बहुरूपिये खयाल हैं
फेंकते जाल हैं
.
ज़मीर बेच दिया
अब ये मालामाल हैं
.
रोटियाँ उदास हैं
रूठ गये दाल हैं
.
फुसफुसा रहे दरख़्त
गहरी कोई चाल है
.
डूब गये खेत-घर
सूख गये ताल हैं
.
बेअसर हर बात से
बहुत मोटी खाल है
.
इंसान की फितरत
अनसुलझा सवाल है
~~
बहुरूपिये खयाल हैं
फेंकते जाल हैं
.
ज़मीर बेच दिया
अब ये मालामाल हैं
.
रोटियाँ उदास हैं
रूठ गये दाल हैं
.
फुसफुसा रहे दरख़्त
गहरी कोई चाल है
.
डूब गये खेत-घर
सूख गये ताल हैं
.
बेअसर हर बात से
बहुत मोटी खाल है
.
इंसान की फितरत
अनसुलझा सवाल है
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उस दिन जब तुम
तुम बैठी थी
मेरे इसी बिस्तर पर
तुम प्रतीक्षा कर रही थी
मेरे स्पर्श की
और मैं भी काँपते हाथों से
तुम्हें छू लेना चाहता था
सहसा
पर्दे हिलकर अपनी उपस्थिति का
एहसास देने लगे थे
खिड़कियाँ कौतूहलवश कमरे के अन्दर
झाँकने लगी थी
कोने में उलटा लटका
अदना सा मकड़ा भी
मुस्कराने लगा था
याद है तुम्हें
पंखा भी उस दिन
अपेक्षाकृत तेज चलने लगा था.
और सहम गयी थी तुम
मैं भी तो सहमा था
बीच राह में दुबका स्पर्श भी तो
बुरी तरह से सहम गया था.
.
आज फिर
जबकि तुम सामने हो
बेचैन हैं स्पर्श,
पर आतुर नहीं है
आखिर बार-बार सहमने की
आदत जो नहीं है
~~
ज़ज्बात पर मेरी 50वी रचना.
वे क़ैद हैं
और उन्हें
अपने क़ैद का
अभास तक नहीं है।
.
जब कभी
उन्होने सूरज की ओर देखा;
जब कभी
उन्होनें आक्सीजन से
रूबरू होने की कोशिश की;
जब कभी
उन्होने आसमाँ के इस छोर से
उस छोर तक उड़ना चाहा;
जब कभी
उनमें अभिव्यक्ति की अकुलाहट मिली;
जब कभी
उनकी आँखों में
सपनों की आहट मिली;
जब कभी उनमें --
जब कभी --
.
खड़ी कर दी गयी
उनके इर्द-गिर्द
रोटियों की दीवारें
और अब वे क़ैद हैं
पर उन्हें
अपने क़ैद का
अभास तक नहीं है।
इस वारदात में
मेरा कोई हाथ नहीं है
क्योंकि,
जिस समय यह वारदात घटी
मैं अपने अपनों के बीच था
अपने सुमधुर और सलोने
मासूम से -
सपनों के बीच था।
मैने तो
एक अरसा पहले
थमायी थी बन्दूकें
मचलते हुए उन
अबोधों; दुधमुहों को
ताकि वे बहल जायें
मैनें तो
उन्हें इन बन्दूकों को
चलाना भी नहीं सिखाया था.
नफरत के शोलों से
इन्हें, इन बन्दूकों ने ही
रूबरू करवाया होगा
ये सारी साज़िशें
इन बन्दूकों की ही लगती है
क्योंकि,
वारदात के समय
पंचतारा होटल के
'स्विमिंग पुल' में
मैं निर्वस्त्र मछलियाँ
पकड़ रहा था
अब तो यकीनन
यकीन हो गया होगा
कि इस वारदात में
मेरा कोई हाथ नहीं है.
रोटियाँ उगाने के लिये



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