सोमवार, 4 मई 2026

स्वयं की वापसी

वह गहन अवसाद में था
और
सिर पकड़कर
सशरीर बैठ गया

उसने अजनबियों से
मदद मांगी
लोग ठिठककर आगे बढ़ गए

उसने अपने अज़ीज़ों को पुकारा
वे आए—
आश्वासन दिए,
हाथ बढ़ाए,
मगर फिर अधर में ही
छोड़कर चल दिए

अंततः
हर उम्मीद से परे जाकर
उसने खुद का हाथ पकड़ा
और
आहिस्ता-आहिस्ता
सशरीर खड़ा हो गया

शुक्रवार, 1 मई 2026

औज़ार नहीं, इंसान हैं ये

 

आज मजदूर दिवस है,
पर
मजदूर को
आज भी काम पर जाना है
उसे यह दिन
कैलेंडर में नहीं,
पेट में महसूस होता है।

औज़ारों के साथ
औज़ार बन जाना
उनकी नियति है।
किसी सभ्य नगर में
अक्सर चौराहों पर
इनका भी हाट लगता है
जहाँ
कोई चमचमाती कार से उतरकर
इन्हें
दिन भर के लिए
खरीद लेता है।

शाम होते-होते
वे फिर
वापस रख दिए जाते हैं
उसी चौराहे पर
अगले दिन
फिर बिकने के इंतज़ार में।

इनका आवास
शहर के नक्शे से बाहर होता है,
क्योंकि
इनके हिस्से में
कोई स्थायी पता नहीं होता।

निर्माणाधीन अट्टालिकाओं के साये में,
बजबजाती नालियों के किनारे,
तिरपालों और अधूरे सपनों के बीच
ये बसते हैं
उन्हीं इमारतों के पास
जिन्हें वे बनाते हैं,
पर
जिनमें कभी रह नहीं पाते।

आज के दिन
व्याख्यानों के केंद्र में
इन्हें रखा जाएगा
और
मंच से उतरते ही
फिर
हाशिए पर धकेल दिया जाएगा।

गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

व्यवस्था की लाश

जीतू मुंडा,
तुमने अपनी बहन का कंकाल उठाया
यह साबित करने के लिए
कि वह सचमुच मर गई है।

 

पर तुम भूल गए
जिनके सामने तुम खड़े थे,
उनके कंधों पर पहले से ही
सच और संवेदना की लाशें सड़ रही थीं।

 

उनकी आँखों की शर्म
और कानों की सुनवाई
किसी अंधे गोदाम में गिरवी रखी जा चुकी थी,
जहाँ हर चीख
फाइल बन जाती है,
और हर फाइल पर
धूल की सरकारी चादर डाल दी जाती है।

 

फिर भी
तुम हारे नहीं,

 

क्योंकि तुम्हारे कंधे पर
सिर्फ एक कंकाल नहीं था,
पूरी अंधी व्यवस्था का
जिंदा सबूत लटका हुआ था।


रविवार, 26 अप्रैल 2026

पसलियों की गणना

सुना है
जनगणना होने वाली है,
और इन दिनों
मकान गिने जा रहे हैं।

काश
इस गणना से पहले
हो पाती
बेमकानों की गिनती।

तुम गिन लोगे
छत, दीवार, खिड़कियाँ, पर्दे
पर छूट जाएगा
वो घर”,
जिसने आसमान को ही
अपनी छत मान लिया है।

तुम्हारे आँकड़ों में दर्ज होंगे
ईंट, पत्थर, फर्श की डिज़ाइन
एक सजी-संवरी संख्या-तालिका,
पर नहीं होगा कोई पता
उनका,
जिनकी रातें
फुटपाथों, डिवाइडरों
और सड़कों के किनारों पर कटती हैं
जहाँ हवा भी
पहुँचने से पहले
हिचकती है।

क्या तुम्हारे प्रपत्र में
कोई जगह है
उनके लिए
जिनका शरीर ही मकान है,
झलकती पसलियाँ दीवार,
हथेलियाँ दरवाज़े,
और आँखें
एक अधखुली खिड़की,
जिससे झाँकती है
भूख, ठंड और इंतज़ार?

या फिर इस बार भी
वे सिर्फ अनुमानबनेंगे,
औपचारिकताओं में दर्ज होकर
आँकड़ों की भीड़ में
बिना गिने ही
गायब कर दिए जाएँगे?

और अंत में
जब गिने जा रहे हैं
मकान और इंसान,
तो क्या कभी
पीड़ा और संत्रास की भी
कोई गणना होगी?

या फिर
दर्द हमेशा की तरह
आँकड़ों से बाहर ही
बेघर रह जाएगा

बुधवार, 22 अप्रैल 2026

विलुप्त होती प्रजाति

एक समय था—
जब ईमानदार और सच्चरित्र लोग
बहुतायत में पाए जाते थे।

पर बदले हुए इस माहौल में
वे खुद को ढाल न सके,
न सीख पाए समझौतों की भाषा—

और फिर
डार्विन के सिद्धांत के अनुसार
धीरे-धीरे
विलुप्त होते गए।

अब बची हैं बस
उनकी कहानियाँ,
कुछ दुर्लभ किस्से—
जिन्हें सुनकर
लोग मुस्कुरा देते हैं,
मानो कोई कल्पना हो।

मगर यह पूरी सच्चाई नहीं—
इस प्रजाति का
सम्पूर्ण विनाश अभी हुआ नहीं है।

दृष्टिगोचर न सही,
भीड़ भरे शहरों में
वे बुझती हुई बत्तियाँ हैं—
जो हर झोंके के साथ
और मद्धम पड़ती हैं,
पर अभी भी जल रही हैं।

शायद वे सुषुप्त हैं,
अनुकूल समय की प्रतीक्षा में—
या फिर
हमारी नज़रों से बचकर
अब भी
ईमानदारी जी रहे हैं।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

आज़ादी का भ्रम

चलते-चलते अक्सर मैं
किसी चौराहे पर रुकता हूँ,
अनगिनत पैरों के निशानों के बीच
अपने निशान खोजता हूँ।

पर ठहरकर जब देखता हूँ—
तो चौंक जाता हूँ,
ये सारे निशान
मेरे ही पैरों के होते हैं।

सच तो ये है—
मंज़िल की तलाश में
मैं हर रास्ते पर चला हूँ,
हर मोड़ को अपनी मर्ज़ी समझा है।

और हर चौराहा
मुझे यही समझाता रहा—
कि चुनना मेरा हक़ है।

जबकि हक़ीक़त ये थी—
हर बार
मेरे सामने रखे गए थे
पहले से तय रास्ते।

और मैं—
आज़ादी के भ्रम में
उसी रास्ते पर निकल पड़ता रहा,

बस…
अगले चौराहे तक।

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

अधूरी पूर्णता

किसी ने पूछा था क्या है कविता?”
मैंने कहा

कविता अविरल प्रवाह है,
स्वयं से मिलने की अथक चाह है।
यह कोई प्रयोग नहीं,
यह तो अथाह है
जिसे मापा नहीं जा सकता,
सिर्फ महसूस किया जा सकता है।

कविता शब्दों में कैद नहीं होती
वह शब्दों से टकराती है,
उन्हें तोड़ती है,
और खामोशी को भी आवाज़ दे जाती है।

जहाँ भाषा हार मान लेती है,
वहीं से कविता अपनी ज़िद शुरू करती है।

कविता कोई निष्कर्ष नहीं
वह तो एक दरवाज़ा है,
जो हर बार खुलता है
किसी नए अर्थ की ओर।

कविता सिर्फ शुरुआत है
और वही कविता सबसे पूरी है
जो अधूरी रह जाती है,
क्योंकि
कविता कभी पूरी नहीं होती।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

ट्रिगर पर उंगली

 

इसी चौराहे पर
एक कत्ल हुआ,
सरेआमगोली मारी गई।

हैरत ये नहीं
कि खून बहा सड़कों पर,
हैरत तो ये है
जो मरा है
वह पहली बार नहीं मरा।

वह पहले भी मारा गया था,
कल किसी और चौराहे पर,
और यकीन मानो
कल फिर मारा जाएगा
किसी नए नाम से,
किसी नई भीड़ के सामने।

और जो खड़ा है
ट्रिगर पर उंगली रखे
वह भी कातिल नहीं है,
क्योंकि यहाँ
हर रोज चेहरा बदलता है,
पर उंगली नहीं बदलती।

वह उंगली
दरअसल किसी एक की नहीं
पूरी व्यवस्था की है,

जो हर चौराहे पर
खुद को बेकसूर साबित कर देती है।

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

खुशहाली का होर्डिंग

 

उसने कहा
मैं पीड़ा में हूँ।

सत्ता मुस्कुराई,
और उसकी आवाज़ को
रिकॉर्ड से बाहर कर दिया गया।

सबूत के नाम पर
उसी के चेहरे की
एक AI-निर्मित
हँसती हुई तस्वीर
पेश की गई

और फ़ैसले में लिखा गया
पीड़ा का कोई प्रमाण नहीं मिला।

क्योंकि
दर्ज रिकॉर्ड में
वह हर फ़्रेम में
मुस्कुराता पाया गया।

इतना ही नहीं
उस पर यह भी इल्ज़ाम लगा
कि उसने
अपनी ही पीड़ा का झूठ गढ़कर
सत्ता को बदनाम करने की
साज़िश रची।

और अंत में
जनता को गुमराह करनेकी धारा में
उस पर जुर्माना ठोंक दिया गया।

फिर
उसकी उसी मुस्कुराती तस्वीर को
हर चौराहे पर
होर्डिंग बनाकर टाँग दी गई,

और नीचे लिखा था
यह है
राज्य की खुशहाली का प्रमाण।

रविवार, 5 अप्रैल 2026

इंसानियत—नियम व शर्तें लागू

चीख की
कोई भाषा नहीं होती,
उसे सुनने के लिए
किसी अनुवादक की ज़रूरत नहीं
उसका एकमात्र वाहक
संवेदना है,
और संवेदना की भी
कोई भाषा नहीं होती।

 

हृदयविदारक होता है
चीख और संवेदना का मिलन,
क्योंकि इस मिलन से
जन्म लेती हैं
पराश्रव्य सुबकियाँ।

 

जघन्यता और पाशविकता
चीखों की जनक हैं
इनका जन्म
अक्सर
आदिम हवस
और धार्मिक कट्टरता की
अंधी सुरंगों में होता है।

 

यूँ तो इनकी
कोई जाति, धर्म नहीं होता,
पर ये अक्सर
तहकीकात करती हैं
जाति और धर्म की,
और सुविधानुसार
इंसानियत को
लहूलुहान कर देती हैं।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

सभ्य" दाँतों के निशान

 

बिना शिनाख़्त का प्रयास किए
रिपोर्ट में दर्ज कर दिया गया
शिनाख़्त नहीं हो पाई।


और फिर
पंचनामा कर
आनन-फानन में
उसे दफ़ना दिया गया।

पोस्टमार्टम की
रस्म-अदायगी भी नहीं हुई
क्योंकि
उसके फटे कपड़ों से
झाँक रहे थे
उसके जिस्म पर
कुछ “सभ्य” दाँतों के निशान

वे निशान
इतने परिचित थे
कि कागज़ों ने
आँखें मूँद लीं,
और कानून ने खुद
तोड़ दिया कानून का दायरा

चश्मदीदों ने
दबी ज़ुबान में बताया
तब तक आसमान में
कुछ गिद्ध मंडरा रहे थे,
जब तक
वह ज़िंदा थी।

सोमवार, 30 मार्च 2026

साप्ताहिक प्रेम

मैं अपनी माशूका से

सोमवार को आँखें चार करता हूँ,
फुर्सत से मंगलवार के दिन
प्यार का इज़हार करता हूँ।

बुधवार बीत जाता
घूमने-फिरने और डेटिंग में,
और बृहस्पतिवार निकल जाता है
थोड़ी-सी मनुहार और वेटिंग में।

शुक्रवार को फिर
शादी और हनीमून का जुनून,
शनिवार आते-आते
छोटी-सी अनबन का सुकून।

रविवार को होता है
थोड़ा-सा ब्रेकअप, थोड़ा मौन,
फिर दिल कहता है
चलो, रीस्टार्ट करो ये लव-ज़ोन।

और फिर
मैं अपनी उसी माशूका से
सोमवार को आँखें चार करता हूँ।

सबसे बड़ी बात
ये माशूका कोई और नहीं,
मेरी पत्नी ही है!

जिसके साथ
पिछले चार दशकों से
हर हफ्ते
हम अपने वैवाहिक जीवन का
इसी तरह
नवीनीकरण करते आ रहे हैं।