मंगलवार, 18 अगस्त 2026

सत्ता की अ-आँख

 

आमतौर पर
सत्ता
कान रहित होती है,
और उसकी अ-आंख होती है

जो
देखती कम,
दिखाती अधिक हैं।

जनता की वे चीखें
जिनसे
दीवारें तक
भरभराकर गिर सकती हैं,
सत्ता की चौखट तक पहुँचते-पहुँचते
फुसफुसाहट में बदल जाती हैं।

फिर सत्ता
उस फुसफुसाहट का
अनुवाद करती है
अपनी सुविधा की भाषा में,
और
रिटर्न गिफ्ट की तरह
वही अनुवाद
जनता को लौटा देती है।

उसका मुँह
टीवी और रेडियो हैं,
जो हर चीख को
ध्वनिपरिवर्तक की तरह
उपलब्धियों के शोर में
बदल देते हैं।

भूख
आँकड़ा बन जाती है,
बेरोज़गारी
आश्वासन,
दमन
व्यवस्था,
और प्रतिरोध
विकास में बाधा।

लेकिन
हर आवाज़
इतनी आसानी से
नहीं मरती।

कुछ स्वर
इतिहास की राख में
दबे हुए अंगार होते हैं।

वे चुप रहते हैं,
सुलगते रहते हैं,
समय की प्रतीक्षा करते हैं।

फिर
एक दिन
वे राख झाड़कर उठते हैं
और
अपनी ही भाषा में
बोलते हैं।

उस दिन
सत्ता के सारे
ध्वनिपरिवर्तक
शोर करते रह जाते हैं
मगर
बधिर हो जाते हैं।

क्योंकि
कुछ आवाज़ें
सुनी नहीं जातीं,
वे इतिहास लिखती हैं।

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