मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

“किस्तों में मौत” - "Death in installments"


हम मारे जा रहे हैं,
हम मर चुके हैं

विडम्बना यह है
कि हमें महसूस भी नहीं होता
कि हम मर रहे हैं।

हमें किस्तों में मारा जा रहा है।

नेपथ्य से संचालित हम,
अक्सर खुद ही
अपना गला घोंटते हैं
और मुट्ठियाँ बाँधकर
हत्यारों के समर्थन में
नारे लगाते हैं।

कहीं हम एक साथ न मर जाएँ,
इसलिए हर महीने
पाँच किलो राशन दे दिया जाता है।

हमारे बच्चों से
किताबें लेकर
नारे थमा दिए गए हैं,
और खेल के नाम पर
चाइनीज़ मांझा।

हमारे रास्तों को
गड्ढों की विरासत,
हमारी साँसों को
धुएँ की आज़ादी,
और हमारे सपनों को
घोषणाओं का सहारा मिला है।

क्या आपने देखा है
चीखें कैसे भजन बन जाती हैं?
आक्रोश कैसे
शुक्रिया हो जाता है?

हमें ज़िंदा रखा जाता है
बस इतना भर,
कि हम धीरे-धीरे मरते रहें,
और हर चुनाव में
अपनी ही मौत पर
मुहर लगाते रहें।

हम मारे जा रहे हैं
और ताली भी
हम ही बजा रहे हैं।

कोई टिप्पणी नहीं: