रोटियों
से खेलने वाले
रोटियों के लिए तरसते
भूखे लोगों को
रोटियाँ बाँटते हैं।
फ़र्क़ बस इतना है कि
ये रोटियाँ
आटे से नहीं,
आँकड़ों से गढ़ी जाती हैं।
इनका जन्म
खेतों और चूल्हों में नहीं,
सात सितारा होटलों के
ठंडे, चमकदार कमरों में होता है,
जहाँ भूख पर
लंबी-लंबी चर्चाएँ होती हैं,
मगर
भूख
कभी उस मेज़ तक नहीं पहुँचती।
इन रोटियों पर
धार्मिक वैमनस्य की
मीठी परत चढ़ा दी जाती है,
और कृत्रिम आँकड़ों से
ढक दिया जाता है
भूख के सूचकांक का गिरता हुआ सच।
फिर
भूखे और नंगे लोग
अनजाने ही
एक ऐसे चक्रव्यूह में उतर जाते हैं
जहाँ
रोटियों की जगह
नारे परोसे जाते हैं,
और वे
अपने खाली पेट की आवाज़ दबाकर
उसी व्यवस्था की
जय-जयकार करने लगते हैं
जो उनकी थाली में
रोटी कभी नहीं आती—
सिर्फ़ रोटी के आँकड़े आते हैं।

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