मंगलवार, 6 जनवरी 2026

'मीज़ान-ए-फ़न' ..... (ग़जल)

 

बहर-ओ-क़ाफ़िया की उलझन में रहा मैं इस क़दर,

मेरे हाथों से ही निकलकर इक ग़ज़ल चली गई।

 

लफ़्ज़ ही तौले किए मीज़ान-ए-फ़न पर उम्र भर,

वक़्त की ठहरी हुई वो हर इक हलचल चली गई।

 

ढूँढते ही रह गए माअनी हम हर इक शेर में,

जो हक़ीक़त में थी कहनीबात टल चली गई।

 

सोचा था ठहरेगी वो दो पल यहाँ मेरे पास ही,

आँख झपकी और वो मोहक झलक चली गई।

 

जो अनकहा थाबस वही ज़िंदा रहा है आज भी,

जो कही थी हमनेवो बनके सदा चली गई।

 

'वर्माअपने फ़न को तो हमने बचा ही लिया मगर,

ज़िंदगी जो हाथ में थीबस वो कल चली गई।

2 टिप्‍पणियां:

Razia Kazmi ने कहा…

बहूत खूब

M VERMA ने कहा…

धन्यवाद