तब,
हमारे गाँव में
अलगौझे की
लड़ाइयाँ
अक्सर पनप जाया
करती थीं।
दोनों भाई
खेत की मेड़ों से
लेकर
आँगन की देहरी तक
डोरी तानकर
अपना-अपना हिस्सा
नापते थे।
नापते-नापते
सम्मान की दूरी भी
घट जाती—
‘आप’ उतरकर
सीधे ‘तू’ हो जाता,
बातों में लाठी उग
आती,
शब्द बारूद की तरह
फटते।
लड़ते-लड़ते
वे एक-दूसरे को
माँ-बहन की
गालियाँ दे बैठते—
जुबान से
रिश्तों की जड़ों
पर
वार करने लगते।
तभी
भीतर से माँ
निकलती,
चौखट पर आकर
खड़ी हो जाती बहन।
माँ कहती—
“तुम दोनों
मेरी कोख के
हिस्से हो।”
बहन कहती—
“दीवारें बाँट लो,
पर माँ का आँगन
मत बाँटना।”
और देखो,
जो अभी-अभी
एक-दूसरे का खून
पी जाने को थे,
वही
चुपचाप
एक ही लोटे से
पानी पी लेते—
जैसे पानी नहीं,
लाज पी रहे हों।
दरअसल
अलगौझे की लड़ाई
ज़मीन की नहीं
होती थी—
वह अहंकार की फसल
थी,
जिसे
माँ की आँखों का
पानी
हर बार काट देता
था।
अलगौझा = बंटवारा

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