नज़रिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नज़रिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

'मीज़ान-ए-फ़न' ..... (ग़जल)

 

बहर-ओ-क़ाफ़िया की उलझन में रहा मैं इस क़दर,

मेरे हाथों से ही निकलकर इक ग़ज़ल चली गई।

 

लफ़्ज़ ही तौले किए मीज़ान-ए-फ़न पर उम्र भर,

वक़्त की ठहरी हुई वो हर इक हलचल चली गई।

 

ढूँढते ही रह गए माअनी हम हर इक शेर में,

जो हक़ीक़त में थी कहनी, बात टल चली गई।

 

सोचा था ठहरेगी वो दो पल यहाँ मेरे पास ही,

आँख झपकी और वो मोहक झलक चली गई।

 

जो अनकहा था, बस वही ज़िंदा रहा है आज भी,

जो कही थी हमने, वो बनके सदा चली गई।

 

'वर्मा' अपने फ़न को तो हमने बचा ही लिया मगर,

ज़िंदगी जो हाथ में थी, बस वो कल चली गई।



  • बहर-ओ-क़ाफ़िया = 'वह, जो अनुसरण करता है' (ग़जल के नियमो का अनुसरण)
  • लफ़्ज़ = शब्द
  • मीज़ान-ए-फ़न = कला का संतुलन
  • माअनी  = मायने

मंगलवार, 10 मई 2011

अपना जिस्म लहुलुहान रखते हैं .....

जेबों में अपने हर सामान रखते हैं
दिल में ये लोग तो दुकान रखते हैं
.
शातिर मंसूबों का ज़ायजा क्या लेंगे
दुश्मनों के लिए भी गुणगान रखते हैं
.
बिखर कर भी जुड़ जाते है पल में
जिस्म में अपने सख्तजान रखते है
.
मुआवजें जब शिनाख़्त पर होते हैं
वे अपना जिस्म लहुलुहान रखते हैं

.
टिकेंगे भी भला कैसे हल्फिया बयान
वे बहुत ऊँची जान-पहचान रखते हैं
.
सफर अंजाम पाये भी तो भला कैसे
राहगीरों के सामने वे तूफान रखते हैं
.
वे बेखौफ़ न हो तो भला क्यूँ न हों
हर जुर्म के बाद वे अनुष्ठान रखते हैं

सोमवार, 11 अक्टूबर 2010

कदहीन मगर आदमकद भीड़ ...

अपना कोई चेहरा

नही होता है भीड़ का,

भीड़ में मगर

अनगिन चेहरे होते हैं.

भीड़ में

जब लोग बोलते हैं,

तब समवेत स्वर

संवाद से परे हो जाता है.

भीड़ गुनती नहीं है कुछ भी;

भीड़ सुनती नहीं है कुछ भी,

भीड़ में मगर

अनगिन कान होते हैं.

कदहीन भीड़ भी

अक्सर आदमकद होती है,

जवाबदेही से परे

भीड़ निरंकुश होती है.

सत्य नहीं देख पाती है भीड़

क्योंकि,

भीड़ में आँखे तो होती हैं अनेक

पर नहीं होती है

भीड़ की आँखे.

भीड़ का मंतव्य भी

तय नहीं होता है;

भीड़ का गंतव्य भी

तय नहीं होता है,

क्योंकि,

अनगिन पाँव होते हुए भी

अपने पैरों पर

कब चली है भीड़ !!

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

हमारी सुरक्षा व्यवस्था तो चाक-चौबन्द है ~~


हमारी सुरक्षा व्यवस्था तो
चाक-चौबन्द है.
देखते नहीं हमने
हर गली;
हर नुक्कड़;
हर चौराहे पर
बैरकें लगा रखी है

यहाँ से हम नज़र रखे हुए हैं;
और परख रहे हैं
हर आम आदमी की गति को,
और फिर
अवसर-बेअवसर
इन्हें गतिशून्य भी कर देते हैं,
ताकि
अबाध गति मिल सके उनको
जो ‘जेड प्लस’ की सुविधा से लैस हैं;
ताकि
दौड़ सकें ‘लाल बत्ती युक्त गाड़ियाँ’
बिना किसी अवरोध के
फर्राटे से.
तुम्हें तो शायद
हमारे काम के बोझ का
अन्दाजा भी नहीं होगा
’उगाही’ से लेकर
आँकड़ों के संवर्धन को रोकने के लिये
रात के अन्धेरे में
रेल की पटरियों पर
लावारिश लाशें रखने तक का काम
हमें करना पड़ता है.
क्या तुमने महसूस नहीं की
वारदात स्थल को छोड़कर
हर स्थान पर हमारी मौजूदगी ?
या शायद तुमने देखी ही नहीं है
घटनास्थल पर पहुँचकर
विवादास्पद और अनसुलझे
जाँच परिणाम तक पहुँचने की
हमारी तत्परता
इस प्रक्रिया में हम अब तो
फारेंसिक जाँच, नार्को टेस्ट जैसे
भारी भरकम शब्द भी शामिल कर लिये हैं.

अब तो यकीन हो गया होगा कि
हमारी सुरक्षा व्यवस्था
दुरूस्त और चाक-चौबन्द है.

सोमवार, 24 मई 2010

पत्नी रोज़ सामानों की लिस्ट पकड़ा देती है लौटते समय लाने के लिये ~~

कई बार
और अक्सर
पूरी की पूरी व्यवस्था को
नकारने के बावजूद
न केवल उस व्यवस्था में बने रहने की
मज़बूरी होती है
वरन
व्यवस्था को व्यवस्थित करने में
धूरी  बन जाना पड़ता है,
बहाने और समझौते
बन चुके हैं हमारी आदत
और हम खामोशी से देखते हैं
स्याह बादलों का जमघट
सिद्धांतो और आदर्शों की
अनवरत शहादत,
ऐसा भी नहीं कि
कोई प्रतिकार ही न हो
अक्सर हम
रात के सन्नाटे में
लच्छेदार शब्दों में
इन सबके ख़िलाफ रिसाले भी रचते हैं
सुबह होते ही
न जाने कैसे
इन रिसालों के स्वर
अनायास बदल जाते हैं,
बदले भी क्यूँ नहीं
पत्नी रोज़ ही तो
सामानों की लिस्ट पकड़ा देती है
लौटते समय बाज़ार से लाने के लिये.




शुक्रवार, 26 मार्च 2010

यह मकान बिकने वाला है

इन दीवारों पर

चढ़ा दो

एक और कोट,

नजर नहीं आना चाहिए

इन दीवारों का

कोई खोट.

हो सके तो ढक देना

उस

उखड़े हुए पलस्तर को भी,

छुपा दो उन संत्रासों को

जो इनके जिस्म पर

कील गाड़ने के कारण उगे हैं.

रंग दो -

दर्द की हर लकीर को

मुस्कराते हुए रंगों से, 

दिखे नहीं

उन ईंटों की भोथरी शक्लें

जो नींव से जुड़ी हैं

ढक दो

इनकी जर्जरता को

सुन्दर लहरदार टाईलों से

.

भुरभुरापन न दिखे तो

मुझे अब फर्क नहीं पड़ता

इसके भुरभुरे अस्तित्व से भी

क्योंकि अब

यह मकान बिकने वाला है

बुधवार, 24 मार्च 2010

उसकी लालसा ~~~

आपने

मेरे हर मसले पर

अपना बेबाक

नज़रिया दिया,

ये अलग बात है कि

इन्हें पूरा करने को

आपने तो कोई भी

न ज़रिया दिया.

~~~~~

मेरे तेरे बीच

अब तो कोई रहा

ना राज,

फिर क्यूँ रहती हो तुम

अक्सर मुझसे

नाराज.

~~~~~~~

उसकी तो

अब बस यही है

लालसा,

कि गोदी में आ जाये

अब कोई

लाल सा.