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गुरुवार, 29 जनवरी 2026

चुप भी इक गुनाह है (गज़ल)

 

लुटेरों के हाथों में अब है कमान,

डरी सहमी बैठी है हर इक दुकान।

 

जहाँ खोद बुनियाद सब चुप खड़े,

हैं लरज़ते हुए आज खामोश मकान।

 

गए ढूँढने जो यहाँ क़ातिलों को,

मिला उनके हाथों में क़त्ल-ओ-सामान।

 

थी बस्ती कभी ख़्वाब की रौशनी,

बना मोड़ हर आज तो श्मशान।

 

उठी जब भी ज़ुल्मों के ख़िलाफ़ उँगली,

बदलने लगे चेहरे सब हुक्मरान।

 

जहाँ लोग वहशी, वहीं ख़ौफ़ है,

थमी हर ढलान और थमा तूफ़ान।

 

गुनाह है ये 'वर्मा' कि तुम चुप रहो,

जले शहर और सब को है इत्मिनान।


लरज़ते = कांपते 

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

प्यास का प्रमाण-पत्र

 

गंगा

तुम
अपनी निश्छल लहरों के संग
हर पत्थर को छूती
आगे बढ़ती रहीं।

तुमने
कभी नहीं पूछा
किस जात का है यह पत्थर,
किस धर्म का है यह किनारा।

तुम
बस बहती रहीं।

लेकिन
हरिद्वार आते-आते
तुम
मज़हबी कैसे हो गईं, गंगा?


यहाँ
तुम्हारे ही किनारों ने
कब
और क्यों
उठा लीं तख़्तियाँ
यहाँ ग़ैर-हिन्दू का प्रवेश वर्जित है!


गंगा!
यह तुम्हारी भाषा तो नहीं थी।

क्या कभी
तुम्हारे किनारों को
तख़्तियाँ थमाने वालों ने
उन नालों का हिसाब दिया
जो तुम्हारे अस्तित्व को
गंदा करते हैं?

क्या कभी उन्होंने बताया
कि उन नालों में
किस-किस धर्म का
मल-मूत्र
तुम्हें सौंपा जा रहा है?

क्या जल भी
अब पहचान माँगता है?
क्या प्यास
अब प्रमाण-पत्र देखती है?

अगर ऐसा है
तो फिर बहना छोड़ दो, गंगा।

क्योंकि
जो नदी
मनुष्य से छोटी हो जाए,
वह नदी नहीं रहती
सिर्फ़
एक दीवार
बन जाती है।

सोमवार, 19 जनवरी 2026

'ना' को बाहर आने दो

 

थाली-ताली बहुत बजा ली,

अब असली स्वर को आने दो,

जो भाषा सच को निगल गई,

उस भाषा को मर जाने दो।

 

अकेले होने का डर तज दो,

तुम भीड़ में भी तन्हा हो,

अब काँपते होंठों से ही सही,

पर 'ना' को बाहर आने दो।

 

जो मस्तक झुकते आए हैं,

अब उन्हें जरा तन जाने दो,

जो न्याय की बाँसुरी टूट गई,

उसे फिर से स्वर बन जाने दो।

 

बाज़ार सजा है झूठों का,

तुम अपना सच ले अड़ जाओ,

इतिहास लिखे जो कायरता,

उस पन्ने को फट जाने दो।

 

ज़मीर की सूखी धरती पर,

विद्रोह के अंकुर फूटने दो,

जो ज़ंजीरें रूह को जकड़े हैं,

उन कड़ियों को अब टूटने दो।

 

मत पूछो अंजाम क्या होगा,

बस कदम को आगे बढ़ने दो,

जो राख दबी है सीने में,

उसे शोला बनकर जलने दो।

मंगलवार, 23 दिसंबर 2025

अरावली: एक असहज सवाल

 

अब तक सोये बुलडोज़रों को
आख़िर काम मिलेगा,
अरावलीतुझे अब
एक नया नाम मिलेगा।

जिसे पहाड़ कहा जाता था
वह प्लॉट कहलायेगा,
हर चोटी का कद अब
फ़ाइल में नापा जायेगा।

तू अपनी ऊँचाई खुद
कभी क्यों नहीं नापता?
तू सियासतों की फितरत
अब तक क्यों नहीं भापता?

कुर्सी से दिखता जो ऊँचा
वही तुझे महान लगे,
धरती की चीखें तुझे
अब तक क्यों अनजान लगे?

यह विकास नहीं
यह माप बदलने की साज़िश है,
जहाँ बुलडोज़र सच है
और पहाड़ एक बार-बार उठता
असहज सवाल है।


याद रख!
इतिहास ऊँचाई नहीं पूछेगा,
इतिहास नीयत नापेगा।

रविवार, 21 दिसंबर 2025

आकाश पर पहरा

एक राज्य के राजा

महल की छत पर टहल रहे थे,

तभी उनकी नज़र गई

परिंदों की बेखौफ उड़ान पर।

 

उन्हें लगा,

यह तो सीधा हमला है

उनकी राजकीय शान पर।

यह उन्हें नागवार लगा,

अहंकार ने फिर फरमान जारी कर दिया:

नभ की व्यापक सीमाओं पर

अब बस राज-मुहर होगी,

उड़ने की हर एक कोशिश

अब सत्ता के घर होगी।

 

परिंदों ने इस ज़ुल्म के खिलाफ

अपना मोर्चा खोल दिया,

देखते ही देखते महल पर

सीधा धावा बोल दिया।

उठा लीं उन्होंनेनारों की तख्तियाँ,

धूल चाटने लगीं राजा की तमाम सख्तियाँ।

 

राजा घबराया,

मंत्रिपरिषद को तुरंत बुलाया।

लंबे विमर्श के बाद

एक नया पाखंडी फरमान जारी हुआ:

जो अपने पंख राजकोष में जमा करेगा,

उसे सम्मानित किया जाएगा।

वे बंदी नहीं बनाए जाएँगे,

और उन पर से हटा दी जाएगी

उड़ान की पाबंदी।

 

बहुत से पंछियों ने

अपने पंख राज-चरणों में डाल दिया,

राजा ने भी उन्हें

देशभक्तके तमगे का ढाल दिया ।

 

लेकिन कुछ थे,

जिन्होंने इस कड़वे सच को पहचाना:

कि उड़ान पर तो बस पंछियों का हक है।

महलों की उस सुरक्षा से,

बेहतर अपनी खुद्दारी और शक है।

वे इस सौदे को नहीं माने

उनकी ज़िद थी कि वे उड़ेंगे,

बिना किसी अनुमति-पत्र के।

 

तभी, दरबार ने अंतिम फैसला सुना दिया

अपराधी कहलाए वे पक्षी,

जो अपने पंख बचा ले गए।

द्रोही घोषित हुए वे,

जिनके लिए तैनात हुईं बंदूकें,

और आदमकद पाबंदियाँ

चौराहों से आसमान तक बढ़ा दी गईं।

 

इन सब के बावजूद,

हवाओं में आज भी एक आवाज़ गूँजती है

पंख बेचने से बेहतर है

अपनी ऊँची उड़ान पर अड़े रहो।

जिसने अपने पंख नहीं बेचे,

सच मानिए

यह अनंत आकाश बस उसी का है। 

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

जिस्म की फसल

 

उसके बच्चे भूखे थे।
और सत्ता
रोज़ नए नारे बो रही थी।


वह किसान
बीज बोता गया
मिट्टी, पानी, मौसम
सबसे संधि करता गया

पर घोषणा-पत्र तो उगे
फसल नहीं उगे।


उसके बच्चे भूखे थे
उसने अपना हाथ बो दिया
पसीने का टैक्स भरा
मेहनत को मतदान बनाया
पर फसल नहीं उगे।

क्योंकि यहाँ वोट की गिनती होती है
भूख की नहीं!


वह पैर बोता गया
नौकरियाँ! शहर! आवाज़!
पर फसल नहीं उगने थे
नहीं उगे!

क्योंकि रोज़गार की रिपोर्ट में
किसान का नाम नहीं आता!

अब वह अपने जिस्म का हर हिस्सा
लोकतंत्र के नाम पर बो रहा था!
आवाज़ बोई— 

तो देशद्रोह लगा।
माँग बोई— 

तो एंटी-नेशनल हो गया!

उसने धरती में
खुद को गाड़ दिया।
हड्डियाँ बो दीं
लहू बो दिया
अस्तित्व बो दिया।

और उसी वक़्त
फसल लहलहाने लगी
बाज़ार खिल उठा
सत्ताएँ मुस्कुराईं
शेयर-भाव चढ़ गए
राष्ट्रवाद का पोस्टर चमक गया!


लेकिन बच्चों की थाली
आज भी थे खाली

फिर भी
मंचों पर भाषण गूंजे:
किसान हमारी रीढ़ है!

वह ज़िंदा थाइसलिए सवाल पूछता था,
मर गयातो आकड़ा बन गया!

वह भूखा थाइसलिए बोझ था,
मर गयातो सौदा हो गया!


उसकी मौत पर भीड़ का मुनाफ़ा है।
और अगर तुम्हें ग़ुस्सा नहीं आया
तो समझ लो,
तुम भीकिसी की फसल हो!

सच तो यह है कि
समाज की फसल
ज़िंदगी बोकर ही उगती है!