लुटेरों के हाथों में अब है कमान,
डरी सहमी बैठी है हर इक दुकान।
जहाँ खोद बुनियाद सब चुप खड़े,
हैं लरज़ते हुए आज खामोश मकान।
गए ढूँढने जो यहाँ क़ातिलों को,
मिला उनके हाथों में क़त्ल-ओ-सामान।
थी बस्ती कभी ख़्वाब की रौशनी,
बना मोड़ हर आज तो श्मशान।
उठी जब भी ज़ुल्मों के ख़िलाफ़ उँगली,
बदलने लगे चेहरे सब हुक्मरान।
जहाँ लोग वहशी, वहीं ख़ौफ़ है,
थमी हर ढलान और थमा तूफ़ान।
गुनाह है ये 'वर्मा' कि तुम चुप रहो,
जले शहर और सब को है इत्मिनान।
लरज़ते = कांपते




