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बुधवार, 29 सितंबर 2010

तुम नदी हो बहो बिना रूके, निरंतर ~ ~


तुम नदी हो बहो
बिना रूके, निरंतर
देखना तारें तुम्हें सजायेंगे,
किनारे खड़े पेड़ और
आसमान का चाँद भी
तुम्हारे विस्तृत अस्तित्व में
डुबकी लगायेंगे
बेशक दिल में हो -
सागर मिलन की तमन्ना
पर रहना चौकन्ना
मिलन की उत्कंठा कहीं
तुम्हारी गति को
बहुत तेज न कर दे
वर्ना,
लोग बाँध बना देंगे और
अवरूद्ध कर देंगे-
तुम्हारे प्रवाह को.



तुम नदी हो बहो
बिना रूके, निरंतर
पर निर्बाध गति पर
‘थकन’ अंकुश न लगा दे
तुम्हारे दिल में भी
विश्राम की इच्छा न जगा दे
और तुम,
कहीं भूल कर भी
गतिशून्य न हो जाओ
वर्ना
नकार देंगे लोग
तुम्हारे अस्तित्व को ही
और फिर
शहर के मलबे के ढेर से
ढक दिये जाओगे
प्रतीक्षारत हैं
बहुमंजिली इमारतें
तुम्हारे अस्तित्व पर कब्जा करने हेतु .



तुम नदी हो बहो
बिना रूके, निरंतर

रविवार, 30 मई 2010

एक दस्तक तुम्हारे दरवाजे के नाम ~~

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भेजा था मैनें,
उस दिन एक दस्तक
तुम्हारे दरवाजे के नाम
और तुम्हारा दरवाजा
अनसुना कर गया था;
तभी तो
खुलने से मना कर गया था.
मुझे पता है
यह हौसला
दरवाजे का नहीं हो सकता
वह उन दिनों
तुम्हारे 'फैसले' की सोहबत में था.
शायद उसने यह बात
तुमसे भी नहीं बतायी होगी
हताश-परेशान मेरे दस्तक ने
बिना मेरी अनुमति के
मेरी आँसुओं के चन्द कतरे
तुम्हारी ड्योढी पर रखा था.
चश्मदीदों ने बताया
तुम उसे सहेजने की फ़िराक में हो
आज फिर एक दस्तक
तुम्हें चौकन्ना करने के लिये
कि आँसू के उन कतरों को
सहेजना मत,
वे सैलाब बन जायेंगे.
पड़े रहने देना तुम
वहीं ड्योढी पर
सूरज की तपिश
उन्हें भाप बना देगी,
या  फिर शायद
तुम्हारे दरवाजे की
ड्योढियों पर उगे पौधों की जड़ें
अवशोषित कर ले.
मेरे आँसुओं का मकसद
तुम्हें ठंडक पहुँचाना ही तो है.

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

बिना तेल का तिल मिला ~~

बेवजह तो नहीं

वह रहा है -

तिलमिला,

उसके हिस्से

बिना तेल का

तिल मिला.

****

वह रूठी थी

मैनें तो उसे

मना ली,

पर इसके लिये

मुझको तो

ले जाना पड़ा उसे

मनाली.

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

आज पहना दिया उसके गले में किसी और ने हार

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आज पहना दिया

उसके गले में

किसी और ने

हार

वह गुमसुम सा

खड़ा है

जिन्दगी को

हार

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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हर्षित हैं शाख पर पत्ते

झूम रही है

डाली

एक अर्से के बाद

तूने फिर से झूला

डाली

गुरुवार, 18 मार्च 2010

ना --- री

जब भी उसने

हक की बात की

जमाने ने कहा

ना री !

अंततोगत्वा

नाम पड़ गया उसका

नारी

****

निगाहों में

क्यों न उभरे निशान

सवालिया

देखते नहीं देकर ‘एक’

उन्होंने तो

सवा लिया

****

सुनते थे कि

प्यार से लबरेज होकर

मुस्कराती हैं

हसीना

लाख जतन किया पर

वो तो

हंसी ना

गुरुवार, 4 मार्च 2010

चूनर जब सरकी

लाज से

पलकें झुकी

चूनर सर की

जब सरकी

***

एक अरसे से वह

आई ना

अब तो मैनें छोड़ दिया है

देखना भी

आईना

***

उसने

उसकी बात पर

तवज्जो न दी

देखिये

निगाहों से

बहने लगी नदी

~~~

बुधवार, 3 मार्च 2010

जबसे आँख लगी है ~~

हर घर के सामने

एक कार खड़ी है

यूँ तो जिन्दगी खुद

उधार पड़ी है

~~~~~~~

लोग 'आँख लगने' को

कहते हैं सो जाना

पर

जबसे आँख लगी है

तड़पता हूँ मैं सोने को.

शनिवार, 17 अक्टूबर 2009

दीया और लौ : तीन शब्द चित्र


मिट्टी सने हाथों ने
मिट्टी से बनाया
कुछ इस तरह मैने
अपना आकार पाया

* ~ * ~ * ~ * ~

अमावस की काली रात
थरतराती दीये की लौ
अपलक
निहारती तुम
देखो फटने लगी है पौ
* ~ * ~ * ~ * ~

शरारती हवाओं ने
लौ को नचा दिया
हथेलियों की ओट ने
मरने से बचा दिया
~ * ~