विकास का एजेंडा
पहले ही तय कर दिया गया था।
आर्किटेक्चरल मॉडल के सामने
नारियल भी फोड़ दिया गया।
समस्त तंत्र और मीडिया
उसकी बारीकियाँ समझाने में जुटे हैं।
कोई उँगली रखकर बताता है—
"देखिए, यह
हाईवे है,
यहाँ गति की पूरी स्वतंत्रता होगी।"
फिर धीरे से जोड़ देता है—
"और हाँ,
खुलेआम व्यभिचार की
अतिरिक्त सुविधा भी उपलब्ध रहेगी;
आख़िर विकास
सुविधाओं के विस्तार का ही दूसरा नाम है।"
दूसरा बताता है—
"पताकाओं से चिह्नित ये स्थान मंदिर हैं।
यहाँ चोरी के धन से अर्जित
चंदे के पवित्र हो जाने की
प्रबल संभावनाएँ हैं।
यह मॉडल
उस चंदे के एक अंश को
पुनः चुराकर
पुनर्चक्रण की प्रक्रिया को भी
निर्बाध बनाए रखता है;
ताकि पाप और पुण्य के बीच
पूँजी का प्रवाह कभी अवरुद्ध न हो।"
नग्न स्त्री के पीछे भीड़ खड़ी है—
"इस कटआउट पर ध्यान मत दीजिए,
यह तो मणिपुर है,
हम समय रहते
इसे ढँक देंगे—
खबरों से,
बयानबाज़ी से,
और सबसे ज़्यादा
चुप्पी से।"
विशेष बात यह है—
हाशिये पर खड़े लोगों को
हाशिये पर ही रखा गया है,
पर इस मॉडल में उनका भी
'प्रमोशन'
सुनिश्चित है।
उनके हाथों में होंगी
धर्म की पताकाएँ,
और जिह्वा पर
विद्वेष के नारे—
जिन्हें लहराने और दोहराने की
उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता होगी।

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