बुधवार, 21 जनवरी 2026

ज़रूरी है युद्ध—


ज़रूरी है युद्ध
किसी ज़मीन के लिए नहीं,
किसी झंडे के लिए नहीं,
ज़रूरी है युद्ध
उस थाली के ख़िलाफ़
जिसमें रोज़
अन्याय परोसा जाता है
और कहा जाता है
चुप रहो,
यही राष्ट्र है।

ज़रूरी है युद्ध

उस भाषा के ख़िलाफ़
जो हत्या को
सामान्य क्षति
और भूख को
संयोगकहती है।

सवाल यहाँ बदतमीज़ी हैं,
असहमति गुनाह,
और चुप्पी
देशभक्ति।

हम तालियाँ बजाते रहे
और आकाश बिकता रहा।
हम चुप रहे
और वही
सबसे बड़ा अपराध था।

याद रखो
तानाशाही
तालियों से पैदा होती है,
और आज़ादी
एक अकेली
काँपती आवाज़ से।

ज़रूरी है युद्ध
क्योंकि शांति के नाम पर
हर असहमत आवाज़ के सामने
हादसों के गड्ढे तैनात किये जा रहे हैं.
इसलिए
यह कोई नारा नहीं,
कोई उत्सव नहीं।

बस इतना जान लो
ज़रूरी है
यह युद्ध।

8 टिप्‍पणियां:

Razia Kazmi ने कहा…

बहुत जरूरी है
सुंदर रचना

M VERMA ने कहा…

धन्यवाद

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर

M VERMA ने कहा…

धन्यवाद

Sweta sinha ने कहा…

जब क़लम झकझोरने लगे तो विचारशीलता सार्थक लगती है। प्रभावशाली अभिव्यक्ति सर।
सादर।
-------
जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २३ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

M VERMA ने कहा…

जी धन्यवाद

Aman Peace ने कहा…

Wah!

M VERMA ने कहा…

आभार