सुना था
किसी मौत पर
पुराने समय में
राजघरानों में
रुदन के लिये
रूदालियाँ बुलाई जाती थीं।
मणिपुर मारा जा रहा है।
वह
कई बार
मर भी चुका है।
अब
वह
अपने ही मरने का दृश्य देखने के लिये
तटस्थ भाव से
खड़ा हो जाता है।
अपने
जिस्म को
छलनी होते हुए,
अपने घरों को
जलते हुए,
और अपने अस्तित्व को
किसी अख़बार के कोने में छपे
एक समाचार में बदलते हुए
देखता रहता है।
उसने
सीख लिया है
कि हर चीख
सुर्ख़ी नहीं बनती,
और
हर मौत के हिस्से में
शोक नहीं आता।
मत भूलो—
सत्ता
का काम
शोक मनाना नहीं,
शोक पर वक्तव्य देना है;
और
कई बार
वक्तव्य भी नहीं।
सत्ता
दुःख में सहभागी होने,
आँसू बाँटने,
या रूदालियाँ भेजने के लिये
नहीं होती।
वैसे
भी
वह व्यस्त रहती है
चुनावी मंचों पर,
जहाँ
हर हाल में
मुस्कुराना पड़ता है;
वहाँ
आँकड़ों की जगह है,
आँसुओं की नहीं,
और रूदन
किसी भी विजय-गीत के साथ
अच्छा नहीं लगता।
इसलिये,
जब
कोई नहीं आएगा
तुम्हारे मृतकों के लिये रोने,
जब
कोई नहीं लिखेगा
तुम्हारे दुःख का इतिहास,
जब
तुम्हारी आग
दूर बैठे लोगों के लिये
महज़ एक समाचार भर रह जाएगी,
तब
अपनी
ही मौत पर
तुम्हें स्वयं ही
रूदाली बनना होगा।
और
अपनी ही राख के सामने
खड़े होकर
अपने लिये रोना होगा।

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