रविवार, 28 जून 2009

नफरती जुनून लेकर निकलते हैं बच्चे ---- !!




हवा के रूख का हवाला मत दो

मुझे अपने मन से निकाला मत दो

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जिस उजास में गुम होने लगे वजूद

ऐसी रोशनी औ ऐसा उजाला मत दो

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जिसे पढ़कर माहौल उदास हो जाए

मेरे हाथ में ऐसा कोई रिसाला मत दो

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नफरती जुनून लेकर निकलते हैं बच्चे

ऐसी तालीम, ऐसी पाठशाला मत दो

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तुम्हारी मुस्कान का तिलिस्म, उफ़ --

फूल से दिखते खार की माला मत दो

सोमवार, 22 जून 2009

बुरी नज़र वाले का मुँह ----




शुभचिंतकों के गले में माला


बुरी नज़र वाले का मुँह काला


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वारदात से दूर बहुत था मैं


फिर क्यूँ मेरा नाम उछाला


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ज़ज्बात हमारे बिखर गए थे


टुकड़े- टुकड़े इसे संभाला


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सिसक रहे अरमान हमारे


तुमने ऐसी नज़र क्यों डाला


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विश्वासों को कैसे संबल दूँ


कैसे दिखलाऊ अपना छाला


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बिके हुओं ने बेचा मुझको


ज़ालिम तूने क्या कर डाला


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चौराहों से क्यूँ हो शिकायत


चौराहों ने मुझको पाला

शुक्रवार, 19 जून 2009

'हया' का मतलब -- ! ! !




सूरज को भी छाँव में आते हुए देखा है


गली को सड़क से बतियाते हुए देखा है




'हया' का मतलब समझ गया हूँ मैं भी


पलक झुककर उन्हें शरमाते हुए देखा है




एक पल में अनगिनत छवि उभर गयी


आइने से आईने को बतियाते हुए देखा है




गठबंधन के बंधन मज़बूत हो गए हैं


गीदडों को शहर में आते हुए देखा है




तपिश बढ़ गयी, आबोहवा बदली सी है


मासूम फूलों को मुरझाते हुए देखा है




अदब का तमगा दिया गया उसको ही


कल तक जिसे ज़ुल्म ढाते हुए देखा है




सपनों की आहटें भी चौकन्ना करती हैं


लोगों को ख्वाब भी चुराते हुए देखा है

बुधवार, 17 जून 2009

ख़ुद की फिरौती ----- ! !


ज़िन्दगी जीने का जिसमे जूनून नहीं होगा

जिस्म खंगाल के देखिये उसमे खून नहीं होगा





खौफ खाकर जिससे पसर गया है सन्नाटा


हाड़-मांस का होगा कोई अफलातून नहीं होगा





ये शहर तो लेकर फिरता है ख़ुद की फिरौती


इस शहर का अपना कोई कानून नहीं होगा


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जिसने फितरतों से भर ली हैं तिजोरियां


उस सख्श को तय है कि सुकून नहीं होगा





उसके ख्वाबों की पड़ताल करके देखिये


नून-रोटी ही होगी कोई 'मून' नहीं होगा


रविवार, 14 जून 2009

हटो ! थोड़ी हवा आने दो **



हटो ! थोड़ी हवा आने दो

हमें भी तो रिश्ता निभाने दो



तुम सजा लो अपने महल

हमें अपनी झोपड़ी सजाने दो



दुम हिला रहे हो, हिलाते रहो

हमें बस यहाँ से जाने दो



ज़िन्दगी हम तो यूं ही जियेंगे

बात-बात पर तो न ताने दो



तुम्हे मुबारक तुम्हारी रसमलाई

हमें सूखी रोटी ही खाने दो


शुक्रवार, 12 जून 2009

तकलीफ में चिल्लाइये !!!!

दर्द को मत दबाइए मेरे भाई


तकलीफ में चिल्लाइये मेरे भाई




भूखे पेट कैसे लड़ोगे लड़ाई?


भरपेट दबाकर खाइए मेरे भाई




बहुत तनहा हो गया हूँ मैं तो


अब तो लौट आइये मेरे भाई




खामोशी है नगम-ऐ-आरजू में


टालिए मत अब गाइए मेरे भाई




डराने वाले दुम दबाकर भागेंगे


एक पत्थर तो उठाइए मेरे भाई



बुधवार, 10 जून 2009

इतना सन्नाटा क्यों है भाई?




हर सुंदर फूल के नीचे कांटा क्यों है भाई?


भीड़ बहुत है पर इतना सन्नाटा क्यों है भाई?




मशक्कत की रोटी पर गिद्ध निगाहें क्यों है?


हर गरीब का ही गीला आटा क्यों है भाई?




चीज़ों की कीमत आसमान चढ़ घूर रही है


मंदी-मंदी चिल्लाते हो, घाटा क्यों है भाई?




सीधी राह पकड़कर जाते मंजिल मिल जाती


इतना मुश्किल राह मगर छांटा क्यों है भाई?




कातर निगाह से देख रहा है बच्चा देखो तो


बेवज़ह आपने मासूम को डांटा क्यों है भाई?



मंगलवार, 9 जून 2009

कैसे यकीन कर ले कि उन्हीं का बेटा मरा है --



जिस्म तक नहीं भींगा, समुंदर खंगाल आए थे

सैकड़ो टुकड़ों में हैं जो ख़ुद को संभाल आए थे



बदन में उसके लहू का एक कतरा न मिला

देखिए किस कदर अपना लहू उबाल आए थे



गली के नुक्कड़ पर बैठा ख़ुद से बतियाता है

जिसको कुछ लोग दरिया में डाल आए थे



चित भी उन्हीं की है और पट भी उन्हीं की है
मुट्ठियाँ भर-भर कर सिक्का उछाल आए थे



कैसे यकीन कर ले कि उन्हीं का बेटा मरा है

उसके नाम का तो सदका वे निकल आए थे

सोमवार, 8 जून 2009

नज़र से ही नज़र को पैगाम --!!











तुम आगाज़ लिखो, मैं अंजाम लिखूंगा
तुम्हारी देहरी पे आज सलाम लिखूंगा
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परिंदे की तरह उड़ने की ख्वाहिश है
ख़त मैं आज बादलों के नाम लिखूंगा
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पेशानी पर हाथ रखकर बैठो तो ज़रा
कलम बेचैन है, आज इक तूफ़ान लिखूंगा
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हसरतों की मौत देखी है मैंने अब तक
हसरतें, अब ज़िंदगी तेरे नाम लिखूंगा
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महज़ नज़र-ऐ-इनायत की आरजू है
नज़र से ही नज़र को पैगाम लिखूंगा
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ख़त में तुम्हे अपना नाम न मिलेगा
तुम्हे गुल, तो कभी गुलफाम लिखूंगा


शनिवार, 6 जून 2009

तेल की देखो धार --

मैं बावरा बाज़ार गया, खरीदन चाहूँ संसार।
ख़ुद ही देखो बिक गया, चुका ना पाया उधार।।
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राह नहीं आसान मगर, राह से करता प्यार।
लहरों से डरने वाले भला, कब उतरे हैं पार॥
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प्यार बाटता फिरता जाता, मोल में पाता प्यार।
घाटे का सौदा नहीं, प्यार का भूखा यह संसार॥
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निश्चिंत रहो, खामोशी से तेल की देखो धार।
पूरा होगा काम सभी, हवा पे मत हो सवार॥
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सीधी बात कहूँ मैं भाई, यह जीवन का सार।
हँस- बोल के रहो यहाँ, मत खाओ तुम खार॥