मत करिए ऐसे सवाल,
इन सवालों में कोई दम नहीं है।
घाटे में चल रही एजेंसियाँ
अगर कुछ पेपर लीक करवा रही हैं,
तो कौन-सा तूफ़ान आ गया?
हमारी तत्परता देखिए—
बिना किसी विलंब के
हमने अगले पेपर को
"लीक-प्रूफ" बनाने का वायदा कर
दिया।
लगता है,
आप आज के समाचार से अनभिज्ञ हैं।
आज ही हमने
लीक की बात फैलाने वाले को
'रासुका' के तहत गिरफ्तार कर लिया।
उधर मीडिया भी
अपनी भूमिका निभा रहा है—
वह प्रश्न नहीं पूछता,
वह केवल स्वर बदलता है।
पेपर लीक से अधिक महत्वपूर्ण उसे
हमारी प्रयासजनित मुस्कान लगती है,
और (आत्म)हत्याओं से अधिक
हमारी घोषणाओं की टाइमिंग।
अब रही बात आत्महत्याओं की—
तो निश्चिंत रहिए,
हमारी सरकार
अंतिम संस्कार तक की व्यवस्था रखने में सक्षम है।
हमने तो
पचास से अधिक संभावित आत्महत्याओं के लिए
चिताओं का प्रबंध पहले ही कर रखा था।
दुर्भाग्य से
आत्महत्याएँ हुईं
दो दर्जन से भी कम।
बाक़ी चिताएँ
अब भी खाली पड़ी हैं।
मीडिया ने इस उपलब्धि को
बड़ी प्रमुखता से दिखाया—
खाली पड़ी चिताएँ नहीं,
बल्कि हमारी तैयारियों की सराहना।
बताइए,
इतनी दूरदर्शी व्यवस्था के बाद भी
आप हमसे जवाब माँग रहे हैं?
हमें उन युवाओं की नहीं,
सरकारी संसाधनों की बर्बादी की चिंता है—
आख़िर वह भी
आपके ही टैक्स का पैसा है।
इसीलिए
परीक्षा-तंत्र और प्रतियोगी व्यवस्थाओं की
इन छोटी-मोटी विसंगतियों को
हम आशावादी दृष्टि से देख रहे हैं।
सरकार की प्राथमिकता स्पष्ट है—
नौकरियों की रिक्तियाँ
बरसों तक खाली रह सकती हैं,
लेकिन
चिताओं की रिक्तियाँ
भरने में
यह व्यवस्था
कभी देर नहीं करती।
2 टिप्पणियां:
वर्तमान की सच्चाई का अच्छा उदाहरण है l
Thanks
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