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शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

एक चिड़िया मरी पड़ी थी










बलखाती थी
वह हर सुबह 
धूप से बतियाती थी
फिर कुमुदिनी-सी 
खिल जाती थी
गुनगुनाती थी 
वह षोडसी
अपनी उम्र से बेखबर थी
वह तो अनुनादित स्वर थी 
सहेलियों संग प्रगाढ़ मेल था 
लुका-छिपी उसका प्रिय खेल था
खेल-खेल में एक दिन
छुपी थी इसी खंडहर में
वह घंटों तक 
वापस नहीं आई थी
हर ओर उदासी छाई थी
मसली हुई 
अधखिली वह कली
घंटों बाद 
शान से खड़े 
एक बुर्ज के पास मिली
अपनी उघड़ी हुई देह से भी
वह तो बेखबर थी
अब कहाँ वह भला
अनुनादित स्वर थी 
रंग बिखेरने को आतुर
अब वह मेहन्दी नहीं थी 
अब वह कल-कल करती
पहाड़ी नदी नहीं थी
टूटी हुई चूड़ियाँ 
सारी दास्तान कह रही थीं
ढहते हुए उस खंडहर-सा 
वह खुद ढह रही थी
चश्मदीदों ने बताया
जहाँ वह खड़ी थी 
कुछ ही दूरी पर 
एक चिड़िया मरी पड़ी थी

रविवार, 30 मई 2010

एक दस्तक तुम्हारे दरवाजे के नाम ~~

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भेजा था मैनें,
उस दिन एक दस्तक
तुम्हारे दरवाजे के नाम
और तुम्हारा दरवाजा
अनसुना कर गया था;
तभी तो
खुलने से मना कर गया था.
मुझे पता है
यह हौसला
दरवाजे का नहीं हो सकता
वह उन दिनों
तुम्हारे 'फैसले' की सोहबत में था.
शायद उसने यह बात
तुमसे भी नहीं बतायी होगी
हताश-परेशान मेरे दस्तक ने
बिना मेरी अनुमति के
मेरी आँसुओं के चन्द कतरे
तुम्हारी ड्योढी पर रखा था.
चश्मदीदों ने बताया
तुम उसे सहेजने की फ़िराक में हो
आज फिर एक दस्तक
तुम्हें चौकन्ना करने के लिये
कि आँसू के उन कतरों को
सहेजना मत,
वे सैलाब बन जायेंगे.
पड़े रहने देना तुम
वहीं ड्योढी पर
सूरज की तपिश
उन्हें भाप बना देगी,
या  फिर शायद
तुम्हारे दरवाजे की
ड्योढियों पर उगे पौधों की जड़ें
अवशोषित कर ले.
मेरे आँसुओं का मकसद
तुम्हें ठंडक पहुँचाना ही तो है.