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रविवार, 25 अक्टूबर 2026

प्रतिरोध का जंगल

तुम्हारे दमन ने

मृत्युदंड के आदेश पर
हस्ताक्षर करके
निब तोड़ने की
परम्परा का
निर्वहन किया।

पर

प्रतिरोध के बीज
इतने सूक्ष्म थे
कि
फाँसी के फंदों को भी
नकार गए।

तुमने उन्हें
नगण्य समझकर
नज़रअंदाज़ कर दिया।

और...
यही
तुम्हारी भूल थी।

तुम्हें क्या पता—
बीजों का स्वभाव ही है
अँधेरे में
जड़ें जमाना।

एक दिन
तुम्हारी बनाई
दीवारों की दरारों से
वे निकलेंगे—

और
तुम्हारे दमन की छाती पर
उसी टूटे हुए निब से

प्रतिरोध का
एक पूरा जंगल
लिख देंगे।

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

अनधिकृत साँसेँ

 

अख़बार के पहले पन्ने पर

प्राइम समाचार था—

 

CID ने एक घर में छापा मारा

और पाँच व्यक्तियों को

अनधिकृत रूप से

साँस लेते पाया।

 

सरकार ने

इसे देशद्रोह घोषित कर दिया

और इन साँसों के पीछे

विदेशी फंडिंग की आशंका से

इंकार नहीं किया।

 

मीडिया में

बहस छिड़ गई—

 

ख़ास लोगों के लिए

आरक्षित साँसों की

तस्करी में

किन लोगों का हाथ है?

 

और

इन पाँच आम लोगों तक

ये पहुँची कैसे?

 

अख़बार के

आख़िरी पन्ने पर

एक छोटी-सी ख़बर

यह भी थी—

बलात्कार की शिकार

मासूम की

मौत हो गई।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

गिद्धों का लोकतंत्र

 

उन्होंने पाल रखे हैं
गिद्धों को—

मासूम और अवयस्क
परिंदों की टोह लेने के लिए।

ये अक्सर
रेकी पर निकलते हैं—

लौटकर
चटखारे लेते हुए
उन्हें अवगत कराते हैं
परिंदों की बेबसी का।

अबकी बार

शिकार का फरमान

जारी नहीं होता—

 

वे खुद

गिद्धों के साथ

निकल पड़ते हैं।

वे नोच डालते हैं
मासूम परिंदों के पंख—

 

कुछ परिंदों का

गोश्त चबाते हुए

वे चटखारे लेते हैं—

फिर

बचे हुए परिंदों को

उड़ने की नसीहत देते हैं।

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

Gen-0 का प्रतिरोध

पहुँच गया है
सार्थक प्रतिरोध का स्वर
Gen-Z से
Gen-Alpha तक।

डर का
एकछत्र साम्राज्य
अचानक
बौना हो गया है।

डर को
पहली बार
डर लगने लगा है।

मैं चाहता हूँ—
इससे पहले कि
डर फिर से
सर उठाए
और
सार्थक प्रश्नों को
डराए,

प्रतिरोध का यह स्वर
भ्रूण में पल रहे
Gen-0 तक भी
पहुँचे।

वह
जन्म से पहले ही
अपनी माँगों की
एक सूची तैयार करे—

और उसमें
एक चेतावनी भी हो
उन लोगों के लिए
जो उसके जन्म से पहले ही
उसकी
जाति और धर्म
तय किए बैठे हैं।

वह उनसे पूछे—

अभी तो
मैंने आँखें भी नहीं खोलीं,
तुमने
मेरी पहचान
कैसे तय कर ली?

अभी तो
मैंने बोलना भी नहीं सीखा,
तुमने
मेरी भाषा,
मेरा धर्म,
मेरी जाति
कैसे चुन ली?

और हाँ—

उसकी
पहली माँग
बस इतनी हो—

मुझे जन्म लेने दो।

मुझे
अपनी पहचान
खुद चुनने दो।

क्योंकि
मैं तुम्हारी
पहले से लिखी हुई
पहचान नहीं हूँ—

मैं एक संभावना हूँ। 

बुधवार, 12 अगस्त 2026

जाति की सीढ़ी

ऊँची जाति वाले ने
नीची जाति वाले से कहा—
तुम नीची जाति के हो।

 

नीची जाति वाला
कुछ नहीं बोला।

 

बस
चुपचाप
ढूँढने निकल पड़ा—
अपने से नीची
जाति वाले को।

 

और इस तरह
जाति की सीढ़ी
एक पायदान और
लंबी हो गई।

शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

स्याही की ताकत

 

धवल कागज़ पर
स्याही
धब्बा नहीं होती,
वह
कागज़ का श्रृंगार होती है।

कभी
उसी स्याही ने
"वंदे मातरम्" लिखा था,
और
उसी स्याही ने
दमन के परचम को
स्याह कर दिया था।

उसी स्याही ने
"खोल दो" लिखा,
तो
विभाजन की सियासत का
नंगा चेहरा
दुनिया के सामने रख दिया।

स्याही
इंकलाब का
दूसरा नाम है।

कालिख
नहीं जानती
स्याही की ताक़त।

उसे क्या मालूम—
काला होना
और
इतिहास लिखना,
दो अलग-अलग बातें हैं।

और जब
सत्ता के इशारे पर
यही स्याही
जनसंघर्ष के
आदमकद चेहरे पर
उछाली जाती है,

तब वही स्याही
चेहरे पर
कुछ ऐसा लिखती है

कि
चेहरा
काला नहीं होता,

बल्कि
रक्ताभ हो
दमक उठता है।

सोमवार, 20 जुलाई 2026

पहले होर्डिंग का जन्म

 

पहले होर्डिंग का जन्म
यक़ीनन
पहले झूठ के साथ हुआ होगा।

और सतरंगी पहला झूठ
शायद
भाषा के आविष्कार के साथ
जन्मा होगा।

भाषा-विहीन समय में
झूठ
अगर था भी,
तो गूँगा था—
अपने ही भीतर
कैद।

फिर
जैसे-जैसे
हम
सभ्य (तथाकथित) होते गए,
झूठ ने
शब्द ओढ़ लिए,
फिर रंग,
फिर नारे,
फिर मुस्कराते चेहरे।

और एक दिन
वही आवरण
होर्डिंग बन गया।

क्योंकि
होर्डिंग
और कुछ नहीं—
झूठ का
सबसे विशाल चेहरा है।

बुधवार, 8 जुलाई 2026

चुम्बन और चुम्बक

चुम्बन और चुम्बक में
केवल ध्वन्यात्मक साम्य ही नहीं,
स्वभाव का रिश्ता भी है।

दोनों खींच लेते हैं
अपने-अपने ध्रुव की ओर।

चुम्बकीय फ्लक्स* की
अदृश्य लय में
विपरीत ध्रुव
प्रगाढ़ आलिंगन में बँध जाते हैं।

फिर अलग होने के लिए
अतिरिक्त बल लगाना पड़ता है।

अमूर्त प्रेम
जब मूर्त होने लगता है,
तो वह
संकोच के हल्के स्पर्श से
होकर गुजरता है।

स्पर्शजनित अनुनाद
दैहिक कायनात को प्रकम्पित करता है;
वहीं से जन्म लेता है
एक चुम्बन,
जो प्रगाढ़ आलिंगन को आमंत्रित करता है।

उस क्षण
आकर्षण का अदृश्य फ्लक्स
दो देहों को
एक अनुभव में बदल देता है।



*फ्लक्स = चुम्बकीय बल रेखाएँ

रविवार, 5 जुलाई 2026

अंकुरित शब्द


मैंने
एक शब्दकोश के
समस्त शब्दों को
निर्देशित किया—

एक कविता के लिए।

और उन्हें

एक विस्तृत जाल की तरह
फैला दिया

शब्दों से
शब्द टकराते रहे,
कुछ इधर,
कुछ उधर
बिखरते रहे।

पर कविता के नाम पर
उपलब्धि वही रही—
वह इस जाल में नही फंसी

और फिसल गयी

मैंने
हार नहीं मानी।

इस बार
कुछ अलग करने की ठानी।

शब्दकोश से बाहर निकल आया,
और
चिंतन के भीतर उतर गया।

वहीं
मुझे कुछ शब्द मिले—
परेशान,
सहमे,
प्रतीक्षारत।

वे ऐसे दिखे
जैसे
अभी-अभी रोपे गए
धान के नन्हे पौधे—

जिन्हें
कविता नहीं,
बस
थोड़ा-सा पानी,
थोड़ी-सी धूप
और
बहुत-सा समय चाहिए था।

मैंने
उन्हें फिर
निर्देशित नहीं किया
किसी कविता में ढलने के लिए।

बस उन्हें समय दिया

वे शब्द नहीं,
बीज थे।

समयांतराल के बाद

वे फूटे,
अंकुराए,
और जब कविता बने—

तो पता चला,
शब्द नहीं रो रहे थे,
एक नन्ही बच्ची रो रही थी।

और
कुछ शब्दों की शक्लें
क्षत-विक्षत कबूतरों जैसी थीं—
जिनकी उड़ान
किसी गिद्ध ने
उड़ने से पहले ही
नोच डाली थी।

गुरुवार, 2 जुलाई 2026

आँकड़ों की रोटी

 

रोटियों से खेलने वाले
रोटियों के लिए तरसते
भूखे लोगों को
रोटियाँ बाँटते हैं।

फ़र्क़ बस इतना है कि
ये रोटियाँ
आटे से नहीं,
आँकड़ों से गढ़ी जाती हैं।

इनका जन्म
खेतों और चूल्हों में नहीं,
सात सितारा होटलों के
ठंडे, चमकदार कमरों में होता है,

जहाँ भूख पर
लंबी-लंबी चर्चाएँ होती हैं,
मगर
भूख
कभी उस मेज़ तक नहीं पहुँचती।

इन रोटियों पर
धार्मिक वैमनस्य की
मीठी परत चढ़ा दी जाती है,

और कृत्रिम आँकड़ों से
ढक दिया जाता है
भूख के सूचकांक का गिरता हुआ सच।

फिर
भूखे और नंगे लोग
अनजाने ही
एक ऐसे चक्रव्यूह में उतर जाते हैं

जहाँ
रोटियों की जगह
नारे परोसे जाते हैं,

और वे
अपने खाली पेट की आवाज़ दबाकर
उसी व्यवस्था की
जय-जयकार करने लगते हैं

जो उनकी थाली में
रोटी कभी नहीं आती—
सिर्फ़ रोटी के आँकड़े आते हैं।

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

"स्पर्शबिंदु" - "The Tangent"


मैं जानता हूँ—
तुम मुझे समग्र रूप से
स्पर्शित नहीं कर सकती
क्योंकि
तुम एक सरल रेखा हो
और मैं—वृत्त।


तुम्हारा स्पर्श
किसी एक बिंदु पर
आकर ठहर जाता है,
जबकि मेरा अस्तित्व
घूमता रहता है
अपने ही केंद्र के चारों ओर।

तुम आगे बढ़ती हो
दिशा के भरोसे,
मैं लौट आता हूँ
हर बार
खुद तक।


हम मिलते हैं—
संभवतः
किसी स्पर्शबिंदु पर,
पर वहीं
हमारी असहमति भी जन्म लेती है—
तुम आगे बढ़ जाना चाहती हो,
और मैं
उस क्षण को
पूरा करना चाहता हूँ।


इसलिए
तुम मुझे छू तो सकती हो,
समेट नहीं सकती—
जैसे रेखा
वृत्त को
समझ तो ले,
पर बन नहीं सकती।

चलो, एक सहमति बनाएँ कि
हम न रेखा रहें, न वृत्त—
हम एक नया आयाम बनें,
जहाँ ठहरना भी गति हो,
और भटकना भी
एक मंज़िल।

बुधवार, 21 जनवरी 2026

ज़रूरी है युद्ध—


ज़रूरी है युद्ध—
किसी ज़मीन के लिए नहीं,
किसी झंडे के लिए नहीं,
ज़रूरी है युद्ध
उस थाली के ख़िलाफ़
जिसमें रोज़
अन्याय परोसा जाता है
और कहा जाता है—
चुप रहो,
यही राष्ट्र है।

ज़रूरी है युद्ध

उस भाषा के ख़िलाफ़
जो हत्या को
“सामान्य क्षति”
और भूख को
“संयोग” कहती है।

सवाल यहाँ बदतमीज़ी हैं,
असहमति गुनाह,
और चुप्पी—
देशभक्ति।

हम तालियाँ बजाते रहे
और आकाश बिकता रहा।
हम चुप रहे—
और वही
सबसे बड़ा अपराध था।

याद रखो—
तानाशाही
तालियों से पैदा होती है,
और आज़ादी
एक अकेली
काँपती आवाज़ से।

ज़रूरी है युद्ध—
क्योंकि शांति के नाम पर
हर असहमत आवाज़ के सामने
हादसों के गड्ढे तैनात किये जा रहे हैं.
इसलिए—
यह कोई नारा नहीं,
कोई उत्सव नहीं।

बस इतना जान लो—
ज़रूरी है
यह युद्ध।

सोमवार, 19 जनवरी 2026

'ना' को बाहर आने दो

 

थाली-ताली बहुत बजा ली,

अब असली स्वर को आने दो,

जो भाषा सच को निगल गई,

उस भाषा को मर जाने दो।

 

अकेले होने का डर तज दो,

तुम भीड़ में भी तन्हा हो,

अब काँपते होंठों से ही सही,

पर 'ना' को बाहर आने दो।

 

जो मस्तक झुकते आए हैं,

अब उन्हें जरा तन जाने दो,

जो न्याय की बाँसुरी टूट गई,

उसे फिर से स्वर बन जाने दो।

 

बाज़ार सजा है झूठों का,

तुम अपना सच ले अड़ जाओ,

इतिहास लिखे जो कायरता,

उस पन्ने को फट जाने दो।

 

ज़मीर की सूखी धरती पर,

विद्रोह के अंकुर फूटने दो,

जो ज़ंजीरें रूह को जकड़े हैं,

उन कड़ियों को अब टूटने दो।

 

मत पूछो अंजाम क्या होगा,

बस कदम को आगे बढ़ने दो,

जो राख दबी है सीने में,

उसे शोला बनकर जलने दो।

बुधवार, 14 जनवरी 2026

"अनावश्यक मनुष्य"

 

औज़ारों और मशीनों के पास

नहीं होते—

अपने दिमाग़,

दिल और विवेक।

वे अनभिज्ञ रहते हैं परिणाम से,

चलते हैं संकेतों पर— नेपथ्य से।

 

नेपथ्य में मीटिंग्स होती हैं,

नीतियाँ गढ़ी जाती हैं,

और जीवित संघर्षों को

स्लाइडों में बदल दिया जाता है।

 

धीरे-धीरे इंसान को भी

प्रशिक्षित किया गया—

सोचना प्रोटोकॉल से बाहर न जाए,

महसूस करना अनप्रोडक्टिव न लगे,

और विवेक –

डेटा की तरह मापा जा सके।

 

अब औज़ार

और आदमी में अंतर बस इतना है—

एक में बोल्ट जड़े हैं, दूसरे में भय।

दोनों को सौंप दिए जाते हैं

पूर्वनिर्धारित लक्ष्य,

और जो लक्ष्य से हटे—

वह “अनुशासनहीन” कहलाता है,

चाहे वह मनुष्य ही क्यों न हो।

 

सब कुछ ठीक चलता रहेगा।

बस,

इंसान और उसकी ज़रूरत

खत्म हो जाएगी।