शनिवार, 31 अक्टूबर 2009

दिल में दुकान ~~~


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जेबों में अपने हर सामान रखते हैं
दिल में ये लोग तो दुकान रखते हैं


शातिर मंसूबों का ज़ायजा क्या लेंगे
दुश्मनों के लिए ये गुणगान रखते हैं


बिखर कर भी जुड़ जाते है पल में
जिस्म में अपने सख्तजान रखते है.

मुआवजें जब शिनाख़्त पर होते हैं
थोड़ा सा जिस्म लहुलुहान रखते हैं

बिखर जायेंगे तुम्हारे हल्फिया बयान
वे बहुत ऊँची जान-पहचान रखते हैं
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बुधवार, 28 अक्टूबर 2009

और वह जीत गया ~~




मारो-मारो
भागने न पाये
इधर गया है
उठा लो साले को !

और वह वह उनसे बचता
भागता रहा निरंतर;
सारी-सारी रात
वह उनकी आहटें सुनता
और जागता रहा निरन्तर;
ज़रा सी आवाज़ पर
वह चौंकन्ना हो जाता था,
हर फुसफुसाहट
उसे मजबूर कर देती
फिर भागने को

कब तक भागता !
कहीं तो रूकना ही था
प्रतिकार का तमंचा लेकर
आखिर रूका वह
अपने कमरे में बेखौफ
और इस बार शायद
न भागने के लिये रूका था

तीसरी मंज़िल के अपने कमरे में
वह खूब लड़ा
इन पीछा करने वालों से;
इनकी आवाज़ों से;
और वह जीत गया.
उसने हरा दिया उन सबको
खिड़की के रास्ते
उन डरावनी आवाज़ों को
बाहर ढकेल दिया.

और अब कितना सुकून है
खून के तालाब में डूबे
कम्पाउण्ड में पड़े
उसकी लाश के चेहरे पर।
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सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

१०००वी टिप्पणी तक का सफर ~~

कुल ४२ पोस्ट और १००० टिप्पणियाँ, ६५ समर्थक, सफर अवधि ५ महीने और १४ दिन
हमसफ़र, हमखायालों और शुभचिंतको को मेरा साधुवाद
1०००वे टिप्पणीकर्ता आर्जव ब्लॉग वाले श्री अभिषेक कुशवाहा जो मेरे गृहनगर वाराणसी के हैं, जिन्होंने मेरे ब्लॉग जज़्बात के पोस्ट मुझे गोली मार दो पर १०००वी टिप्पणी दी। बहुत बहुत धन्यवाद अभिषेक

शनिवार, 24 अक्टूबर 2009

मुझे गोली मार दो ~~


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तुम मुझे गोली मार दो
क्योकि मै जिन्दा ही कहाँ हूँ
और फिर
मरा हुआ फिर से तो नही मर सकता

मैं तो तभी मर गया था
जब तुमने मेरे हक की रोटी पर
पहली बार कब्जा किया था
और --
और मैनें प्रतिकार की जगह
परोस दी थी --
तुम्हारे सामने अपनी अस्मिता भी;
जब अपने वजूद की नींव पर
मैं तुम्हारी अट्टालिकाएँ बना रहा था
और खटकने लगी थी तुम्हें
मेरी झोपड़ी इसके बगल में;
मैं तब भी मरा था
जब तुमने
सूरज की रोशनी की आपूर्ति
मुझ जैसों के लिये
प्रतिबन्धित कर दी थी
और तुम्हारा कहा मानकर
सूरज तुम्हारे लिये ही रोशनी बिखेरने लगा था;

तुम समेटते रहे
मेरे अस्तित्व की तमाम संभावनाओं को
और मुझे मोम से ढक दिया था
अपलक देखते रहने को;

इससे पहले कि
हवाएँ भी तुम्हारे झाँसे में आकर
आक्सीजन की आपूर्ति बन्द कर दें

तुम मुझे गोली मार दो !
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बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

रिश्ते जब रिसने लगेंगे ~~


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तुम अपने आँसुओं को
बेवजह ज़ाया मत करना

ये आँसू तब काम आयेंगे
जब तुम्हारे करीने से सजाये
रिश्ते रिसने लगेंगे;
विश्वास जब घिसने लगेंगे;
तुम्हारे एहसासों को
जब ठाँव नहीं मिलेगा;
तुम्हें तुम्हारा अपना जब

सलोना गाँव नहीं मिलेगा;
जब बाबूजी का 'चमरौधा'
पड़ा होगा औंधा;
सावन में जब खेतों में धूल उड़ेंगे
और सूखेगा पौधा;
जब तुम्हारा ही बेटा
तुम्हें सलीका सिखायेगा;
टी वी पर किसी के
एनकाउण्टर की मसालेदार खबर
दिन भर छायी रहेगी,
और् सुबह का गया
तुम्हारा कोई अज़ीज
शाम तक घर नहीं आयेगा.

तब ये तुम्हारे आँसू
तुम्हारे बहुत काम आयेंगे
इन्हें बेवजह जाया मत करना ---

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रविवार, 18 अक्टूबर 2009

कठुवाए हुए एहसास ~~

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चलो कठुवाए हुए एहसासों को भिगोते है
अंतस के जमीन पर एक दरख़्त बोते है

ज़रा उनसे पूछिए जिन्दगी का फलसफा
कान्धे पर जो खुद ही का ज़िस्म ढोते है

खरीदने-बेचने से परे है ये लोग फिर भी
देखिए किस तरह ये घोड़े बेचकर सोते हैं

सात पुश्तों की ख़बर लेने निकले हैं आप
इन्हें ये भी पता नहीं, ये किनके पोते हैं

दर्द का एहसास तो रोटियों में खो गया है
हँसी के मुखौटो के पीछे छुपकर ये रोते है
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शनिवार, 17 अक्टूबर 2009

दीया और लौ : तीन शब्द चित्र


मिट्टी सने हाथों ने
मिट्टी से बनाया
कुछ इस तरह मैने
अपना आकार पाया

* ~ * ~ * ~ * ~

अमावस की काली रात
थरतराती दीये की लौ
अपलक
निहारती तुम
देखो फटने लगी है पौ
* ~ * ~ * ~ * ~

शरारती हवाओं ने
लौ को नचा दिया
हथेलियों की ओट ने
मरने से बचा दिया
~ * ~

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2009

सलवटों की चाहत में ~~


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अक्सर मैं
जिन्दगी के आपाधापी के बीच
बिस्तर पर करवट बदलना भी
भूल जाता हूँ
मेरे बदले
हर सुबह बिस्तर खुद
सलवटों की चाहत में
करवट बदल लेता है.

किताबें बाट जोहती हैं
मेरा
कि शायद मैं उसके पन्ने पलटूंगा
थक हार कर अकस्मात
वे खुद ही
अपने पन्ने पलट लेते हैं


बहुत दिनों तक जब
कोई कुंडी खड़काने नहीं आता
किवाड़ बन्द रहने से उकताकर
हवाओं के हाथों से
खुद ही
कुंडियाँ खड़का देती हैं

अक्सर मैं
रोटियों के पीछे भागते-भागते
रोटियाँ खाना भी
भूल जाता हूँ
और इंतजार करता हूँ कि
शायद रोटियाँ तुम्हारे हाथों के सहारे
मेरे मुँह तक ----
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रविवार, 11 अक्टूबर 2009

वह मगर भीगा नहीं ~~

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बारिश हुई
कभी मूसलाधार तो
कभी रूक-रूक कर
सब कुछ भींग गया
वजूद का ओर-छोर भी;
नयन के कोर भी
टूट गये तटबन्धी विश्वास;
बह चला एहसास
कुछ खोया; कुछ पाया
एक जलजला सा आया
अपने आगोश में ले लिया
सख्त से सख्त को
समूल डुबो दिया
समस्त को; दरख्त को


जिसको भिगोने/डुबोने के लिये
यह सारी कवायद हुई थी

वह मगर भीगा नहीं
क्योंकि वह कुछ ऊँचाई पर था.
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