पूरे शहर में
दहशत पसरी हुई थी।
लोग अभी पिछली महामारी की राख से
पूरी तरह बाहर भी नहीं निकले थे
कि एक नई, अनजान मौत
फिर गलियों में उतर आई।
लोग मर रहे थे—
बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के।
न तेज़ बुखार,
न खाँसी,
न शरीर पर कोई साफ़ निशान।
अस्पताल भरे पड़े थे।
दवाइयाँ असर खो चुकी थीं।
विशेषज्ञ
अपनी-अपनी स्क्रीन पर झुके
संभावनाओं की सुरंगों में
कारण तलाश रहे थे।
तभी किसी ने कहा—
“क्यों न किसी मृतक का
पोस्टमार्टम किया जाए?”
सुझाव असुविधाजनक था,
फिर भी स्वीकार कर लिया गया।
एक शव
सफ़ेद रोशनी से भरी मेज़ पर लिटाया गया।
डॉक्टरों की टीम ने
घंटों उसकी नसें, ऊतक,
रक्त और जीवन का इतिहास टटोला।
आख़िरकार रिपोर्ट आई—
“शरीर के अधिकांश अंग
सामान्य पाए गए।
रक्त प्रवाह भी संतुलित था।
लेकिन हृदय के निकट
एक गाढ़ा थक्का जमा मिला—
झूठे आश्वासनों का।
यह धीरे-धीरे बनता रहा
जब से मृतक ने
अपने हिस्से की रोटी,
रोज़गार
और सम्मानजनक जीवन का सपना देखा था।
इसके अतिरिक्त
रक्त में धार्मिक घृणा के सूक्ष्म कण
असामान्य मात्रा में पाए गए,
जो लंबे समय से
उसकी संवेदनाओं को
भीतर ही भीतर नष्ट कर रहे थे।”
रिपोर्ट पढ़ते ही
कमरे में सन्नाटा भर गया।
फिर अचानक
कुछ वरिष्ठ विशेषज्ञ बुलाए गए।
रिपोर्ट रोक दी गई।
शब्द बदले गए।
निष्कर्ष संशोधित हुए।
और अंततः
जनता के लिए नई रिपोर्ट जारी की गई—
“मृतक अपनी निजी आदतों
और अव्यवस्थित जीवनशैली के
स्वयं जिम्मेदार पाए गए।”
इसके साथ ही
फाइल बंद कर दी गई।
टीवी चैनलों को निर्देशित किया गया
भव्यताओं का उत्सव दिखाने को,
अख़बारों को
नई सुर्खियाँ चुनने को।
और इस पर
विधिवत अमल हुआ।
शहर—
जीवित बने रहने की आदिम इच्छा में—
एक बार फिर
धीरे-धीरे
रेंगने लगा।

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