धवल
कागज़ पर
स्याही
धब्बा नहीं होती,
वह
कागज़ का श्रृंगार होती है।
कभी
उसी स्याही ने
"वंदे
मातरम्" लिखा था,
और
उसी स्याही ने
दमन के परचम को
स्याह कर दिया था।
उसी
स्याही ने
"खोल
दो" लिखा,
तो
विभाजन की सियासत का
नंगा चेहरा
दुनिया के सामने रख दिया।
स्याही
इंकलाब का
दूसरा नाम है।
कालिख
नहीं जानती
स्याही की ताक़त।
उसे
क्या मालूम—
काला होना
और
इतिहास लिखना,
दो अलग-अलग बातें हैं।
और
जब
सत्ता के इशारे पर
यही स्याही
जनसंघर्ष के
आदमकद चेहरे पर
उछाली जाती है,
तब
वही स्याही
चेहरे पर
कुछ ऐसा लिखती है
कि
चेहरा
काला नहीं होता,
बल्कि
रक्ताभ हो
दमक उठता है।
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