शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

प्यास का प्रमाण-पत्र

 

गंगा

तुम
अपनी निश्छल लहरों के संग
हर पत्थर को छूती
आगे बढ़ती रहीं।

तुमने
कभी नहीं पूछा
किस जात का है यह पत्थर,
किस धर्म का है यह किनारा।

तुम
बस बहती रहीं।

लेकिन
हरिद्वार आते-आते
तुम
मज़हबी कैसे हो गईं, गंगा?


यहाँ
तुम्हारे ही किनारों ने
कब
और क्यों
उठा लीं तख़्तियाँ
यहाँ ग़ैर-हिन्दू का प्रवेश वर्जित है!


गंगा!
यह तुम्हारी भाषा तो नहीं थी।

क्या कभी
तुम्हारे किनारों को
तख़्तियाँ थमाने वालों ने
उन नालों का हिसाब दिया
जो तुम्हारे अस्तित्व को
गंदा करते हैं?

क्या कभी उन्होंने बताया
कि उन नालों में
किस-किस धर्म का
मल-मूत्र
तुम्हें सौंपा जा रहा है?

क्या जल भी
अब पहचान माँगता है?
क्या प्यास
अब प्रमाण-पत्र देखती है?

अगर ऐसा है
तो फिर बहना छोड़ दो, गंगा।

क्योंकि
जो नदी
मनुष्य से छोटी हो जाए,
वह नदी नहीं रहती
सिर्फ़
एक दीवार
बन जाती है।

2 टिप्‍पणियां:

Digvijay Agrawal ने कहा…

सुंदर रचना
आभार
सादर

M VERMA ने कहा…

धन्यवाद