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शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

प्यास का प्रमाण-पत्र

 

गंगा

तुम
अपनी निश्छल लहरों के संग
हर पत्थर को छूती
आगे बढ़ती रहीं।

तुमने
कभी नहीं पूछा
किस जात का है यह पत्थर,
किस धर्म का है यह किनारा।

तुम
बस बहती रहीं।

लेकिन
हरिद्वार आते-आते
तुम
मज़हबी कैसे हो गईं, गंगा?


यहाँ
तुम्हारे ही किनारों ने
कब
और क्यों
उठा लीं तख़्तियाँ
यहाँ ग़ैर-हिन्दू का प्रवेश वर्जित है!


गंगा!
यह तुम्हारी भाषा तो नहीं थी।

क्या कभी
तुम्हारे किनारों को
तख़्तियाँ थमाने वालों ने
उन नालों का हिसाब दिया
जो तुम्हारे अस्तित्व को
गंदा करते हैं?

क्या कभी उन्होंने बताया
कि उन नालों में
किस-किस धर्म का
मल-मूत्र
तुम्हें सौंपा जा रहा है?

क्या जल भी
अब पहचान माँगता है?
क्या प्यास
अब प्रमाण-पत्र देखती है?

अगर ऐसा है
तो फिर बहना छोड़ दो, गंगा।

क्योंकि
जो नदी
मनुष्य से छोटी हो जाए,
वह नदी नहीं रहती
सिर्फ़
एक दीवार
बन जाती है।

बुधवार, 29 सितंबर 2010

तुम नदी हो बहो बिना रूके, निरंतर ~ ~


तुम नदी हो बहो
बिना रूके, निरंतर
देखना तारें तुम्हें सजायेंगे,
किनारे खड़े पेड़ और
आसमान का चाँद भी
तुम्हारे विस्तृत अस्तित्व में
डुबकी लगायेंगे
बेशक दिल में हो -
सागर मिलन की तमन्ना
पर रहना चौकन्ना
मिलन की उत्कंठा कहीं
तुम्हारी गति को
बहुत तेज न कर दे
वर्ना,
लोग बाँध बना देंगे और
अवरूद्ध कर देंगे-
तुम्हारे प्रवाह को.



तुम नदी हो बहो
बिना रूके, निरंतर
पर निर्बाध गति पर
‘थकन’ अंकुश न लगा दे
तुम्हारे दिल में भी
विश्राम की इच्छा न जगा दे
और तुम,
कहीं भूल कर भी
गतिशून्य न हो जाओ
वर्ना
नकार देंगे लोग
तुम्हारे अस्तित्व को ही
और फिर
शहर के मलबे के ढेर से
ढक दिये जाओगे
प्रतीक्षारत हैं
बहुमंजिली इमारतें
तुम्हारे अस्तित्व पर कब्जा करने हेतु .



तुम नदी हो बहो
बिना रूके, निरंतर