औज़ारों और मशीनों के पास
नहीं होते—
अपने दिमाग़,
दिल और विवेक।
वे अनभिज्ञ रहते हैं परिणाम से,
चलते हैं संकेतों पर— नेपथ्य से।
नेपथ्य में मीटिंग्स होती हैं,
नीतियाँ गढ़ी जाती हैं,
और जीवित संघर्षों को
स्लाइडों में बदल दिया जाता है।
धीरे-धीरे इंसान को भी
प्रशिक्षित किया गया—
सोचना प्रोटोकॉल से बाहर न जाए,
महसूस करना अनप्रोडक्टिव न लगे,
और विवेक –
डेटा की तरह मापा जा सके।
अब औज़ार
और आदमी में अंतर बस इतना है—
एक में बोल्ट जड़े हैं, दूसरे में भय।
दोनों को सौंप दिए जाते हैं
पूर्वनिर्धारित लक्ष्य,
और जो लक्ष्य से हटे—
वह “अनुशासनहीन” कहलाता है,
चाहे वह मनुष्य ही क्यों न हो।
सब कुछ ठीक चलता रहेगा।
बस,
इंसान और उसकी ज़रूरत
खत्म हो जाएगी।

3 टिप्पणियां:
मशीनीकरण के दौर की आवश्यक कविता
वाह
धन्यवाद
Wah!
एक टिप्पणी भेजें