पहुँच
गया है
सार्थक प्रतिरोध का स्वर
Gen-Z से
Gen-Alpha तक।
डर
का
एकछत्र साम्राज्य
अचानक
बौना हो गया है।
डर
को
पहली बार
डर लगने लगा है।
मैं
चाहता हूँ—
इससे पहले कि
डर फिर से
सर उठाए
और
सार्थक प्रश्नों को
डराए,
प्रतिरोध
का यह स्वर
भ्रूण में पल रहे
Gen-0 तक भी
पहुँचे।
वह
जन्म से पहले ही
अपनी माँगों की
एक सूची तैयार करे—
और
उसमें
एक चेतावनी भी हो
उन लोगों के लिए
जो उसके जन्म से पहले ही
उसकी
जाति और धर्म
तय किए बैठे हैं।
वह उनसे पूछे—
अभी
तो
मैंने आँखें भी नहीं खोलीं,
तुमने
मेरी पहचान
कैसे तय कर ली?
अभी
तो
मैंने बोलना भी नहीं सीखा,
तुमने
मेरी भाषा,
मेरा धर्म,
मेरी जाति
कैसे चुन ली?
और हाँ—
उसकी
पहली माँग
बस इतनी हो—
मुझे जन्म लेने दो।
मुझे
अपनी पहचान
खुद चुनने दो।
क्योंकि
मैं तुम्हारी
पहले से लिखी हुई
पहचान नहीं हूँ—
मैं एक संभावना हूँ।

13 टिप्पणियां:
मैं एक संभावना हूॅं...ये बहुत बढ़िया लिखा है आपने सर।
आपकी यह कविता सामाजिक संकीर्णताओं से मुक्त होकर आने वाली नई पीढ़ी को अपनी पहचान खुद गढ़ने और निडर होकर जीवन जीने का अधिकार देने की वकालत करती है ,आपके विचारों से मैं भी सहमत हूॅं।
सादर प्रणाम सर।
-----
जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार २ अक्टूबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
वाह ! अति उत्तम !
वाह
बहुत बहुत शुक्रिया
शुक्रिया
शुक्रिया
वसुधैव कुटुम्बकम् की संकल्पना को पोषित करता सुन्दर सृजन ॥
शुक्रिया
वाह!
सुन्दर कृति
शुक्रिया
शुक्रिया
ला जवाब
एक टिप्पणी भेजें