ठीक है।

शुक्रवार, 26 जून 2026

अनकहा संवाद

 

अक्सर मैं
अपने घर के बाहर
पत्र-पेटी में
एक कोरा काग़ज़ डाल देता हूँ।

फिर
चाभी से उसे खोलता हूँ,
जैसे डाकिया
अभी-अभी तुम्हारा ख़त छोड़ गया हो।

उस कोरे काग़ज़ को
भीतर लाकर
बड़े मनोयोग से पढ़ता हूँ।

यक़ीन मानो,
उस ख़त की चुप्पी
तुम्हारी चुप्पी से
हूबहू मेल खाती है।

तुम्हारी इसी ख़ामोशी ने
न जाने कितना कुछ
कहे जाने से,
और कितना कुछ
सुने जाने से
वंचित कर दिया।

पर यह भी सच है
जब-जब
तुमने अपने होंठ भींचकर
शब्दों को क़ैद करना चाहा,
तुम्हारी आँखें
चुपके से
सारी चुगली कर जाती थीं।

 

उस कोरे काग़ज़ पर
आज भी
तुम्हारी वही चुगलखोर आँखें
उभर आती हैं।

और तुम्हारी अनुपस्थिति में भी
इस कोरे काग़ज़ के सहारे
हमारे बीच बचा हुआ
वह अनकहा संवाद
फिर से जी लेता हूँ।

गुरुवार, 25 जून 2026

जब 'क्यों' अपराध बन गया

 

माई लार्ड,

 

यह शख़्स जितना निरीह दिखाई देता है,
अंदर से उतना ही "शातिर" है
कम-से-कम अभियोजन की फ़ाइल यही कहती है।
और फ़ाइलों को सच होने की आवश्यकता नहीं होती,
केवल दर्ज होने की होती है।

यह सरकार से
आयातित प्रश्न पूछता है
ऐसे प्रश्न,
जिनका यहाँ अब कोई उत्पादन नहीं होता।
क्योंकि नई नीति में
उत्तर निर्मित किए जाते हैं,
प्रश्न नहीं।

रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि
सरकार गठन के साथ ही
"सवाल पूछना"
एक संदिग्ध गतिविधि घोषित हो चुका है।
अब अपराध
विचार के बाद नहीं,
विचार से पहले जन्म लेता है।

माई लार्ड,

पुलिस ने इसके घर से
कई डिग्रियाँ बरामद कीं
जो इस बात का प्रमाण थीं
कि अभियुक्त अब भी
उस विलुप्त सभ्यता में रह रहा था,
जहाँ शिक्षा का
भविष्य हुआ करता था।

नई व्यवस्था में
डिग्री केवल एक विनम्र काग़ज़ है,
जो बेरोज़गारी को
सम्मानजनक मौन में बदल देता है।

इसके घर से
कुछ "सच्ची खबरें" भी मिलीं।
वे इसलिए ख़तरनाक थीं
क्योंकि वे सच थीं।
और सच,
माई लार्ड,
अब प्रशासनिक सुविधा के अनुकूल नहीं माना जाता।

अभियोजन का कहना है कि
ऐसी खबरें
जनता में आक्रोश फैला सकती हैं।
जबकि आक्रोश
अब केवल
अनुमति-प्राप्त अवसरों पर ही वैध है।

एक और गंभीर प्रश्न है

जब शिक्षा स्वयं
'सीमित अनुमति' में बदल चुकी हो,
तो इतनी डिग्रियाँ
आख़िर आई कहाँ से?
किस अदृश्य बाज़ार से?
और किस स्वीकृत वास्तविकता में
उन्हें प्रमाणित किया गया?

माई लार्ड,

मेरे पास एक गवाह भी है।
उसका कहना है कि
अभियुक्त की शिक्षा
"क्यों?" नामक
एक असंगठित प्रश्न से शुरू हुई थी।

और वही
इसका पहला अपराध था।

उसी दिन से
यह व्यवस्था की नज़र में
एक स्थायी त्रुटि बन गया
जिसे सुधारा नहीं जा सकता,
केवल दर्ज किया जा सकता है।

अतः,
अपने समापन निवेदन में
मैं यही प्रार्थना करता हूँ कि
इसके भोले चेहरे के पीछे
सत्ता-नीतियों के विरुद्ध
एक सुनियोजित असहमति छिपी हुई है।

इसे विधि के अनुसार
अधिकतम दंड दिया जाए

ताकि आने वाली पीढ़ियाँ
यह भूल जाएँ
कि कभी
प्रश्न पूछना भी
मनुष्य होने का प्रमाण माना जाता था।

रविवार, 21 जून 2026

अंतिम संस्कार का मैनेजमेंट

 

मत करिए ऐसे सवाल,
इन सवालों में कोई दम नहीं है।

घाटे में चल रही एजेंसियाँ
अगर कुछ पेपर लीक करवा रही हैं,
तो कौन-सा तूफ़ान आ गया?

हमारी तत्परता देखिए
बिना किसी विलंब के
हमने अगले पेपर को
"लीक-प्रूफ" बनाने का वायदा कर दिया।

लगता है,
आप आज के समाचार से अनभिज्ञ हैं।
आज ही हमने
लीक की बात फैलाने वाले को
'रासुका' के तहत गिरफ्तार कर लिया।

उधर मीडिया भी
अपनी भूमिका निभा रहा है
वह प्रश्न नहीं पूछता,
वह केवल स्वर बदलता है।

पेपर लीक से अधिक महत्वपूर्ण उसे
हमारी प्रयासजनित मुस्कान लगती है,
और (आत्म)हत्याओं से अधिक
हमारी घोषणाओं की टाइमिंग।

अब रही बात आत्महत्याओं की
तो निश्चिंत रहिए,
हमारी सरकार
अंतिम संस्कार तक की व्यवस्था रखने में सक्षम है।

हमने तो
पचास से अधिक संभावित आत्महत्याओं के लिए
चिताओं का प्रबंध पहले ही कर रखा था।
दुर्भाग्य से
आत्महत्याएँ हुईं
दो दर्जन से भी कम।

बाक़ी चिताएँ
अब भी खाली पड़ी हैं।

मीडिया ने इस उपलब्धि को
बड़ी प्रमुखता से दिखाया
खाली पड़ी चिताएँ नहीं,
बल्कि हमारी तैयारियों की सराहना।

बताइए,
इतनी दूरदर्शी व्यवस्था के बाद भी
आप हमसे जवाब माँग रहे हैं?

हमें उन युवाओं की नहीं,
सरकारी संसाधनों की बर्बादी की चिंता है
आख़िर वह भी
आपके ही टैक्स का पैसा है।

इसीलिए
परीक्षा-तंत्र और प्रतियोगी व्यवस्थाओं की
इन छोटी-मोटी विसंगतियों को
हम आशावादी दृष्टि से देख रहे हैं।

सरकार की प्राथमिकता स्पष्ट है
नौकरियों की रिक्तियाँ
बरसों तक खाली रह सकती हैं,

लेकिन

चिताओं की रिक्तियाँ
भरने में
यह व्यवस्था
कभी देर नहीं करती।

बुधवार, 17 जून 2026

तिनका-ए-दूब

आईना होकर पत्थर के गाँव में रहता है,

इश्क़ भला बिखर जाने से कब डरता है।

 

जानता है कि ढह जायेगा रेत का महल,

हर रोज़ मगर नींव फिर वही धरता है।

 

समझाते रहे किनारेवो क्यों मानेगा,

डूबने के लिए जो समंदर में उतरता है।

 

मुस्कुराहट उसके हालात का तर्जुमा नहीं,

काँटों की सियासत से ही वो गुज़रता है।

 

हवा गुमसुम हैतेल और बाती नहीं है,

बिना शोर के दिया फिर भी जलता है।

 

रौंदनाकुचलना तुम्हारी फितरत होगी,

तिनका-ए-दूब फिर भी कहाँ मरता है?

 

ठोकरों की भी कोई न कोई सरहद होगी,

'वर्माइन्हीं ठोकरों से हर बार सँवरता है।