Friday, November 27, 2009

सहमा हुआ स्पर्श ~~

उस दिन जब तुम

आयी थी मेरे घर पर touch

तुम बैठी थी

मेरे इसी बिस्तर पर

.

तुम प्रतीक्षा कर रही थी

मेरे स्पर्श की

और मैं भी काँपते हाथों से

तुम्हें छू लेना चाहता था

सहसा

पर्दे हिलकर अपनी उपस्थिति का

एहसास देने लगे थे

खिड़कियाँ कौतूहलवश कमरे के अन्दर

झाँकने लगी थी

कोने में उलटा लटका

अदना सा मकड़ा भी

मुस्कराने लगा था

याद है तुम्हें

पंखा भी उस दिन

अपेक्षाकृत तेज चलने लगा था.

और सहम गयी थी तुम

मैं भी तो सहमा था

बीच राह में दुबका स्पर्श भी तो

बुरी तरह से सहम गया था.

.

आज फिर

जबकि तुम सामने हो

बेचैन हैं स्पर्श,

पर आतुर नहीं है

आखिर बार-बार सहमने की

आदत जो नहीं है

~~

ज़ज्बात पर मेरी 50वी रचना.

35 comments:

महफूज़ अली said...

तुम प्रतीक्षा कर रही थी मेरे स्पर्श की और मैं भी काँपते हाथों से तुम्हें छू लेना चाहता था सहसा पर्दे हिलकर अपनी उपस्थिति का एहसास देने लगे थे खिड़कियाँ कौतूहलवश कमरे के अन्दर झाँकने लगी थी कोने में उलटा लटका अदना सा मकड़ी भी मुस्कराने लगा था याद है तुम्हें पंखा भी उस दिन अपेक्षाकृत तेज चलने लगा था.


इन पंक्तियों ने दिल को छू लिया....

आखिर बार बार सहमने कि आदत जो नहीं है....

वाह! बहुत अच्छी लगी यह कविता.....

महफूज़ अली said...

पचासवीं रचना पर बहुत बहुत बधाई.....

ज्ञानदत्त G.D. Pandey said...

सही है - जीवन मिस्ड चांसेज का कम्पैण्डियम है। और चांस मिस करने की आदत हो जाती है!
आप पोस्ट दर पोस्ट लिखते रहें। शुभकामनायें।

Udan Tashtari said...

५० वीं पोस्ट की बधाई...रचना बहुत सुन्दर है...मुझे लगता है मकड़ी की जगह मकड़ा कर लें या फिर बाकी मात्राएँ.

M VERMA said...

धन्यवाद समीर जी त्रुटि की ओर ध्यान दिलाने के लिये.

वन्दना said...

sabse pahle to 50 vi post ke liye badhayi........aapki har post itni khas hoti hai ki shabd kam pad jate hain.
aaj ki ye post to ek alag hi ahsaas liye huye hai prem ki is anubhuti ko jo shabd diye hain wo to lajawaab hain.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

याद है तुम्हें
पंखा भी उस दिन
अपेक्षाकृत तेज चलने लगा था.

इस खूबसूरत मखमली कविता के लिए
बधाई स्वीकार करें।

मनोज कुमार said...

अच्छी रचना। बधाई।

योगेश स्वप्न said...

bahut sunder ahsaas ki abhivyakti, verma ji , dil tak sparsh kar gain panktian.

राज भाटिय़ा said...

पचासवीं रचना पर बहुत बधाई,बहुत सुंदर कविता.
धन्यवाद

ताऊ रामपुरिया said...

पचासवीं पोस्ट की हार्दिक शुभकामनाएं. बडी मार्मिक रचना लगी.

रामराम.

वाणी गीत said...

50 वीं पोस्ट की बहुत बधाई......
आज फिर जबकि तुम सामने हो
बेचैन हैं स्पर्श, पर आतुर नहीं है
आखिर बार-बार सहमने की आदत जो नहीं है....

बहुत बढ़िया ..!!

डॉ टी एस दराल said...

वर्मा जी, आपने तो हमें भी उन खूबसूरत पलों की याद दिला दी।
बहुत कोमल और गुदगुदाते से अहसास लिए रचना।
५० वी पोस्ट पर बधाई और शुभकामनाएं।

पी.सी.गोदियाल said...

बहुत बहुत बधाई, आशा करते है की जल्दी शतक लगे ,

"परदे अपनी उपस्थिति का अहसास कराने लगे थे .........."
बेहद ख़ूबसूरत भाव !

अजय कुमार said...

सहमते सहमते आपने ५० स्पर्श कर लिये, बधाइयां ५०वीं पोस्ट और सुन्दर रचना

Razia said...

याद है तुम्हें
पंखा भी उस दिन
अपेक्षाकृत तेज चलने लगा था.
एहसास का यह कलेवर अच्छा लगा.
सुन्दर रचना

दिगम्बर नासवा said...

SABSE PAHLE 50 RACHNAAYEN POORI HONE KI BADHAAI ...

AAPKI RACHNA BEHAD KAMAAL KI HAI ... SAHMA HUVA SPARSH ..... DAR ASAL INSAAN APNE AAP SE HI SAHMA HUVA RAHTA HAI AISE MEIN ... BAKI SAB TO BAS EHSAAS HAI ...

अनिल कान्त : said...

waah kya khoob kahi hai

रश्मि प्रभा... said...

बड़े ही कोमल जज्बातों को प्रस्तुत किया है........

Dimple Malhotra said...

आखिर बार बार सहमने कि आदत जो नहीं है.nazuki liye hue khoobsurat kavita.....

राजीव तनेजा said...

प्रेम भाव से परिपूर्ण रचना

हरकीरत ' हीर' said...

kone mein ulta ltka
adna sa makda भी
muskurane lga tha ......वाह ......!!

varma जी makde के साथ-साथ main भी muskurane lagi हूँ .....!!

बहुत badhiaa ....dil se taarif कर rahi हूँ इस रचना की ....!!

rashmi ravija said...

आज फिर जबकि तुम सामने हो
बेचैन हैं स्पर्श, पर आतुर नहीं है
बहुत ही कोमल अहसास लिए हुआ है कविता... ५० वीं पोस्ट पर बहुत बहुत बधाई

Nirmla Kapila said...

50 वीं पोस्ट के लिये बहुत बहुत बधाई रचना बहुत भावमय है

Anamika said...

Verma ji sabse pehle to 50v rachna per bahut bahut badhayi..

तुम प्रतीक्षा कर रही थीमेरे स्पर्श की और मैं भी काँपते हाथों सेतुम्हें छू लेना चाहता थासहसा पर्दे हिलकर अपनी उपस्थिति का एहसास देने लगे थेखिड़कियाँ कौतूहलवश कमरे के अन्दरझाँकने लगी थी

kitni sundarta se dil ke bhaav urek diye hai kalam se...bahut khoob.

और सहम गयी थी तुममैं भी तो सहमा थाबीच राह में दुबका स्पर्श भी तोबुरी तरह से सहम गया था..
आज फिर जबकि तुम सामने होबेचैन हैं स्पर्श
lajawaab likha hai aapne. hatts off.
ek dam dil me utar gayi apki ye rachna.
badhayi.

Babli said...

बहुत सुंदर भाव के साथ आपने उम्दा रचना लिखा है! हर एक पंक्तियाँ दिल को छू गई! ५० वी पोस्ट के लिए हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें!

Jyoti Verma said...

bahut sundar rachana, sundar soch, sundarata ke sath sparsh kar gayi...

Suman said...

nice............nice..........nice........

kshama said...

Sahamna adatan jo ho jata hai!
Ekek pankti dohrane layaq hai!

Devendra said...

सहज अभिव्यक्ति दिल को छू लेने वाली
वो अंग्रेजी में कहते हैं न टचिंग।

Vandana ! ! ! said...

bahut hi sundar!!!!!!!!!!

क्रिएटिव मंच said...

जबकि तुम सामने हो बेचैन हैं स्पर्श,
पर आतुर नहीं है
आखिर बार-बार सहमने की आदत जो नहीं है

खूबसूरत कविता
पचासवीं रचना पर बहुत बधाई
शुभ कामनाएं



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Reetika said...

kal bhi to aisa hi hua tha, neend mein bhi tumne jab chhua tha, girte girte baahon mein bachi main, sapne pe paaon pad gay tha..

bas barbas Gulzar saheb yaad aa gaye ! umda !!

संजय भास्कर said...

वर्मा जी, आपने तो हमें भी उन खूबसूरत पलों की याद दिला दी।

संजय भास्कर said...

इस खूबसूरत मखमली कविता के लिए
बधाई स्वीकार करें।