इंसान औ' इंसानियत की कमी है, बाकी सब ठीक है,
हैवानियत की गिरफ़्त
में ज़मीं है, बाकी सब ठीक है।
अट्टहास और विद्रूप
हँसी से गूँज रहा है पूरा शहर,
मुस्कानों के पीछे चेहरा मातमी है, बाकी
सब ठीक है।
सच बोलना, इंसाफ माँगना अब जुर्म ठहरा है यहाँ,
ज़िंदगी बिखर जाना
लाज़िमी है, बाकी सब ठीक है।
ख़ौफ़ के साये में
पल रही हर नई पीढ़ी की ख़ामोशी,
हर ज़ेहन में एक
अनकही कमी है, बाकी सब ठीक है।
भूख की आँखों में
सपनों का आख़िरी दीपक बुझ गया,
आँकड़ों में तिलस्मी ख़ुशहाली थमी है, बाकी
सब ठीक है।
लब सिल गए हैं डर के मारे शहर के हर
गवाह के,
क़ातिल के हक़ में हर गवाही थमी है, बाकी
सब ठीक है।
बच्चों के बस्ते में किताबों की जगह नफ़रतें रख दीं,
रूह-ए-तालीमआज सहमी-सहमी है, बाकी
सब ठीक है।
'वर्मा' सच लिखने की आदत छोड़ भी दे तो कैसे छोड़े,
स्याही में आज भी ज़िंदा आदमी
है, बाकी सब ठीक है।

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