शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

प्रश्नों के बीज

मेरे तमाम प्रश्नों को लटका दिया गया है
Hang till death,
ताकि डर विरासत बन जाए
और जिज्ञासादंडनीय अपराध।

अब तलाश है उस मानस-कोख की
जहाँ विचार जन्म लेते हैं,
ताकि वहाँ भी ताले जड़ दिए जाएँ।

मैं अक्सर उस कब्रिस्तान जाता हूँ
जहाँ दफन हैं ये प्रश्न।
यकीन मानिए
ये प्रश्नों की लाशें नहीं,
प्रश्नों के बीज हैं।

और बीज
ज़्यादा दिनों तक सोते नहीं
मिट्टी उन्हें
चुप रहना नहीं सिखाती।

एक रात, जब पहरेदार थक जाते हैं
और ताले अपनी चाबियाँ भूल जाते हैं,
धरती के भीतर
एक हल्की-सी खरोंच होती है
जैसे इतिहास ने करवट ली हो।

वहीं से एक प्रश्न अंकुरित होता है
बिना अनुमति,
बिना आदेश।

उसकी पहली पत्ती इतनी मासूम होती है
कि सत्ता उसे खरपतवार समझती है
और यही उसकी भूल है।

धीरे-धीरे वे प्रश्न जड़ों में फैलते हैं
इतिहास की दीवारों में,
संविधानों की हाशियों में,
और डरे हुए लोगों की नींदों में।

याद रखिए
प्रश्नों को लटकाया जा सकता है,
दफनाया नहीं।

क्योंकि
हर कब्रिस्तान
आख़िरकार एक नर्सरी होता है।

और जब ये हजारों अंकुर
एक साथ वृक्ष बनेंगे
तब क्या ताले, क्या जंजीरें?

तब जंगल के पास
कोई आदेश-पत्र नहीं होगा
वह खुद
एक जीवित संविधान होगा। 

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