बहर-ओ-क़ाफ़िया
की उलझन में रहा मैं इस क़दर,
मेरे हाथों से ही निकलकर इक ग़ज़ल चली
गई।
लफ़्ज़ ही तौले किए मीज़ान-ए-फ़न पर उम्र भर,
वक़्त की ठहरी हुई वो हर इक हलचल चली
गई।
ढूँढते ही रह गए माअनी हम हर इक शेर
में,
जो हक़ीक़त में थी कहनी, बात टल चली
गई।
सोचा था ठहरेगी वो दो पल यहाँ मेरे पास ही,
आँख झपकी और वो मोहक झलक चली
गई।
जो अनकहा था, बस वही ज़िंदा रहा है आज भी,
जो कही थी हमने, वो
बनके सदा चली
गई।
'वर्मा' अपने
फ़न को तो हमने बचा ही लिया मगर,
ज़िंदगी जो हाथ में थी, बस
वो कल चली
गई।
- बहर-ओ-क़ाफ़िया = 'वह, जो अनुसरण करता है' (ग़जल के नियमो का अनुसरण)
- लफ़्ज़ = शब्द
- मीज़ान-ए-फ़न = किसी कला या कौशल में असाधारण कारनामा
- माअनी = मायने

7 टिप्पणियां:
बहूत खूब
धन्यवाद
बेहतरीन गज़ल सर।
बहुत मेहनत करनी पड़ी सर आपकी बढ़िया गज़ल पढ़ने के लिए। सर एक अनुरोध है अगर संभव हो तो मेरे जैसे उर्दू में रूचि रखने वाले पर कम समझने पाठकों के लिए ऐसी सुंदर रचनाओं के नीचे आप शब्दार्थ लिख देंगे तो बहुत सहूलियत हो जायेगी और हमारा शब्द कोश भी समृद्ध होगा।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ९ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
जी धन्यवाद, आपके निर्देशानुसार आवश्यक शब्दार्थ लिख दिया है
बहुत-बहुत आभारी हूॅं सर:)
सादर।
Wah!
धन्यवाद
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