गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

“दो मुर्दों की बातचीत / प्यास”


गंगा किनारे
मणिकर्णिका घाट पर
दो मुर्दे लाए गए,
अन्य व्यवस्था होने तक
चिलचिलाती धूप में
अगल-बगल लिटाए गए।

 

अचानक एक मुर्दे ने
दूसरे से पूछा
तुम भी मर गए हो क्या?”

दूसरा मुस्कुराया और बोला
और क्या मैं यहाँ
आराम करने आया हूँ!


दोनों हल्के-हल्के हँस पड़े।

 

दोनों बातूनी थे।
एक ने कहा
मरने के बाद बड़ा मज़ा आया दोस्त,
जिनके लिए मैं ज़िंदगी भर बोझ था,
आज वही
मुझे अपने कंधों पर उठाकर लाए हैं।

 

कुछ देर बाद
पहला फिर बोला
यार, धूप बहुत तेज़ है,
प्यास लग रही है ...

और अभी हमें

चिता में भी जलना है
सामने गंगा बह रही है,
कहो तो
थोड़ा पानी ले आऊँ?”

 

दूसरा हल्के से हँसा

“तुम क्यो चिता से डरे हो

लगता है पहली बार मरे हो

और,

पानी की प्यास तो
ज़िंदगी में ही नहीं बुझी,
अब मौत के बाद
क्या जल्दी है?”

 

थोड़ा ठहरकर बोला

सच कहूँ दोस्त,
प्यास हमें पानी की नहीं थी
दो घूँट सुकून की,
थोड़ी-सी इज़्ज़त की,
और एक मुट्ठी भर इंसानियत की।

 

गंगा बहती रही,
धूप जलती रही,
और दोनों मुर्दे
पहली बार
ज़िंदगी को समझते रहे।

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