मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

'राष्ट्रीय गड्ढा'

हम
राष्ट्रीयता की अलख जगा रहे हैं,
और एक तुम हो जो
हमें गड्ढों में उलझा रहे हो।

 

अरे! हमने खुद को
विश्व-स्तर का बनाने का बीड़ा उठाया है,
हम तो हर गिरने वाले पर
अभियोग पत्र लाने की तैयारी में हैं।

गड्ढों की आँखें नहीं होतीं,
पर गिरने वालों के पास भी
आँखें कहाँ होती हैं!

 

जानते नहीं?
हमारे देश में गड्ढों का
एक समृद्ध इतिहास है।

तुम्हें क्या पता
एक गड्ढा बनाने के लिए
हमें कितने पतन से गुजरना पड़ता है।

ये गड्ढे यूँ ही नहीं बनते,
इन्हें बनाने के लिए
व्यवस्था को भी
तलहटी तक जाना पड़ता है।

 

और तुम सुरक्षा की बात करते हो?
गड्ढे में गिरना असुरक्षित कैसे हो गया!
इसे वरदान समझो
क्योंकि उसी गड्ढे में
हमने रुपये को भी गिराया है।

 

सोचो,
अगर गड्ढे न खोदे जाएँ
तो विकास की होर्डिंग के लिए
मिट्टी कहाँ से आएगी?

 

अब तो हम
गड्ढों की प्रतियोगिता कराने जा रहे हैं
सबसे खतरनाक गड्ढे को
राष्ट्रीय गड्ढा घोषित किया जाएगा।

 

बेशक तुम गिरे हो,
पर हमारी नीयत पर सवाल मत उठाओ

और हो सके तो
वहीं से खड़े होकर
राष्ट्रीय गीत और वंदे मातरम् गाओ

 

क्योंकि इस देश में अब
गिरना नहीं,
गिराया जाना ही
विकास कहलाता है।


चित्र : AI

4 टिप्‍पणियां:

Razia Kazmi ने कहा…

वाह क्या बात कही है

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

Digvijay Agrawal ने कहा…

एक समृद्ध इतिहास है।
शायद,....
वंदन

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊