शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

सहमा हुआ स्पर्श ~~

उस दिन जब तुम

आयी थी मेरे घर पर touch

तुम बैठी थी

मेरे इसी बिस्तर पर

.

तुम प्रतीक्षा कर रही थी

मेरे स्पर्श की

और मैं भी काँपते हाथों से

तुम्हें छू लेना चाहता था

सहसा

पर्दे हिलकर अपनी उपस्थिति का

एहसास देने लगे थे

खिड़कियाँ कौतूहलवश कमरे के अन्दर

झाँकने लगी थी

कोने में उलटा लटका

अदना सा मकड़ा भी

मुस्कराने लगा था

याद है तुम्हें

पंखा भी उस दिन

अपेक्षाकृत तेज चलने लगा था.

और सहम गयी थी तुम

मैं भी तो सहमा था

बीच राह में दुबका स्पर्श भी तो

बुरी तरह से सहम गया था.

.

आज फिर

जबकि तुम सामने हो

बेचैन हैं स्पर्श,

पर आतुर नहीं है

आखिर बार-बार सहमने की

आदत जो नहीं है

~~

ज़ज्बात पर मेरी 50वी रचना.

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

रोटियों की दीवारें ~~














वे क़ैद हैं

और उन्हें

अपने क़ैद का

अभास तक नहीं है।

.

जब कभी

उन्होने सूरज की ओर देखा;

जब कभी

उन्होनें आक्सीजन से

रूबरू होने की कोशिश की;

जब कभी

उन्होने आसमाँ के इस छोर से

उस छोर तक उड़ना चाहा;

जब कभी

उनमें अभिव्यक्ति की अकुलाहट मिली;

जब कभी

उनकी आँखों में

सपनों की आहट मिली;

जब कभी उनमें --

जब कभी --

.

खड़ी कर दी गयी

उनके इर्द-गिर्द

रोटियों की दीवारें

और अब वे क़ैद हैं

पर उन्हें

अपने क़ैद का

अभास तक नहीं है।


शनिवार, 14 नवंबर 2009

इस वारदात में मेरा कोई हाथ नहीं है ~~

इस वारदात में
मेरा कोई हाथ नहीं है


क्योंकि
जिस समय यह वारदात घटी
मैं अपने अपनों के बीच था
अपने सुमधुर, सलोने
मासूम-से
सपनों के बीच था।


मैंने तो
एक अरसा पहले
बन्दूकें थमा दी थीं
मचलते हुए उन
अबोध, दुधमुहों को
कि वे बहल जाएँ।

मैंने तो
उन्हें
इन बन्दूकों को
चलाना भी नहीं सिखाया था।


नफ़रत के शोलों से
इन्हें
इन बन्दूकों ने ही
रूबरू कराया है।

ये सारी साज़िशें
इन बन्दूकों की ही हैं,
क्योंकि
वारदात के वक़्त
पंचतारा होटल के
स्विमिंग पूल में
मैं
निर्वस्त्र अवस्था में 

मछलियाँ पकड़ रहा था।


अब तो
यक़ीनन
यक़ीन हो गया होगा
कि इस वारदात में
मेरा
कोई
हाथ
नहीं है।

 


रविवार, 8 नवंबर 2009

कुदाल से त्योरियां ~~

~~
रोटियाँ उगाने के लिये
धरती के माथे पर
खींचते रहे तुम
अनगिनत लकीरें;
लहलहा उठीं रोटियाँ
अधजली; अधपकी और
पकी रोटियाँ
वे तुम्हारे उगाये रोटियों में से
अधजली और अधपकी
तुम्हें खैरात में देते रहे,
और पकी रोटियों को
’स्विस बैंक’ का रास्ता दिखा दिया
तुम सपाट माथा लिये
चुपचाप देखते रहे; चमत्कृत से
रोटियों के सफर को.

तलाश में क्यों हो
किसी शिल्पकार की अगुवाई का
अपने कुदाल से
खुद ही क्यों नही खींच देते
अपने माथे पर
त्योरियों की लकीरें
ताकि तैनात कर सको
इन्हें हर उस रास्ते पर
जिनसे होकर
इन रोटियों का सफर होता है
~~

सोमवार, 2 नवंबर 2009

अजन्मे प्रश्नों का क्लोन ~~


~~
अभी मैनें
प्रश्न किया भी नहीं था
कि
उत्तरों की फौज् ने आकर
अवरूद्ध कर दिया
मेरे हर संभावित प्रश्न की राह को
और ये उत्तर
प्रश्नों के ही लिबास में थे
नहीं छोड़ा
मेरे किसी भी प्रश्न को
दिमाग के गर्भ में
छत-विच्छत करने से.

मैं हतप्रभ हूँ
उन्हें कैसे पता चला
मेरे प्रश्नों के कद,

काठी और लिबास का;
उन्हें कैसे एहसास था
मेरे प्रश्नों के मर्मस्थल का;
उन्हें कैसे पता था
अजन्मे मेरे प्रश्नो के
पल-पल का.

शायद मेरा दिमाग
टेप किया जा रहा है;
या शायद

मेरे दिमाग का
क्लोन बना लिया गया है.
~~