Tuesday, February 28, 2012

कब्जे में ये खलिहान करते हैं ….

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माना कि ये रक्तपान करते हैं

पर हर रोज गंगास्नान करते हैं

.

शक के दायरे से बचने के लिए

खुद ही को लहुलुहान करते हैं

.

लूटते हैं जब भी काफिले को

मुक्तहस्त से फिर दान करते हैं

.

हादसे जब होकर गुजर जाते हैं

शिद्दत से ये सावधान करते हैं

.

मुर्दों से इनकी जान पहचान है

कब्रिस्तानों में जलपान करते हैं

.

पर कुतरने की तैयारी होती है

जब किसी का सम्मान करते हैं

.

खेतों से इनका सरोकार नहीं है

कब्जे में ये खलिहान करते हैं

Sunday, February 19, 2012

खुद पर खुद ही ख़ुफ़िया निगाह रखिये ….

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अपनी बेगुनाही का हरपल गवाह रखिये

खुद पर खुद ही ख़ुफ़िया निगाह रखिये

.

दस्तूरन ‘सच’ जब शक के दायरे में हो

हो सके तो ‘झूठ’ को गुमराह रखिये

.

बचना चाहो जो बेवजह के ‘सलाहों’ से

औरों को लिए आप भी सलाह रखिये

.

‘मौत’ की खबर आम हो इससे पहले ही

सुगबुगा कर जिंदगी की अफवाह रखिये

.

माना कि किसी को परवाह नहीं आपकी

अपनों के लिए आप तो परवाह रखिये

.

तैनात हैं हर राह पर पत्थरों की ठोकरें

इनके पैनेपन की हरपल थाह रखिये

.

देखिये उन्होंने ‘गुलाम’ की चाल चली है

इसके ऊपर आप अपना ‘बादशाह’ रखिये

Tuesday, February 7, 2012

हर भीड़ के पीछे एक शातिर दिमाग होता है …….

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भीड़ में होते हैं

अनगिनत पाँव

पर नहीं होता है

भीड़ का अपना पाँव.

भीड़ देखती है

अनगिन आँखों से

पर नहीं होती हैं

भीड़ की अपनी आँखें.

भीड़ अक्सर

नारे लगाती है

पर नहीं होता है

भीड़ का अपना कोई नारा.

भीड़ को देखकर

भीड़ मुड़ जाती है

क्योंकि भीड़,

भीड़ से कतराती है.

उजाड देती है पल में

आशियाना, नीड़

खौफनाक होती है

बेख़ौफ़ भीड़.

भीड़ में यूं तो

होते हैं अनगिनत चेहरे

पर नहीं होता है

भीड़ का अपना चेहरा

. 

यूं तो भीड़ का

अपना दिमाग नहीं होता है,

पर हर भीड़ के पीछे

एक शातिर दिमाग होता है.

Friday, January 6, 2012

मैं इन्हें छुपा लूंगा….

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आईने के सामने बैठ

खुद को पहचानने की कोशिश में

रूबरू हो गए

मेरे समस्त अन्तर्निहित

और अनाहूत किरदार.

मेरे वजूद की धज्जियाँ उड़ाते

कुछ थे रंगदार;

तो कुछ स्वयम्भू सरदार,

कोई धारदार हथियारों से लैस था;

तो किसी की निगाहों में

बेवजह तैस था,

कुछ न जाने क्या गा रहे थे;

तो कुछ लगातार खा रहे थे,

कुछ अनाचारी;

तो कुछ थे व्यभिचारी,

यही नहीं इन्हीं के बीच

अट्टहास लगाता फिर रहा था

एक किरदार बलात्कारी.

.

आईने

झूठ नहीं बोलते हैं,

पर मैं इन्हें छुपा लूंगा

मुस्कराते हुए;

खुशनुमा मुखौटों के बीच

इससे पहले कि

ये किसी और को नज़र आयें.

.

जी हाँ ! मैं इन्हें छुपा लूंगा.

Friday, December 30, 2011

चुप रहिये वे कुछ बोलने जा रहे हैं …..

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चुप रहिए

वे कुछ बोलने जा रहे हैं

उपलब्धियों को वे

तौलने जा रहे हैं

भाइयों और बहनों

हमारा देश स्मूथली 'रन' कर रहा है

देखते नहीं कितनी आसानी से अपना काम

'गन' कर रहा है

क्या कहा ?

बलात्कार बहुत ज्यादा हुआ है

अरे! इतना भी नहीं पता

उम्मीद से बिल्कुल आधा हुआ है

घोटाले-घोटाले क्यूँ चिल्ला रहे हो

तुम तो विरोधियों से सुर मिला रहे हो

किसी देश की अच्छी अर्थव्यवस्था

और घोटालों में अभिन्न नाता है

घोटालो का सकारात्मक पहलू

क्या तुम्हे नज़र नहीं आता है

सबसे बड़ी उपलब्धि तो देखो

अब हम विश्वस्तर के घोटालें करते हैं

सामूहिक हत्याकांड पर कौन है

जो सवाल खड़ा कर रहा है

यकीनन कोई आपके कान भर रहा है

जनसँख्या वृद्धि के इस दौर में

सामूहिक हत्याकांड

व्यापक प्रभाव छोड़ते हैं

परिवार नियोजन कार्यक्रम को

सही दिशा में मोड़ते हैं

कुछ न होने से तो अच्छा है

कि कुछ होता रहे

क्या आप चाहते हैं कि

हमारा देश सोता रहे

मन में कोई भ्रम मत पालिए

लगे हाथों इस बात पर भी नज़र डालिए

विश्व में सबसे ज्यादा हम

जांच कमीशन बिठाते हैं

अरे! कभी कभी तो

जांच कमीशन की जांच के लिए भी

जांच कमीशन ले आते हैं

हमें पता था तुम चिल्लाओगे

मंहगाई का मुद्दा जरूर लाओगे

मानता हूँ मंहगाई बढ़ी है

कीमते आसमान तक चढी हैं

समस्यायें हो रहीं हैं मोटी

आम आदमी से दूर हो रही है रोटी

महानुभावों बढ़ी कीमतों के साथ

घटी कीमतों पर भी तो नज़र डालो

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाज़ार में हमने

रूपये की कीमत को धूल चटा दिया है

बैंक जमा राशि पर ब्याज प्रतिशत घटा दिया है

कीमत घटने का सबसे बड़ा प्रमाण ले लो

बिल्कुल मुफ्त में जब चाहो

किसी का प्राण ले लो

अरे! हमने तो रोटी से ज्यादा

आदमी को अहमियत दिया है

इंसान की कीमत घटाकर तभी तो

शून्य नियत किया है

.

जी हाँ!

शून्य नियत किया है

Friday, November 11, 2011

इससे पहले कि लौह-कपाट बन्द हो …

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इससे पहले कि

मेरे हौसले मन्द हों;

इससे पहले कि

लौह-कपाट बन्द हो

मैं प्रवेश कर जाना चाहता हूँ

उस तिलिस्मी दुनिया में ।

मुझे पता है

एक बार जाने के बाद

लौट पाना मुश्किल है;

मुझे पता है

पग-पग पर तैनात हैं वहाँ

अनाचार-व्यभिचार के तिलिस्म,

अलगनी से टंगे मिलेंगे

रक्तरंजित रक्तबीज,

मेरे पैरों में बाँध दी जायेगी

मायावी बेड़ियाँ,

कीलों की साजिश से

छलनी हो जायेंगी एड़ियाँ,

सांप तो कहीं;

सीढियां मिलेंगी,

कुछ लोगों के द्वारा;

कुछ लोगो के लिए

नकार दी गयीं

पीढियां मिलेंगी,

गुजरना होगा मुझको

त्रासदी के भयावह सिलसिले से ।

.

पर इससे पहले कि

मेरे हौसले मन्द हों;

इससे पहले कि

लौह-कपाट बन्द हो,  

और सुरक्षित हो जाएँ वे

जो इन सबके संचालक हैं

मैं प्रवेश कर जाना चाहता हूँ

उस तिलिस्मी दुनिया में ।

Monday, November 7, 2011

खिड़कियाँ खोल झाँक रहा है मकान ….

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इससे पहले कि

’शब्द’ शब्दों से मिलकर

बुन दें एक अभेद्य तिलिस्म,

तुम लिखो एक खत

शब्दों के बिना ।

.

तत्पर हैं

संवादों के आखेटक;

बनाने को इनको

विस्फोटक,

खिड़कियाँ खोल झाँक रहा है

हर मकान;

तैनात किए गए है

सुनने को आतुर

अनगिनत कान,

इससे पहले कि

हमारे-तुम्हारे बीच के संवाद

अनुवादित हों

तुम कहो एक ‘शब्द’

शब्दों के बिना ।

.

कुंठित क्यों करना

नैसर्गिक आवेगों को,

प्रवाहित होने दो

पराश्रव्य और पराशब्द

संवेगों को,

इससे पहले कि

शब्द मेरे हों

हताश; निराश

तुम सुनो एक ‘शब्द’

शब्दों के बिना ।

Friday, November 4, 2011

साजिशों से बनी दीवारें ...

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कभी सर्द हवाओं;

तो कभी

गर्म थपेड़ों के बहाने

उसके इर्द-गिर्द

खड़ी कर दी गई

बिना छत की दीवारें ।

वह विभेद करता रहा,

उन दीवारों से कान सटाकर

अट्टहास और चीत्कार में ।

अक्सर रात में

उसे दिखाये गये

चमकदार तारें;

आक्सीजन के नाम पर

उसे दिया गया निरंतर

आश्वासनों का अफीम ।

वह खुद ही में खोया,

कभी खुद ही को ढोया

और फिर

फूट-फूट कर रोया ।

.

मुझे पता है अब वह

खुद को भरमायेगा;

दीवारों से सर टकरायेगा

और फिर अंततोगत्वा

वहीं मर जायेगा ।

शायद वह जानता ही नहीं

साजिशों  से बनी दीवारें

टूटा नहीं करती हैं ।

Sunday, October 16, 2011

हादसों की शक्ल में साजिशों का जलजला . .

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अपनी जुबान

वह खोलने ही वाला था;

अपने हक की बात

वह बोलने ही वाला था

कि हादसों की शक्ल में

साजिशों का जलजला आया

और देखते ही देखते

वह तब्दील हो गया

जिन्दा लाश में,

तभी से ‘वह’

फिर रहा है मारा-मारा

किसी चश्मदीद की तलाश में ।

जिन्होंने देखा था

उन्हें फुर्सत ही कहाँ थी !

वे तो इस तरह के

हादसों के अभ्यस्त थे;

समुन्दर किनारे वे

रेत के घरौन्दे

बनाने में व्यस्त थे ।

गंतव्य तक पहुँचने की जल्दी में

हवाएँ भी

घटनास्थल से कतराकर

चुपचाप निकल रहीं थीं;

धूप ने तो

घटनास्थल तक अपनी पहुँच से ही

इनकार कर दिया

क्योंकि घटना के वक्त तो वह

‘उनकी’ अट्टालिकाओं की छतों पर

मिठास कायम रखने के लिये

मिर्ची सुखाने में व्यस्त था,

उसके खुद की परछाई ने भी

उसे आगे बढ जाने के लिये

रास्ता दे दिया;

दरख्तों ने

जमीन से जुड़े होने का

वास्ता दे दिया ।

.

उसे कौन समझाये !!

अट्टालिकाओं के साये में हुए हादसों का

कोई भी चश्मदीद नहीं होता ।

Saturday, October 8, 2011

शब्दों की चुप्पी का गर्जन ..

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शब्दों ने

अक्सर इन ‘शब्दों’ को

नि:शब्द किया है.

जाने कितनी बार

शब्दहीन इन ‘शब्दों’ ने

कड़वे घूँट पिया है

.

शब्द भला कब

शब्दों से पार पाते हैं

अक्सर शब्द

शब्दों से हार जाते हैं

शब्द खुद शब्दों का

करते हैं नव-सर्जन

सुनना कभी

शब्दों की चुप्पी का गर्जन

शब्द जब

शब्दश: बयान करते हैं

तो शब्द

किसी को परेशान

तो किसी को हैरान करते हैं

शब्द जब

पत्थरों से टकराते हैं

तो लहुलुहान शब्द

फिर वहीं लौट आते हैं

.

शब्दों के झंझावात में

’शब्द’ घुट-घुट के जिया है

शब्दों ने

अक्सर इन ‘शब्दों’ को

नि:शब्द किया है.

Thursday, June 16, 2011

अगली बार ...

हर बार

उसके लिये भी

उसका हिस्सा

रखा गया

पर,

उस तक पहुँचने से पहले ही

अनुमान से ज्यादा

हिस्सेदार आ गये;

या फिर

कुछ हिस्सेदारों ने

निर्धारित से ज्यादा

उपभोग कर लिया,

और वह

वंचित रह गया.

ऐसा भी नहीं

कि उसे सर्वथा

नकार दिया गया

बल्कि,

उसे अगली बार का

आश्वासन दिया गया

वह सौभाग्यशाली है

क्योंकि,

उसके धैर्य और

उसकी महत्ता का

समवेत गुणगान

भरे मंच से किया गया.

Monday, June 6, 2011

उसे खुद की तलाश है …. (An Endless Search)

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वह गुम है,

मगर उसे

स्वयं की गुमशुदगी का

एहसास ही नहीं है.

वह अक्सर

घर से निकलता है

खुद की बजाय

किसी और की तलाश में.

उसकी पहचान आसान नहीं है

क्योंकि उसकी शक्ल प्रतिपल

बदलती रहती है,

कभी वह मिलता है

खुद के खिलाफ़

हल्फ़िया बयान देते हुए;

कभी वह मिलता है

खुद ही को व्याख्यान देते हुए,

वह अक्सर

स्वयं पर हँसता है;

आनरकीलिंग के हर केस में

वही फँसता है,

वह पेड़ों से बातें करता है;

वह नदी से मुलाकातें करता है

वह रात होने पर

सुबह का इंतजार करता है

सारी रात जागकर;

अक्सर वह

अगवानी करता है सूरज का

पूरब दिशा में भागकर,

अगले चौराहे पर

पड़ी हुई एक लाश है

अब वह भागेगा उस ओर

क्योंकि

उसे खुद की तलाश है

जी हाँ !

उसे खुद की तलाश है.

Saturday, May 21, 2011

प्रतिध्वनि ... The Echo

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प्रतिध्वनित होने के लिये जरूरी है

उच्च तीव्रता युक्त ध्वनि का

किसी वस्तु से टकराव;

जरूरी है -

स्रोत ध्वनि और

टकराव बिन्दु के बीच

कोलाहल रहित एक निश्चित दूरी;

ध्वनि ऊर्जा है

जो क्रमश: बटती जाती है,

अवलोकन और सिद्धांत बताते हैं

प्रतिध्वनित ध्वनि की तीव्रता

उत्तरोत्तर घटती जाती है.

.

उस दिन

कोलाहल युक्त इस भवन में

मुझे देख तुम

सकुचाती सी खड़ी थी,

ऐसा प्रतीत हो रहा था

मानो धरती में तुम गड़ी थी,

भीड़ का दामन थाम

मैं तुम्हारे बहुत करीब हो गया था,

इतना कि

एक सहज उत्कंठित स्पर्श का

अनायास प्रादुर्भाव हुआ था,

मेरे कर्ण पटल से टकराये थे

तुम्हारे संकुचित श्वासों संग

लगभग शून्य तीव्रता युक्त

उच्चरित अस्फुट स्वर,

और फिर तमाम सिद्धांतो से परे

ये स्वर प्रतिध्वनित हुए;

प्रतिध्वनित हो रहे हैं

यही नही,

तीव्रता ह्रास की जगह

इनकी तीव्रता बढ़ रही है

कहीं यह अनुनाद तो नहीं है?

Tuesday, May 17, 2011

पर जिन्दगी है सहमी ….

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आपाधापी

गहमागहमी

कभी गरमी

तो कभी नरमी

अन्धाधुन्ध बिक्री

एक के साथ एक फ्री

सपनों की दुकान

किधर ध्यान है श्रीमान

हम बतलाते हैं

भूत-भविष्य-वर्तमान

कभी इस पार

तो कभी उस पार

दिखने में फरिश्ते

बेचने निकले हैं

किस्तों में रिश्ते

ढीली करो अंटी

मिल रही गारंटी

आज नकद

तो कल उधार

देखो तेल,

देखो तेल की धार

राम-राम

दुआ सलाम

भागते हुए लोग

पर जिन्दगी है सहमी

आपाधापी

गहमागहमी

कभी गरमी

तो कभी नरमी.

Tuesday, May 10, 2011

अपना जिस्म लहुलुहान रखते हैं .....

जेबों में अपने हर सामान रखते हैं

दिल में ये लोग तो दुकान रखते हैं

.

शातिर मंसूबों का ज़ायजा क्या लेंगे

दुश्मनों के लिए भी गुणगान रखते हैं

.

बिखर कर भी जुड़ जाते है पल में

जिस्म में अपने सख्तजान रखते है

.

मुआवजें जब शिनाख़्त पर होते हैं

वे अपना जिस्म लहुलुहान रखते हैं

.

टिकेंगे भी भला कैसे हल्फिया बयान

वे बहुत ऊँची जान-पहचान रखते हैं

.

सफर अंजाम पाये भी तो भला कैसे

राहगीरों के सामने वे तूफान रखते हैं

.

वे बेखौफ़ न हो तो भला क्यूँ न हों

हर जुर्म के बाद वे अनुष्ठान रखते हैं

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