रविवार, 21 जून 2026

अंतिम संस्कार का मैनेजमेंट

 

मत करिए ऐसे सवाल,
इन सवालों में कोई दम नहीं है।

घाटे में चल रही एजेंसियाँ
अगर कुछ पेपर लीक करवा रही हैं,
तो कौन-सा तूफ़ान आ गया?

हमारी तत्परता देखिए
बिना किसी विलंब के
हमने अगले पेपर को
"लीक-प्रूफ" बनाने का वायदा कर दिया।

लगता है,
आप आज के समाचार से अनभिज्ञ हैं।
आज ही हमने
लीक की बात फैलाने वाले को
'रासुका' के तहत गिरफ्तार कर लिया।

उधर मीडिया भी
अपनी भूमिका निभा रहा है
वह प्रश्न नहीं पूछता,
वह केवल स्वर बदलता है।

पेपर लीक से अधिक महत्वपूर्ण उसे
हमारी प्रयासजनित मुस्कान लगती है,
और (आत्म)हत्याओं से अधिक
हमारी घोषणाओं की टाइमिंग।

अब रही बात आत्महत्याओं की
तो निश्चिंत रहिए,
हमारी सरकार
अंतिम संस्कार तक की व्यवस्था रखने में सक्षम है।

हमने तो
पचास से अधिक संभावित आत्महत्याओं के लिए
चिताओं का प्रबंध पहले ही कर रखा था।
दुर्भाग्य से
आत्महत्याएँ हुईं
दो दर्जन से भी कम।

बाक़ी चिताएँ
अब भी खाली पड़ी हैं।

मीडिया ने इस उपलब्धि को
बड़ी प्रमुखता से दिखाया
खाली पड़ी चिताएँ नहीं,
बल्कि हमारी तैयारियों की सराहना।

बताइए,
इतनी दूरदर्शी व्यवस्था के बाद भी
आप हमसे जवाब माँग रहे हैं?

हमें उन युवाओं की नहीं,
सरकारी संसाधनों की बर्बादी की चिंता है
आख़िर वह भी
आपके ही टैक्स का पैसा है।

इसीलिए
परीक्षा-तंत्र और प्रतियोगी व्यवस्थाओं की
इन छोटी-मोटी विसंगतियों को
हम आशावादी दृष्टि से देख रहे हैं।

सरकार की प्राथमिकता स्पष्ट है
नौकरियों की रिक्तियाँ
बरसों तक खाली रह सकती हैं,

लेकिन

चिताओं की रिक्तियाँ
भरने में
यह व्यवस्था
कभी देर नहीं करती।

बुधवार, 17 जून 2026

तिनका-ए-दूब

आईना होकर पत्थर के गाँव में रहता है,

इश्क़ भला बिखर जाने से कब डरता है।

 

जानता है कि ढह जायेगा रेत का महल,

हर रोज़ मगर नींव फिर वही धरता है।

 

समझाते रहे किनारेवो क्यों मानेगा,

डूबने के लिए जो समंदर में उतरता है।

 

मुस्कुराहट उसके हालात का तर्जुमा नहीं,

काँटों की सियासत से ही वो गुज़रता है।

 

हवा गुमसुम हैतेल और बाती नहीं है,

बिना शोर के दिया फिर भी जलता है।

 

रौंदनाकुचलना तुम्हारी फितरत होगी,

तिनका-ए-दूब फिर भी कहाँ मरता है?

 

ठोकरों की भी कोई न कोई सरहद होगी,

'वर्माइन्हीं ठोकरों से हर बार सँवरता है।

सोमवार, 15 जून 2026

विकास का आर्किटेक्चरल मॉडल

विकास का एजेंडा
पहले ही तय कर दिया गया था।
आर्किटेक्चरल मॉडल के सामने
नारियल भी फोड़ दिया गया।

समस्त तंत्र और मीडिया
उसकी बारीकियाँ समझाने में जुटे हैं।
कोई उँगली रखकर बताता है
"देखिए, यह हाईवे है,
यहाँ गति की पूरी स्वतंत्रता होगी।"

फिर धीरे से जोड़ देता है
"और हाँ,
खुलेआम व्यभिचार की
अतिरिक्त सुविधा भी उपलब्ध रहेगी;
आख़िर विकास
सुविधाओं के विस्तार का ही दूसरा नाम है।"

दूसरा बताता है
"पताकाओं से चिह्नित ये स्थान मंदिर हैं।
यहाँ चोरी के धन से अर्जित
चंदे के पवित्र हो जाने की
प्रबल संभावनाएँ हैं।
यह मॉडल
उस चंदे के एक अंश को
पुनः चुराकर
पुनर्चक्रण की प्रक्रिया को भी
निर्बाध बनाए रखता है;
ताकि पाप और पुण्य के बीच
पूँजी का प्रवाह कभी अवरुद्ध न हो।"

नग्न स्त्री के पीछे भीड़ खड़ी है
"इस कटआउट पर ध्यान मत दीजिए,
यह तो मणिपुर है,
हम समय रहते
इसे ढँक देंगे
खबरों से,
बयानबाज़ी से,
और सबसे ज़्यादा
चुप्पी से।"

विशेष बात यह है
हाशिये पर खड़े लोगों को
हाशिये पर ही रखा गया है,
पर इस मॉडल में उनका भी
'प्रमोशन' सुनिश्चित है।
उनके हाथों में होंगी
धर्म की पताकाएँ,
और जिह्वा पर
विद्वेष के नारे
जिन्हें लहराने और दोहराने की
उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता होगी।

शनिवार, 13 जून 2026

कतल जेकर भयल ओही बा कातिल (भोजपुरी)

 

नेतवन के कारण चहु ओर त तबाही बा

लुट गयल देश मगर शौक राजशाही बा।

 

ओनके बदे सजेला छप्पन भोग क थरिया*

हमनी खातिर कडुवा तेलवो* क मनाही बा।

 

महलन में बा सतरंगी अँजोरिया क नदिया

झोपडी में ढेबरी जलावे के भी कोताही बा।

 

भूख से बेहाल जनता पूछत बाटे चुपके से,
ई कइसन रामराजकइसन बादशाही बा।

 

ओनकर हर गलती पर परदा पड़ल रहेला,
गरीब गुरबा के संसवो पर भी उगाही बा।

 

धरम के नाम पे बाँट देहला अंग्रेजन जइसे,
फूट के सरहद पर अबो तैनात सिपाही बा।

 

देखा कतल जेकर भयल ओही बा कातिल

एही बात के बदे त अदालत में गवाही बा।



*थरिया = थाली

*कडुवा तेल = सरसो का तेल

बुधवार, 10 जून 2026

तीसरा रास्ता

 

वह नज़र झुकाकर चलती थी,
और शोहदे उसके पीछे-पीछे चलते थे।
उसके लिये
रास्ता अक्सर अपमान में बदल जाता था।

उसने हिम्मत की,
एक दूसरी राह चुनी
पर वहाँ भी
चेहरों की वही भीड़ थी,
वही भूखी निगाहें,
वही सदियों पुराना खेल।

तीसरा कोई रास्ता नहीं था,
सो वह लौट आई
उसी राह पर।

मगर इस बार
सिर्फ एक फर्क था
उसकी नज़र झुकी हुई नहीं थी।

चमत्कार यह नहीं था
कि राह में कोई मिला नहीं;
चमत्कार यह था कि
इस बार
किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी
कि उसका रास्ता रोक सके।

वह चलती रही
अपने पूरे अस्तित्व के साथ,
और पहुँच गई
वहाँ,
जहाँ पहुँचने से उसे
इतने वर्षों तक डराया गया था।

रविवार, 7 जून 2026

अनुपस्थित रूदाली

 

सुना था
किसी मौत पर
पुराने समय में
राजघरानों में
रुदन के लिये
रूदालियाँ बुलाई जाती थीं।

मणिपुर मारा जा रहा है।

वह कई बार
मर भी चुका है।

अब वह
अपने ही मरने का दृश्य देखने के लिये
तटस्थ भाव से
खड़ा हो जाता है।

अपने जिस्म को
छलनी होते हुए,
अपने घरों को
जलते हुए,

और अपने अस्तित्व को
किसी अख़बार के कोने में छपे
एक समाचार में बदलते हुए
देखता रहता है।

उसने सीख लिया है
कि हर चीख
सुर्ख़ी नहीं बनती,

और हर मौत के हिस्से में
शोक नहीं आता।

 

मत भूलो

सत्ता का काम
शोक मनाना नहीं,
शोक पर वक्तव्य देना है;

और कई बार
वक्तव्य भी नहीं।

सत्ता
दुःख में सहभागी होने,
आँसू बाँटने,
या रूदालियाँ भेजने के लिये
नहीं होती।

वैसे भी
वह व्यस्त रहती है
चुनावी मंचों पर,

जहाँ हर हाल में
मुस्कुराना पड़ता है;

वहाँ आँकड़ों की जगह है,
आँसुओं की नहीं,

और रूदन
किसी भी विजय-गीत के साथ
अच्छा नहीं लगता।

इसलिये,

जब कोई नहीं आएगा
तुम्हारे मृतकों के लिये रोने,

जब कोई नहीं लिखेगा
तुम्हारे दुःख का इतिहास,

जब तुम्हारी आग
दूर बैठे लोगों के लिये
महज़ एक समाचार भर रह जाएगी,

 

तब

अपनी ही मौत पर
तुम्हें स्वयं ही
रूदाली बनना होगा।

 

और अपनी ही राख के सामने
खड़े होकर
अपने लिये रोना होगा।

गुरुवार, 4 जून 2026

सपनों का मलबा

कुछ पेपर लीक पर
इतना शोर क्यों है?
निष्पक्ष परीक्षाओं पर
इतना ज़ोर क्यों है?

आख़िर
आत्महत्याएँ हुई ही कितनी हैं?
कुछ गिनी-चुनी।

जो कि उम्मीद से कम है
लोकतंत्र के गणित में
ये संख्याएँ हैं बेकार

आख़िर क्या-क्या देखेगी

बेचारी सरकार।

 

और फिर बेईमानी भी तो

एक प्रक्रिया है

ईमानदारी और धैर्य परीक्षण की

आपको क्या लगता है,
हम सो रहे हैं?
हम भी आप जितना ही
चिंतित हो रहे हैं।

पिछली बार जब पेपर लीक हुआ था,
हम जाँच आयोग लाए थे;
उसकी जाँच अभी चल रही है,
हाँ यह सच है कि

नतीजे नहीं आए थे।

धैर्य रखिए,
व्यवस्था काम कर रही है;
हर घोटाले पर
एक नई फ़ाइल तैयार हो रही है।

छात्र सपनों के मलबे में दबें
तो दबे रहें,
महत्त्वपूर्ण यह है कि
जाँच की प्रक्रिया
निरंतर जारी है।

रविवार, 31 मई 2026

झूठे आश्वासनों का थक्का

पूरे शहर में
दहशत पसरी हुई थी।

लोग अभी पिछली महामारी की राख से
पूरी तरह बाहर भी नहीं निकले थे
कि एक नई, अनजान मौत
फिर गलियों में उतर आई।

लोग मर रहे थे
बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के।
न तेज़ बुखार,
न खाँसी,
न शरीर पर कोई साफ़ निशान।

अस्पताल भरे पड़े थे।
दवाइयाँ असर खो चुकी थीं।
विशेषज्ञ
अपनी-अपनी स्क्रीन पर झुके
संभावनाओं की सुरंगों में
कारण तलाश रहे थे।

तभी किसी ने कहा
क्यों न किसी मृतक का
पोस्टमार्टम किया जाए?”

सुझाव असुविधाजनक था,
फिर भी स्वीकार कर लिया गया।

एक शव
सफ़ेद रोशनी से भरी मेज़ पर लिटाया गया।
डॉक्टरों की टीम ने
घंटों उसकी नसें, ऊतक,
रक्त और जीवन का इतिहास टटोला।

आख़िरकार रिपोर्ट आई

शरीर के अधिकांश अंग
सामान्य पाए गए।
रक्त प्रवाह भी संतुलित था।

लेकिन हृदय के निकट
एक गाढ़ा थक्का जमा मिला
झूठे आश्वासनों का।

यह धीरे-धीरे बनता रहा
जब से मृतक ने
अपने हिस्से की रोटी,
रोज़गार
और सम्मानजनक जीवन का सपना देखा था।

इसके अतिरिक्त
रक्त में धार्मिक घृणा के सूक्ष्म कण
असामान्य मात्रा में पाए गए,
जो लंबे समय से
उसकी संवेदनाओं को
भीतर ही भीतर नष्ट कर रहे थे।

रिपोर्ट पढ़ते ही
कमरे में सन्नाटा भर गया।

फिर अचानक
कुछ वरिष्ठ विशेषज्ञ बुलाए गए।
रिपोर्ट रोक दी गई।
शब्द बदले गए।
निष्कर्ष संशोधित हुए।

और अंततः
जनता के लिए नई रिपोर्ट जारी की गई

मृतक अपनी निजी आदतों
और अव्यवस्थित जीवनशैली के
स्वयं जिम्मेदार पाए गए।

इसके साथ ही
फाइल बंद कर दी गई।

टीवी चैनलों को निर्देशित किया गया
भव्यताओं का उत्सव दिखाने को,
अख़बारों को
नई सुर्खियाँ चुनने को।

और इस पर
विधिवत अमल हुआ।

शहर
जीवित बने रहने की आदिम इच्छा में
एक बार फिर
धीरे-धीरे
रेंगने लगा।