एक मछली थी—
उसे तैरना नहीं आता था।
वह धारा के साथ
बस बह रही थी।
धूप पड़ी,
लहरें चमकीं—
और उसकी लाचारी
प्रतिभा घोषित हो गई।
भीड़ ने कहा—
“देखो, कैसी तैराक है!”
कुछ तथाकथित विद्वानों ने
उसके बहाव को
नया सिद्धांत बताया।
एक समिति बैठी—
और उसे
राष्ट्रीय तैराक घोषित कर दिया।
फिर एक दिन
धारा रुक गई।
मछली भी रुक गई।
तब पता चला—
वह तैर नहीं रही थी,
बस बह रही थी।
दरअसल
इस देश में
बहाव के साथ बहना ही
सबसे बड़ा हुनर है।
और जो सचमुच
तैरना जानते हैं,
और छद्म तैराकी के खिलाफ
आवाज़ उठाते हैं—
वे अक्सर
खतरनाक
और अपराधी
घोषित कर दिए जाते हैं।

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