बुधवार, 10 जून 2026

तीसरा रास्ता

 

वह नज़र झुकाकर चलती थी,
और शोहदे उसके पीछे-पीछे चलते थे।
उसके लिये
रास्ता अक्सर अपमान में बदल जाता था।

उसने हिम्मत की,
एक दूसरी राह चुनी
पर वहाँ भी
चेहरों की वही भीड़ थी,
वही भूखी निगाहें,
वही सदियों पुराना खेल।

तीसरा कोई रास्ता नहीं था,
सो वह लौट आई
उसी राह पर।

मगर इस बार
सिर्फ एक फर्क था
उसकी नज़र झुकी हुई नहीं थी।

चमत्कार यह नहीं था
कि राह में कोई मिला नहीं;
चमत्कार यह था कि
इस बार
किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी
कि उसका रास्ता रोक सके।

वह चलती रही
अपने पूरे अस्तित्व के साथ,
और पहुँच गई
वहाँ,
जहाँ पहुँचने से उसे
इतने वर्षों तक डराया गया था।

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