गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

दर्द की चोरी

मैं दर्द में था,
पर एक रात
मेरा दर्द चोरी हो गया।

 

मैं हैरान था
आदमी से रोटी छिनती है,
रोज़गार छिनता है,
पर अब तो
दर्द भी छिनने लगा है।

 

मैं अपने
नैसर्गिक दर्द के साथ
जीना चाहता था।

थाने गया
उन्होंने कहा,
पहले सबूत लाओ
कि दर्द तुम्हारा ही था।

अख़बार में इश्तेहार दिया
एक पुराना, सच्चा दर्द खो गया है,
पाने वाला कृपया लौटा दे।

टीवी वालों से कहा
उन्होंने पूछा,
इसमें टीआरपी कितनी है?”

 

हर दरवाज़े से लौटकर
मैंने सोचा
अब दर्द
पैदा करना पड़ेगा।

मैंने गुलाब से पूछा
उसके कांटे गायब थे।
वह बोला
चुनावी मौसम है साहब,
हमारे कांटे भी
आरक्षित कर लिये जाते हैं।

 

आगे एक साँप मिला
शोक में था।
कहने लगा
ज़हर अब मेरे पास नहीं,
लाइसेंस पर चला गया है।

 

एक दिन
मधुमक्खियों का छत्ता देखा।
हाथ बढ़ाया
वे आईं, मंडराईं, छुआ
पर किसी ने डंक नहीं मारा।

मैंने पूछा
डंक क्यों नहीं मारतीं?”

वे बोलीं
डंक अब हम नहीं मारते।
हमारे सारे डंक नीलाम हो चुके हैं

कुछ सत्ता के पास,
कुछ विपक्ष के पास,
और जो बचे थे,
उन्हें संसद ने खरीद लिया।

अब डंक
जनता को नहीं,
सिर्फ़ बहसों में
एक-दूसरे को मारे जाते हैं।

 

तभी एक लाइन दिखी
मैं भी उसमें लग गया।
किसी ने बताया

यह पांच किलो राशन की लाईन है

 

और तभी अचानक

मेरा दर्द वापस मिल गया

तब से मैं हर महीने
उस लाइन में खड़ा होता हूँ
ताकि मेरा दर्द
कहीं फिर खो न जाए।


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