शनिवार, 22 अगस्त 2026

अँधेरे का उजाला

 

शहर त्रस्त था
अँधेरों से।

उन्होंने
संविधान में संशोधन किया
और
अँधेरे का नाम
उजाला रख दिया।

फिर
मीडिया ने घोषित कर दिया—

अब शहर में
अँधेरा नहीं है,
सिर्फ़
उजाला दिखाई देता है।

15 टिप्‍पणियां:

Razia Kazmi ने कहा…

हक़ीक़त है जो मीडिया कहदे वही सही माना जा रहा है अपना सोचना सबने बंद कर दिया है

Anita ने कहा…

मीडिया सच भी दिखाता है, पर हम तब आँखें बंद कर लेते हैं

Sweta sinha ने कहा…

बात ये है सर कि
मनमुताबिक, सहूलियत से
अंधेरे को उजाला घोषित करने वाला
पक्ष-विपक्ष सबका अपना मीडिया है ,
निर्भर करता है...
आपकी ऑंखें कौन सा उजाला चुनती है।
सादर
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Aman Peace ने कहा…

wah!!

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

M VERMA ने कहा…

वहीं सच जो सत्ता द्वारा प्रायोजित होता है

M VERMA ने कहा…

सही कहा
पर अंधेरे को उजाला घोषित करने का प्रयास सत्ता करती है

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

Sweta sinha ने कहा…

मतलब कि सत्ता का विपक्ष प्रयासहीन है?
सत्ता को कटघरे में खड़ा करना,सवाल करना , विरोध करना आपका मौलिक अधिकार है और सत्ता की हर पंक्ति को रेखांकित कर गलत ठहराना आपका कर्तव्य है न?

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सटीक

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

Pammi singh'tripti' ने कहा…

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 26 अगस्त 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
अथ स्वागतम शुभ स्वागतम।

Sudha Devrani ने कहा…

और सबने मान भी लिया...
फिर दोष किसका ?
लाजवाब व्यंग

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया