Saturday, October 31, 2009

दिल में दुकान ~~~


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जेबों में अपने हर सामान रखते हैं
दिल में ये लोग तो दुकान रखते हैं


शातिर मंसूबों का ज़ायजा क्या लेंगे
दुश्मनों के लिए ये गुणगान रखते हैं


बिखर कर भी जुड़ जाते है पल में
जिस्म में अपने सख्तजान रखते है.

मुआवजें जब शिनाख़्त पर होते हैं
थोड़ा सा जिस्म लहुलुहान रखते हैं

बिखर जायेंगे तुम्हारे हल्फिया बयान
वे बहुत ऊँची जान-पहचान रखते हैं
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26 comments:

महफूज़ अली said...

बिखर जायेंगे तुम्हारे हल्फिया बयान
वे बहुत ऊँची जान-पहचान रखते हैं...

bahut gahri baat kah di hai aapne........

Prem Farrukhabadi said...

मुआवजें जब शिनाख़्त पर होते हैं
थोड़ा सा जिस्म लहुलुहान रखते हैं

sher bahut hi kamal ka hai. quotable hai. badhai!

महफूज़ अली said...

Gajraula Times mein prakaashit hone ke liye aapko bahut bahut badhai.........

M VERMA said...

प्रेम जी धन्यवाद
धन्यवाद महफूज भाई

sumit said...

nice
aisa kaya ho gaya

सुरेश शर्मा (कार्टूनिस्ट) said...

अत्यंत भावपूर्ण, अर्थपूर्ण रचना है, गजरौला टाईम्स में प्रकाशन हेतू बहुत-बहुत बधाई !

ओम आर्य said...

बाज़ार है भीड भी बहुत है
क्या लोगो को पता नही यहाँ

सबकुछ बिकता है !बधाई!!!!!!!

परमजीत बाली said...

बहुत ही उम्दा रचना है।बधाई।

दिगम्बर नासवा said...

बिखर जायेंगे तुम्हारे हल्फिया बयान
वे बहुत ऊँची जान-पहचान रखते हैं

AAPKE SHER JEEVAN KE SASCH KO HOOBHO BAYAAN KARTE HAIN .... BAHOOT HI LAJAWAAB....KAMAAL KI GAZAL HAI POORO GAZAL SAMAAJ KA AAINA HAI ....

विनोद कुमार पांडेय said...

आदमी की फ़ितरत कुछ ऐसी ही है..शानदार ग़ज़ल...हर पंक्ति लाज़वाब..बढ़िया लगा..धन्यवाद!!

विनय ‘नज़र’ said...

Ek behtareen ghazal.

AlbelaKhatri.com said...

bahut khoob bhai saheb

badhaai !

Dipak 'Mashal' said...

Kis sher ki tareef kar doon Verma sir sabhi to ek se badh ke ek hain aur sabhi gahre tak dil me utar rahe hain... baki kuchh tareef karoonga to chhote muh badi baat hogi, abhi meri itni aukat nahin ki aapki gazal ki sameeksha kar sakoon.
Jai Hind...

वाणी गीत said...

बिखर जायेंगे तुम्हारे हल्फिया बयान ...वे ऊँची जान पहचान रखते हैं ..
बहुत खुबसूरत व्यंग्य से लबरेज शेर ...उम्दा गजल ...
बधाई व शुभकामनायें ..!!

योगेन्द्र मौदगिल said...

कथ्य बेहतरीन है.... साधुवाद.....

rajiv said...
This comment has been removed by the author.
rajiv said...

वाह क्या बात है. आपकी भावनाओं को महसूस कर सकता हूं. बस यही कहना है कि दुकानदारों की बस्ती में अब भी कुछ इंसान बसते हैं.

Babli said...

वाह वर्मा जी बहुत ही उम्दा रचना लिखा है आपने! बधाई !

कुलवंत हैप्पी said...

बिखर जायेंगे तुम्हारे हल्फिया बयान
वे बहुत ऊँची जान-पहचान रखते हैं....

दुनियावीं सच लिख दिया।

वन्दना said...

bahut khoob likha hai aur aaj ka sach likha hai.......badhayi

डॉ टी एस दराल said...

बिखर जायेंगे तुम्हारे हल्फिया बयान
वे बहुत ऊँची जान-पहचान रखते हैं

बेहतरीन पंक्तियाँ.

Apoorv said...

जेबों में अपने हर सामान रखते हैं
दिल में ये लोग तो दुकान रखते हैं

आज की कमर्शियल होती जा रही दुनिया का यही सच है..और फिर भी दिल माँगे मोर !!
मुआवजें जब शिनाख़्त पर होते हैं
थोड़ा सा जिस्म लहुलुहान रखते हैं


बहुत सटीक और सामयिक बात !!!

पी.सी.गोदियाल said...

मुआवजे जब शिनाख्त पर होते है
थोडा सा जिस्म लहुलुहान रखते है !

बहुत सुन्दर बात कही आपने वर्मा साहब !

Shobhna Choudhary said...

aapne bahut hi accha likha hai...mai shabdo ka chayan nahi kar pa rahi hu tarif ke liye...

रवि कुमार, रावतभाटा said...

जेबों में अपने हर सामान रखते हैं
दिल में ये लोग तो दुकान रखते हैं

एक बेहतरीन ग़ज़ल...

Sunita Sharma said...

आज आपका ब्लाग देखा ब्लागिग की दूनिया में मै नयी हू लेकिन मै यह कहना चाहती हूं हमें ब्लाग के माध्यम से ही सही सार्थक प्रयास करने चाहिए जिससे उन बातों पर कुछ लगाम कसी सके जो दिन पर दिन भयावह होती जा रही है यदि कुछ कर सके किसी के लिए तो यह जीवन व्यर्थ न जायेगा .....