गुरुवार, 2 जुलाई 2026

आँकड़ों की रोटी

 

रोटियों से खेलने वाले
रोटियों के लिए तरसते
भूखे लोगों को
रोटियाँ बाँटते हैं।

फ़र्क़ बस इतना है कि
ये रोटियाँ
आटे से नहीं,
आँकड़ों से गढ़ी जाती हैं।

इनका जन्म
खेतों और चूल्हों में नहीं,
सात सितारा होटलों के
ठंडे, चमकदार कमरों में होता है,

जहाँ भूख पर
लंबी-लंबी चर्चाएँ होती हैं,
मगर
भूख
कभी उस मेज़ तक नहीं पहुँचती।

इन रोटियों पर
धार्मिक वैमनस्य की
मीठी परत चढ़ा दी जाती है,

और कृत्रिम आँकड़ों से
ढक दिया जाता है
भूख के सूचकांक का गिरता हुआ सच।

फिर
भूखे और नंगे लोग
अनजाने ही
एक ऐसे चक्रव्यूह में उतर जाते हैं

जहाँ
रोटियों की जगह
नारे परोसे जाते हैं,

और वे
अपने खाली पेट की आवाज़ दबाकर
उसी व्यवस्था की
जय-जयकार करने लगते हैं

जो उनकी थाली में
रोटी कभी नहीं आती
सिर्फ़ रोटी के आँकड़े आते हैं।

11 टिप्‍पणियां:

Anita ने कहा…

असंवेदनशील शासन के जाल में फँसी जनता की पीड़ा को आपकी लेखनी शब्द दे रही है

M VERMA ने कहा…

पीड़ा को शब्दों की जरूरत नहीं

Sweta sinha ने कहा…

आपकी संवेदनशील मनोभाव पढ़कर मुझे मेरी लिखी रचना की कुछ पंक्तियां याद आ गयी।
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दिखावे का ज़माना है साहिब
"किसी की भूख परोसना
भूख मिटाने से ज्यादा
आसान है शायद...!!
सादर
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३ जुलाई २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

M VERMA ने कहा…

संवेदना का संवेदना से अद्भुत मिलाप
शुक्रिया

Razia Kazmi ने कहा…

बहुत बहुत अच्छी रचना लिखी है

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह

सुशील कुमार जोशी ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

Aman Peace ने कहा…

Wah!

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊