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बुधवार, 23 सितंबर 2026

व्यवस्था दुरुस्त है

 

हम मर्माहत हैं
इस वारदात से।

यकीन मानिए,
व्यवस्था ने
अपनी व्यवस्था
दुरुस्त कर रखी है।

हमने अपने
आई.टी. सेल को
निर्देशित कर रखा है—
सोशल मीडिया पर
तुरंत प्रतिक्रिया देने के लिए।

वैसे भी
हमने तैयार कर रखे हैं
हर संभावित वारदात के लिए
दुःख भरे
बयानों की एक सूची।

घटना कोई भी हो,
शब्द हमारे पास तैयार हैं—
“हम स्तब्ध हैं…”
“हम बेहद व्यथित हैं…”
“दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा…”

व्यक्तिगत रूप से भी
मैं बहुत व्यथित हूँ।

प्रमाण के तौर पर
आप देख सकते हैं—
ये गीले तकिए,

जिन पर सिर रखकर
सोते हुए भी
मैं सुबक रहा था।

हाँ,
सुबह उठकर
आँखें भी पोंछी थीं मैंने—

फिर
फाइलों पर दस्तखत किए,
प्रेस को बयान दिया
और अगले दुःख के लिए
अपना तकिया
फिर से तैयार कर लिया।

व्यवस्था दुरुस्त है।


सोमवार, 21 सितंबर 2026

तबेले में शिक्षा

 

अरसे
से गुम थी
पर अंततः
एक तबेले में
खुद अधमरी होते हुए भी
अधमरी गाय को
घास डालती मिली—
शिक्षा।

भूसे
के ढेर के नीचे
मृतप्राय—
उसने
अपना आवास
बना लिया था।

वेंटीलेटर भी
मुहैया नहीं कराया गया,
क्योंकि
आँकड़ों ने उसे
सम्पूर्ण स्वस्थ
घोषित किया हुआ था।

उसका अस्तित्व
प्रकाश में आते ही
मीडिया के माइक ने
उसे घेर लिया।

सवालों की
बौछार होने लगी—
“
आपको
कैसा लग रहा है?
आप यहाँ हैं,
पर छात्र कहाँ हैं?”

कराहते हुए
जवाब मिला—
“
बच्चे
टूटी सड़क के कारण
नहीं आ पा रहे हैं।”

मीडिया
का माइक
तुरंत
सड़क की ओर मुड़ गया—
पर सड़क भी
आँकड़ों में
एकदम दुरुस्त थी।

तभी
एक बच्चा
कीचड़ में फिसलकर
सड़क के किनारे जा गिरा।

माइक
उसकी ओर बढ़ा—
पर बच्चा
आँकड़ों में
स्कूल पहुँच चुका था।

और शिक्षा?
वह अब भी
तबेले में
अधमरी अवस्था में
अधमरी गाय को
घास डाल रही थी।

मंगलवार, 18 अगस्त 2026

सत्ता की अ-आँख

 

आमतौर पर
सत्ता
कान रहित होती है,
और उसकी अ-आंख होती है

जो
देखती कम,
दिखाती अधिक हैं।

जनता की वे चीखें
जिनसे
दीवारें तक
भरभराकर गिर सकती हैं,
सत्ता की चौखट तक पहुँचते-पहुँचते
फुसफुसाहट में बदल जाती हैं।

फिर सत्ता
उस फुसफुसाहट का
अनुवाद करती है—
अपनी सुविधा की भाषा में,
और
रिटर्न गिफ्ट की तरह
वही अनुवाद
जनता को लौटा देती है।

उसका मुँह
टीवी और रेडियो हैं,
जो हर चीख को
ध्वनिपरिवर्तक की तरह
उपलब्धियों के शोर में
बदल देते हैं।

भूख—
आँकड़ा बन जाती है,
बेरोज़गारी—
आश्वासन,
दमन—
व्यवस्था,
और प्रतिरोध—
विकास में बाधा।

लेकिन
हर आवाज़
इतनी आसानी से
नहीं मरती।

कुछ स्वर
इतिहास की राख में
दबे हुए अंगार होते हैं।

वे चुप रहते हैं,
सुलगते रहते हैं,
समय की प्रतीक्षा करते हैं।

फिर
एक दिन
वे राख झाड़कर उठते हैं
और
अपनी ही भाषा में
बोलते हैं।

उस दिन
सत्ता के सारे
ध्वनिपरिवर्तक
शोर करते रह जाते हैं—
मगर
बधिर हो जाते हैं।

क्योंकि
कुछ आवाज़ें
सुनी नहीं जातीं,
वे इतिहास लिखती हैं।