समकोण
त्रिभुज का
लंब बनूँ मैं,
तुम बन जाना आधार।
प्रेमाकुल
अधरों पर
अधरों का स्पर्श,
क्षण भर में
बन जाए अंगार।
जब
मिलन-बिंदु पर
हम आरोपित होंगे,
भावों के वर्ग
एकाकार होंगे—
तब
प्रेम के योग से
सिद्ध यही होगा,
दोनों के विस्तार में
कर्ण-सा विस्तार होगा।
तुम
और मैं अलग कहाँ,
बस रूप हैं दो आकार—
भुजा-भुजा का प्रेम ही
है जीवन का है सार।
पाइथागोरस सा शाश्वत सच,
हमारी रूह में समाएगा।
जब तुम और मैं एक होंगे,
जीवन 'कर्ण' बन जाएगा।

1 टिप्पणी:
बहुत खूब ......प्रेम का गणित
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