मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

अधूरी पूर्णता

किसी ने पूछा था क्या है कविता?”
मैंने कहा

कविता अविरल प्रवाह है,
स्वयं से मिलने की अथक चाह है।
यह कोई प्रयोग नहीं,
यह तो अथाह है
जिसे मापा नहीं जा सकता,
सिर्फ महसूस किया जा सकता है।

कविता शब्दों में कैद नहीं होती
वह शब्दों से टकराती है,
उन्हें तोड़ती है,
और खामोशी को भी आवाज़ दे जाती है।

जहाँ भाषा हार मान लेती है,
वहीं से कविता अपनी ज़िद शुरू करती है।

कविता कोई निष्कर्ष नहीं
वह तो एक दरवाज़ा है,
जो हर बार खुलता है
किसी नए अर्थ की ओर।

कविता सिर्फ शुरुआत है
और वही कविता सबसे पूरी है
जो अधूरी रह जाती है,
क्योंकि
कविता कभी पूरी नहीं होती।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

ट्रिगर पर उंगली

 

इसी चौराहे पर
एक कत्ल हुआ,
सरेआमगोली मारी गई।

हैरत ये नहीं
कि खून बहा सड़कों पर,
हैरत तो ये है
जो मरा है
वह पहली बार नहीं मरा।

वह पहले भी मारा गया था,
कल किसी और चौराहे पर,
और यकीन मानो
कल फिर मारा जाएगा
किसी नए नाम से,
किसी नई भीड़ के सामने।

और जो खड़ा है
ट्रिगर पर उंगली रखे
वह भी कातिल नहीं है,
क्योंकि यहाँ
हर रोज चेहरा बदलता है,
पर उंगली नहीं बदलती।

वह उंगली
दरअसल किसी एक की नहीं
पूरी व्यवस्था की है,

जो हर चौराहे पर
खुद को बेकसूर साबित कर देती है।

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

खुशहाली का होर्डिंग

 

उसने कहा
मैं पीड़ा में हूँ।

सत्ता मुस्कुराई,
और उसकी आवाज़ को
रिकॉर्ड से बाहर कर दिया गया।

सबूत के नाम पर
उसी के चेहरे की
एक AI-निर्मित
हँसती हुई तस्वीर
पेश की गई

और फ़ैसले में लिखा गया
पीड़ा का कोई प्रमाण नहीं मिला।

क्योंकि
दर्ज रिकॉर्ड में
वह हर फ़्रेम में
मुस्कुराता पाया गया।

इतना ही नहीं
उस पर यह भी इल्ज़ाम लगा
कि उसने
अपनी ही पीड़ा का झूठ गढ़कर
सत्ता को बदनाम करने की
साज़िश रची।

और अंत में
जनता को गुमराह करनेकी धारा में
उस पर जुर्माना ठोंक दिया गया।

फिर
उसकी उसी मुस्कुराती तस्वीर को
हर चौराहे पर
होर्डिंग बनाकर टाँग दी गई,

और नीचे लिखा था
यह है
राज्य की खुशहाली का प्रमाण।

रविवार, 5 अप्रैल 2026

इंसानियत—नियम व शर्तें लागू

चीख की
कोई भाषा नहीं होती,
उसे सुनने के लिए
किसी अनुवादक की ज़रूरत नहीं
उसका एकमात्र वाहक
संवेदना है,
और संवेदना की भी
कोई भाषा नहीं होती।

 

हृदयविदारक होता है
चीख और संवेदना का मिलन,
क्योंकि इस मिलन से
जन्म लेती हैं
पराश्रव्य सुबकियाँ।

 

जघन्यता और पाशविकता
चीखों की जनक हैं
इनका जन्म
अक्सर
आदिम हवस
और धार्मिक कट्टरता की
अंधी सुरंगों में होता है।

 

यूँ तो इनकी
कोई जाति, धर्म नहीं होता,
पर ये अक्सर
तहकीकात करती हैं
जाति और धर्म की,
और सुविधानुसार
इंसानियत को
लहूलुहान कर देती हैं।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

सभ्य" दाँतों के निशान

 

बिना शिनाख़्त का प्रयास किए
रिपोर्ट में दर्ज कर दिया गया
शिनाख़्त नहीं हो पाई।


और फिर
पंचनामा कर
आनन-फानन में
उसे दफ़ना दिया गया।

पोस्टमार्टम की
रस्म-अदायगी भी नहीं हुई
क्योंकि
उसके फटे कपड़ों से
झाँक रहे थे
उसके जिस्म पर
कुछ “सभ्य” दाँतों के निशान

वे निशान
इतने परिचित थे
कि कागज़ों ने
आँखें मूँद लीं,
और कानून ने खुद
तोड़ दिया कानून का दायरा

चश्मदीदों ने
दबी ज़ुबान में बताया
तब तक आसमान में
कुछ गिद्ध मंडरा रहे थे,
जब तक
वह ज़िंदा थी।

सोमवार, 30 मार्च 2026

साप्ताहिक प्रेम

मैं अपनी माशूका से

सोमवार को आँखें चार करता हूँ,
फुर्सत से मंगलवार के दिन
प्यार का इज़हार करता हूँ।

बुधवार बीत जाता
घूमने-फिरने और डेटिंग में,
और बृहस्पतिवार निकल जाता है
थोड़ी-सी मनुहार और वेटिंग में।

शुक्रवार को फिर
शादी और हनीमून का जुनून,
शनिवार आते-आते
छोटी-सी अनबन का सुकून।

रविवार को होता है
थोड़ा-सा ब्रेकअप, थोड़ा मौन,
फिर दिल कहता है
चलो, रीस्टार्ट करो ये लव-ज़ोन।

और फिर
मैं अपनी उसी माशूका से
सोमवार को आँखें चार करता हूँ।

सबसे बड़ी बात
ये माशूका कोई और नहीं,
मेरी पत्नी ही है!

जिसके साथ
पिछले चार दशकों से
हर हफ्ते
हम अपने वैवाहिक जीवन का
इसी तरह
नवीनीकरण करते आ रहे हैं।

शनिवार, 28 मार्च 2026

न्यूटन के सेब से आगे की कहानी

 

न्यूटन, तुम ग़लत थे

तुमने सेब को गिरते देखा,
और खींच दी नियम की रेखा,
और गुरुत्वाकर्षण के
सार्वभौमिक सत्य के नियंता बन गए।


काश,
तुमने देखा होता
उनको जो प्रेम करते हैं,


जो तुम्हारे गुरुत्वाकर्षण को
नहीं मानते हैं।

गिरना क्या है,
वे नहीं जानते हैं।


गुरुत्वाकर्षणीय साज़िशें होती रहीं
उन्हें गिराने को,
सज़ा दी गई
उन्हें डराने को।

पर क्या वे गिरे?
पर क्या वे डरे?


वे तो सर्वदा
तुम्हारे नियम के
प्रतिगामी रहे,
वे तो सर्वदा
ऊर्ध्वगामी रहे।


काश, तुम उस दिन
सेब की बगिया में नहीं,
प्रेम की बगिया में होते।

मंगलवार, 24 मार्च 2026

एक्सपायरी डेट का उजाला

 

अंधेरे के हिमायती
उजाले के लिए सुरक्षित खेतों में
चुपचाप अंधेरा बो गए।

जब फसल लहलहाई,
तो पहरे पर खड़े कर दिए गए
असंख्य प्रवक्ता
अंधेरे के फ़ायदे गिनाने के लिए।

उसकी फैलती विकरालता देख
उजाले भी सहम गए,
सामने आने से कतराने लगे।

मौका देखकर
उजाले को अफवाहकरार दिया गया,
और हर दीये की लौ पर
ठोंक दी गई मुहर
एक्सपायरी डेट”  की।

जो सूरज की बात करते थे,
जो रोशनी का ज़िक्र करते थे
उन्हें देशद्रोही, आतंकवादी
ठहराने की मुहिम चल पड़ी।

प्रचार का तंत्र भी
कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो गया
झूठ को उजाला
और अंधेरे को सच
साबित करने में।

जब सबने मान लिया
कि अंधेरा ही सत्य है,
तभी खामोशी से
मन में डर और नफ़रत बोई गई।

फिर बच्चों के हाथों में
हथियार थमा दिए गए,
और अंधेरे ने
हर अपराधी को
अपनी छाया में पनाह दे दी।

सत्ता के घमंड में डूबे अंधेरे
यह देख ही न सके
कि उजाले के कुछ बीज
अब भी ज़िंदा हैं,
यहीं कहीं
धरती की गहराइयों में
अपने समय की प्रतीक्षा में ...

शनिवार, 21 मार्च 2026

नमक-मिर्च की सोहबत

 

उसने उसे देखा…
उसने भी शायद उसे देखा—

“देखने” और “शायद” देखने को
किसी और ने भी देख लिया…

और फिर—
अनगिनत किस्से
जुड़ते चले गए
किस्सागोई के सिलसिलों में।

मुँह-दर-मुँह,
नमक-मिर्च की सोहबत में,
एक मामूली सा लम्हा
इश्क़ का अफ़साना बन गया…
और वे—
चर्चाओं में आ गए।

उन्हें खबर भी न थी…
पर उनके ज़िक्र में
प्यार, इज़हार और मनुहार
धीरे-धीरे शामिल होते चले गए।

सबसे अजीब बात—
उन्हें अपने ही इश्क़ की खबर
खबरदार करती खबरों से हुई।

अब तो “वर्मा”
बस इसी फ़िराक में है—
कि ये किस्से
उन तक भी पहुँचें…

और जब पहुँचें—
तो एक सच बन जाएँ।

ताकि ये किस्सा…
सिर्फ किस्सा न रहे।

बुधवार, 18 मार्च 2026

कूड़ेदान में प्रश्न

 

हमारे आँकड़े आत्मनिर्भर हैं,
क्योंकि संकलन
धृतराष्ट्रीय आँखें करती हैं।

संजय के रंगीन चश्मे के पीछे
अनुवादक आँखें
विनाश को विकास बताती हैं।

मायावी शब्दबाण सिद्धहस्त हैं
अश्वत्थामा मारा गया
के तर्ज पर
संधान करने को।

यहाँ हर पराजय
रणनीतिक विजय कहलाती है,
हर कराह
उत्सव का शोर बन जाती है।

भूख को
संयम” लिख दिया जाता है,
और बेरोज़गारी को
आत्मनिर्भरता का अवसर

सबसे कष्टदायी है
सार्थक प्रश्नों को
किसी कुंवारी की कोख से जन्मे
नवजात-सा
कूड़े के ढेर में पड़ा देखना।

धृतराष्ट्र प्रसन्न हैं
क्योंकि दरबार में
संजय अभी भी वही देख रहा है
जो उसे
दिखाने को कहा गया है।