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बुधवार, 17 जून 2026

तिनका-ए-दूब

आईना होकर पत्थर के गाँव में रहता है,

इश्क़ भला बिखर जाने से कब डरता है।

 

जानता है कि ढह जायेगा रेत का महल,

हर रोज़ मगर नींव फिर वही धरता है।

 

समझाते रहे किनारेवो क्यों मानेगा,

डूबने के लिए जो समंदर में उतरता है।

 

मुस्कुराहट उसके हालात का तर्जुमा नहीं,

काँटों की सियासत से ही वो गुज़रता है।

 

हवा गुमसुम हैतेल और बाती नहीं है,

बिना शोर के दिया फिर भी जलता है।

 

रौंदनाकुचलना तुम्हारी फितरत होगी,

तिनका-ए-दूब फिर भी कहाँ मरता है?

 

ठोकरों की भी कोई न कोई सरहद होगी,

'वर्माइन्हीं ठोकरों से हर बार सँवरता है।