तैनात
हैं...
चारों ओर!
धर्म के, जाति के,
और तथाकथित 'संस्कारों' के—
वे स्वयंभू सैनिक, जो डर से पैदा हुए हैं।
वे घेरा डाले खड़े हैं...
उस नन्ही सी कोख पर,
उन्हें 'गर्भ' पर कब्ज़ा करना है।
उन्हें डर है—
कहीं यह नवजात,
उन्मुक्त हवाओं की सोहबत में न आ जाए,
कहीं जन्म लेते ही वह—
सूरज
की सीधी रोशनी को 'सत्य' न
मान ले।
इसलिए—
इससे पहले कि वह 'मनुष्य' बने,
वे उसकी देह पर पहचान का 'टैग' टाँक देना चाहते हैं।
वे चाहते हैं...
उसकी पहली मासूम किलकारी में—
अपनी
नफरतों का 'घोषणापत्र' भर
देना!
वे आतंकित हैं—
कहीं वह सवाल न सीख जाए,
कहीं उसकी जुबान 'क्यों' का उच्चारण न कर दे,
कहीं वह—
विरासत में मिली इन 'दीवारों' को,
बाहर
जाने का 'दरवाज़ा' न
समझ ले!
उनकी साजिश गहरी है—
वे चाहते हैं, पहली साँस के साथ—
उसके फेफड़ों में 'खौफ' की हवा भर दी जाए,
और पहली धड़कन की दस्तक पर ही—
सड़ी-गली
मर्यादाओं का भारी 'ताला' जड़
दिया जाए।
क्योंकि...
वे जानते हैं—
जिस दिन वह सचमुच 'मनुष्य' हो गया,
उनके गढ़े हुए पत्थर के 'देवता' नंगे हो जाएँगे...
और उनकी सदियों पुरानी 'सत्ता'—
महज़ एक कोरी अफ़वाह बनकर रह जाएगी!







