Tuesday, December 1, 2009

रोटियाँ उदास हैं ~~

बहुरूपिये खयाल हैं

फेंकते जाल हैं

.

ज़मीर बेच दिया

अब ये मालामाल हैं

.

रोटियाँ उदास हैं

रूठ गये दाल हैं

.

फुसफुसा रहे दरख़्त

गहरी कोई चाल है

.

डूब गये खेत-घर

सूख गये ताल हैं

.

बेअसर हर बात से

बहुत मोटी खाल है

.

इंसान की फितरत

अनसुलझा सवाल है

~~

Friday, November 27, 2009

सहमा हुआ स्पर्श ~~

उस दिन जब तुम

आयी थी मेरे घर पर touch

तुम बैठी थी

मेरे इसी बिस्तर पर

.

तुम प्रतीक्षा कर रही थी

मेरे स्पर्श की

और मैं भी काँपते हाथों से

तुम्हें छू लेना चाहता था

सहसा

पर्दे हिलकर अपनी उपस्थिति का

एहसास देने लगे थे

खिड़कियाँ कौतूहलवश कमरे के अन्दर

झाँकने लगी थी

कोने में उलटा लटका

अदना सा मकड़ा भी

मुस्कराने लगा था

याद है तुम्हें

पंखा भी उस दिन

अपेक्षाकृत तेज चलने लगा था.

और सहम गयी थी तुम

मैं भी तो सहमा था

बीच राह में दुबका स्पर्श भी तो

बुरी तरह से सहम गया था.

.

आज फिर

जबकि तुम सामने हो

बेचैन हैं स्पर्श,

पर आतुर नहीं है

आखिर बार-बार सहमने की

आदत जो नहीं है

~~

ज़ज्बात पर मेरी 50वी रचना.

Thursday, November 19, 2009

रोटियों की दीवारें ~~














वे क़ैद हैं

और उन्हें

अपने क़ैद का

अभास तक नहीं है।

.

जब कभी

उन्होने सूरज की ओर देखा;

जब कभी

उन्होनें आक्सीजन से

रूबरू होने की कोशिश की;

जब कभी

उन्होने आसमाँ के इस छोर से

उस छोर तक उड़ना चाहा;

जब कभी

उनमें अभिव्यक्ति की अकुलाहट मिली;

जब कभी

उनकी आँखों में

सपनों की आहट मिली;

जब कभी उनमें --

जब कभी --

.

खड़ी कर दी गयी

उनके इर्द-गिर्द

रोटियों की दीवारें

और अब वे क़ैद हैं

पर उन्हें

अपने क़ैद का

अभास तक नहीं है।


Friday, November 13, 2009

इस वारदात में मेरा कोई हाथ नहीं है ~~


~~

इस वारदात में

मेरा कोई हाथ नहीं है

क्योंकि,

जिस समय यह वारदात घटी

मैं अपने अपनों के बीच था

अपने सुमधुर और सलोने

मासूम से -

सपनों के बीच था।


मैने तो

एक अरसा पहले

थमायी थी बन्दूकें

मचलते हुए उन

अबोधों; दुधमुहों को

ताकि वे बहल जायें

मैनें तो

उन्हें इन बन्दूकों को

चलाना भी नहीं सिखाया था.


नफरत के शोलों से

इन्हें, इन बन्दूकों ने ही

रूबरू करवाया होगा

ये सारी साज़िशें

इन बन्दूकों की ही लगती है

क्योंकि,

वारदात के समय

पंचतारा होटल के

'स्विमिंग पुल' में

मैं निर्वस्त्र मछलियाँ

पकड़ रहा था


अब तो यकीनन

यकीन हो गया होगा

कि इस वारदात में

मेरा कोई हाथ नहीं है.

~~

Saturday, November 7, 2009

कुदाल से त्योरियां ~~

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रोटियाँ उगाने के लिये
धरती के माथे पर
खींचते रहे तुम
अनगिनत लकीरें;
लहलहा उठीं रोटियाँ
अधजली; अधपकी और
पकी रोटियाँ
वे तुम्हारे उगाये रोटियों में से
अधजली और अधपकी
तुम्हें खैरात में देते रहे,
और पकी रोटियों को
’स्विस बैंक’ का रास्ता दिखा दिया
तुम सपाट माथा लिये
चुपचाप देखते रहे; चमत्कृत से
रोटियों के सफर को.

तलाश में क्यों हो
किसी शिल्पकार की अगुवाई का
अपने कुदाल से
खुद ही क्यों नही खींच देते
अपने माथे पर
त्योरियों की लकीरें
ताकि तैनात कर सको
इन्हें हर उस रास्ते पर
जिनसे होकर
इन रोटियों का सफर होता है
~~

Monday, November 2, 2009

अजन्मे प्रश्नों का क्लोन ~~


~~
अभी मैनें
प्रश्न किया भी नहीं था
कि
उत्तरों की फौज् ने आकर
अवरूद्ध कर दिया
मेरे हर संभावित प्रश्न की राह को
और ये उत्तर
प्रश्नों के ही लिबास में थे
नहीं छोड़ा
मेरे किसी भी प्रश्न को
दिमाग के गर्भ में
छत-विच्छत करने से.

मैं हतप्रभ हूँ
उन्हें कैसे पता चला
मेरे प्रश्नों के कद,

काठी और लिबास का;
उन्हें कैसे एहसास था
मेरे प्रश्नों के मर्मस्थल का;
उन्हें कैसे पता था
अजन्मे मेरे प्रश्नो के
पल-पल का.

शायद मेरा दिमाग
टेप किया जा रहा है;
या शायद

मेरे दिमाग का
क्लोन बना लिया गया है.
~~

Friday, October 30, 2009

दिल में दुकान ~~~


~~

जेबों में अपने हर सामान रखते हैं
दिल में ये लोग तो दुकान रखते हैं


शातिर मंसूबों का ज़ायजा क्या लेंगे
दुश्मनों के लिए ये गुणगान रखते हैं


बिखर कर भी जुड़ जाते है पल में
जिस्म में अपने सख्तजान रखते है.

मुआवजें जब शिनाख़्त पर होते हैं
थोड़ा सा जिस्म लहुलुहान रखते हैं

बिखर जायेंगे तुम्हारे हल्फिया बयान
वे बहुत ऊँची जान-पहचान रखते हैं
~~

Wednesday, October 28, 2009

और वह जीत गया ~~




मारो-मारो
भागने न पाये
इधर गया है
उठा लो साले को !

और वह वह उनसे बचता
भागता रहा निरंतर;
सारी-सारी रात
वह उनकी आहटें सुनता
और जागता रहा निरन्तर;
ज़रा सी आवाज़ पर
वह चौंकन्ना हो जाता था,
हर फुसफुसाहट
उसे मजबूर कर देती
फिर भागने को

कब तक भागता !
कहीं तो रूकना ही था
प्रतिकार का तमंचा लेकर
आखिर रूका वह
अपने कमरे में बेखौफ
और इस बार शायद
न भागने के लिये रूका था

तीसरी मंज़िल के अपने कमरे में
वह खूब लड़ा
इन पीछा करने वालों से;
इनकी आवाज़ों से;
और वह जीत गया.
उसने हरा दिया उन सबको
खिड़की के रास्ते
उन डरावनी आवाज़ों को
बाहर ढकेल दिया.

और अब कितना सुकून है
खून के तालाब में डूबे
कम्पाउण्ड में पड़े
उसकी लाश के चेहरे पर।
~~

Monday, October 26, 2009

१०००वी टिप्पणी तक का सफर ~~

कुल ४२ पोस्ट और १००० टिप्पणियाँ, ६५ समर्थक, सफर अवधि ५ महीने और १४ दिन
हमसफ़र, हमखायालों और शुभचिंतको को मेरा साधुवाद
1०००वे टिप्पणीकर्ता आर्जव ब्लॉग वाले श्री अभिषेक कुशवाहा जो मेरे गृहनगर वाराणसी के हैं, जिन्होंने मेरे ब्लॉग जज़्बात के पोस्ट मुझे गोली मार दो पर १०००वी टिप्पणी दी। बहुत बहुत धन्यवाद अभिषेक

Saturday, October 24, 2009

मुझे गोली मार दो ~~


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तुम मुझे गोली मार दो
क्योकि मै जिन्दा ही कहाँ हूँ
और फिर
मरा हुआ फिर से तो नही मर सकता

मैं तो तभी मर गया था
जब तुमने मेरे हक की रोटी पर
पहली बार कब्जा किया था
और --
और मैनें प्रतिकार की जगह
परोस दी थी --
तुम्हारे सामने अपनी अस्मिता भी;
जब अपने वजूद की नींव पर
मैं तुम्हारी अट्टालिकाएँ बना रहा था
और खटकने लगी थी तुम्हें
मेरी झोपड़ी इसके बगल में;
मैं तब भी मरा था
जब तुमने
सूरज की रोशनी की आपूर्ति
मुझ जैसों के लिये
प्रतिबन्धित कर दी थी
और तुम्हारा कहा मानकर
सूरज तुम्हारे लिये ही रोशनी बिखेरने लगा था;

तुम समेटते रहे
मेरे अस्तित्व की तमाम संभावनाओं को
और मुझे मोम से ढक दिया था
अपलक देखते रहने को;

इससे पहले कि
हवाएँ भी तुम्हारे झाँसे में आकर
आक्सीजन की आपूर्ति बन्द कर दें

तुम मुझे गोली मार दो !
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Wednesday, October 21, 2009

रिश्ते जब रिसने लगेंगे ~~


~~
तुम अपने आँसुओं को
बेवजह ज़ाया मत करना

ये आँसू तब काम आयेंगे
जब तुम्हारे करीने से सजाये
रिश्ते रिसने लगेंगे;
विश्वास जब घिसने लगेंगे;
तुम्हारे एहसासों को
जब ठाँव नहीं मिलेगा;
तुम्हें तुम्हारा अपना जब

सलोना गाँव नहीं मिलेगा;
जब बाबूजी का 'चमरौधा'
पड़ा होगा औंधा;
सावन में जब खेतों में धूल उड़ेंगे
और सूखेगा पौधा;
जब तुम्हारा ही बेटा
तुम्हें सलीका सिखायेगा;
टी वी पर किसी के
एनकाउण्टर की मसालेदार खबर
दिन भर छायी रहेगी,
और् सुबह का गया
तुम्हारा कोई अज़ीज
शाम तक घर नहीं आयेगा.

तब ये तुम्हारे आँसू
तुम्हारे बहुत काम आयेंगे
इन्हें बेवजह जाया मत करना ---

~~~

Sunday, October 18, 2009

कठुवाए हुए एहसास ~~

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चलो कठुवाए हुए एहसासों को भिगोते है
अंतस के जमीन पर एक दरख़्त बोते है

ज़रा उनसे पूछिए जिन्दगी का फलसफा
कान्धे पर जो खुद ही का ज़िस्म ढोते है

खरीदने-बेचने से परे है ये लोग फिर भी
देखिए किस तरह ये घोड़े बेचकर सोते हैं

सात पुश्तों की ख़बर लेने निकले हैं आप
इन्हें ये भी पता नहीं, ये किनके पोते हैं

दर्द का एहसास तो रोटियों में खो गया है
हँसी के मुखौटो के पीछे छुपकर ये रोते है
~~

Friday, October 16, 2009

दीया और लौ : तीन शब्द चित्र


मिट्टी सने हाथों ने
मिट्टी से बनाया
कुछ इस तरह मैने
अपना आकार पाया

* ~ * ~ * ~ * ~

अमावस की काली रात
थरतराती दीये की लौ
अपलक
निहारती तुम
देखो फटने लगी है पौ
* ~ * ~ * ~ * ~

शरारती हवाओं ने
लौ को नचा दिया
हथेलियों की ओट ने
मरने से बचा दिया
~ * ~

Tuesday, October 13, 2009

सलवटों की चाहत में ~~


~~
अक्सर मैं
जिन्दगी के आपाधापी के बीच
बिस्तर पर करवट बदलना भी
भूल जाता हूँ
मेरे बदले
हर सुबह बिस्तर खुद
सलवटों की चाहत में
करवट बदल लेता है.

किताबें बाट जोहती हैं
मेरा
कि शायद मैं उसके पन्ने पलटूंगा
थक हार कर अकस्मात
वे खुद ही
अपने पन्ने पलट लेते हैं


बहुत दिनों तक जब
कोई कुंडी खड़काने नहीं आता
किवाड़ बन्द रहने से उकताकर
हवाओं के हाथों से
खुद ही
कुंडियाँ खड़का देती हैं

अक्सर मैं
रोटियों के पीछे भागते-भागते
रोटियाँ खाना भी
भूल जाता हूँ
और इंतजार करता हूँ कि
शायद रोटियाँ तुम्हारे हाथों के सहारे
मेरे मुँह तक ----
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Sunday, October 11, 2009

वह मगर भीगा नहीं ~~

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बारिश हुई
कभी मूसलाधार तो
कभी रूक-रूक कर
सब कुछ भींग गया
वजूद का ओर-छोर भी;
नयन के कोर भी
टूट गये तटबन्धी विश्वास;
बह चला एहसास
कुछ खोया; कुछ पाया
एक जलजला सा आया
अपने आगोश में ले लिया
सख्त से सख्त को
समूल डुबो दिया
समस्त को; दरख्त को


जिसको भिगोने/डुबोने के लिये
यह सारी कवायद हुई थी

वह मगर भीगा नहीं
क्योंकि वह कुछ ऊँचाई पर था.
~~