Saturday, November 14, 2009

इस वारदात में मेरा कोई हाथ नहीं है ~~


~~

इस वारदात में

मेरा कोई हाथ नहीं है

क्योंकि,

जिस समय यह वारदात घटी

मैं अपने अपनों के बीच था

अपने सुमधुर और सलोने

मासूम से -

सपनों के बीच था।


मैने तो

एक अरसा पहले

थमायी थी बन्दूकें

मचलते हुए उन

अबोधों; दुधमुहों को

ताकि वे बहल जायें

मैनें तो

उन्हें इन बन्दूकों को

चलाना भी नहीं सिखाया था.


नफरत के शोलों से

इन्हें, इन बन्दूकों ने ही

रूबरू करवाया होगा

ये सारी साज़िशें

इन बन्दूकों की ही लगती है

क्योंकि,

वारदात के समय

पंचतारा होटल के

'स्विमिंग पुल' में

मैं निर्वस्त्र मछलियाँ

पकड़ रहा था


अब तो यकीनन

यकीन हो गया होगा

कि इस वारदात में

मेरा कोई हाथ नहीं है.

~~

48 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

मैं अपने अपनों के बीच था
अपने सपनो के बीच था

बहुत सुन्दर वर्मा साहब ! तीर निशाने पर मारा आपने !

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

बहलाने के लिए आपने बंदूख पकड़ाई थी उनको..कोई और खिलौना नहीं....?

कविता अच्छी है..यकीनन..

रश्मि प्रभा... said...

ek teer se do shikaar

ओम आर्य said...

बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने ........बहुत ही गहरे उतार दिया आपने!

आशीष कुमार 'अंशु' said...

बहुत बहुत सुन्दर...

Rakesh said...

wah
vermaji
wah
kya kaha hai aapne ....kitne abodh hote hai apradhi jab pakde jate hai ....banduk thamane wale hamesha bachte rehe hai ....nayi nayi machaliya jaal mein late hai naye naye logo ki fauj khadi kerte hai ..aur khood bahut door se tamasha dekhte hai...wah maza aaya aapko padhker ...bahut hi gehri nazar hai....

राज भाटिय़ा said...

मैं अपने अपनों के बीच था
अपने सपनो के बीच था
बहुत गहरेभाव लिये है आप की यह रचना.
धन्यवाद

महफूज़ अली said...

ये सारी साज़िशें इन बन्दूकों की ही लगती है क्योंकि, वारदात के समय पंचतारा होटल के 'स्विमिंग पुल' में मैं निर्वस्त्र मछलियाँ पकड़ रहा था
अब तो यकीनन यकीन हो गया होगा कि इस वारदात में मेरा कोई हाथ नहीं है.

bahut hi gahre bhaav ke saath....sunder panktiyan....


dhanyawaad...

अजय कुमार said...

नकाबपोशों का नकाब अच्छी तरह उतरा आपने

डॉ टी एस दराल said...

वर्मा जी, कविता के भाव तो बहुत गहरे हैं.
लेकिन इस प्यारे से जोड़े के हाथ में पिस्टल, ये तो बड़ी नाइंसाफी है, दो प्यार करने वालों के साथ.

Nirmla Kapila said...

मगर खेल खेल मे ही क्या कुछ हो जाता है बहुत सुन्दर रचना है आभार्

cmpershad said...

बढिया भावुक कविता। आज के बच्चों में बन्दूक के खिलौने, वीडियो गेम्स में लडाई झगडे, टी वी पर वोयलेंस.... ये सभी तो बच्चों की मासूम मानसिकता को बन्दूक पकडाने के लिए उकसाते हैं॥

shikha varshney said...

wah kya nishana sadha hai aapne ..seedha point par jakar laga hai...badhai aapko or pic bhi bahut achchi lagai hai.

creativekona said...

इस वारदात में
मेरा कोई हाथ नहीं है क्योंकि,
जिस समय यह वारदात घटी
मैं अपने अपनों के बीच था
अपने सुमधुर और सलोने
मासूम से - सपनों के बीच था।

बहुत धार दार कविता है आपकी। हार्दिक बधाई।
हेमन्त कुमार

MANOJ KUMAR said...

यह रचना अपनी एक अलग विषिष्ट पहचान बनाने में सक्षम है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर अभिव्यक्ति!

Dipak 'Mashal' said...

सत्य उद्घाटित करने वाली व्यंग्य कविता है इसबार आपकी... चित्र भी खूबसूरत और सटीक चुना है वर्मा जी...
जय हिंद...

दिगम्बर नासवा said...

मैने तो एक अरसा पहले
थमायी थी बन्दूकें मचलते हुए उन अबोधों;
दुधमुहों को
ताकि वे बहल जायें
मैनें तो उन्हें इन बन्दूकों को
चलाना भी नहीं सिखाया था ...

VERMA JI ... AAPKE VYANG KI DHAAR TEEKHI HAI ... ISHAARE HI ISHAARE EIN AAPNE GAHRI BAAT KEH DI HAI ... MUDDATON PAHLE JO KHOONI KHEL SHURU HUVA THA .... AAJ APNI JAWAANI PAR HAI ...
THINKS ARE OUT OF CONTROL NOW ...

BAHOOT HI LAJAWAAB KAVITA HAI ...

वन्दना said...

ek katu satya ko aaina dikha diya........aapki har rachna insaan ko sochne ko badhya kar deti hai.........badhayi

योगेश स्वप्न said...

BAHUT UMDA LIKHA HAI VERMA JI.

Devendra said...

करारा व्यंग्य है आपकी कविता में...
वे कितने मासूम बन जाते हैं
वारदात के बाद
जो रखते हैं
वारदात की नींव!
-अच्छी कविता।

खुशदीप सहगल said...

वर्मा जी,
पहले ये बताइए आप पूरी तरह स्वस्थ हैं न...चोट ज़्यादा तो नहीं आई...दुर्घटना के वक्त और तो कोई साथ नहीं था...कृपया अपना ध्यान रखिए...ऊपर वाले ने चाहा तो फिर किसी ऐसी दिलों की महफिल में आपसे रू-ब-रू होने का सौभाग्य मिलेगा...आपने रिपोर्ट को सराहा...आभार...

जय हिंद...

MUFLIS said...

इस वारदात में मेरा कोई हाथ नहीं है क्योंकि,
मैने तो एक अरसा पहले थमायी थी बन्दूकें मचलते हुए उन अबोधों; दुधमुहों को ताकि वे बहल जायें मैनें तो उन्हें इन बन्दूकों को चलाना भी नहीं सिखाया था......
waah ,,,,
aisaa khoobsurat lekin kadwaa sach
aur wo bhi itne km shabdoN meiN
aapki kaavya-kushaltaa ko
naman kehtaa hooN

श्याम कोरी 'उदय' said...

... प्रसंशनीय रचना !!!!

वाणी गीत said...

इस वारदात में सचमुच इनका कोई हाथ नहीं ...जैसे देश की बर्बादी में नेताओं का नहीं ...
शानदार व्यंग्य ...!!

usha rai said...

vrma ji ! bahut sunder vyngy rcha hai aapne ! aapka blog to smkalin kvita ka sashkt dstavej hai ! bahut bahut badhai !sundr tippni ke liye dhnywad !

Babli said...

नफरत के शोलों से
इन्हें, इन बन्दूकों ने ही
रूबरू करवाया होगा
ये सारी साज़िशें
इन बन्दूकों की ही लगती है॥
दिल की गहराई से आपने बेहद सुंदर रचना लिखा है! बहुत बढ़िया लगा! तस्वीर तो बहुत ही सुंदर है!

Jyoti Verma said...

bahut sundar, bahut gahari baat kari hai apne, fake 'swimming pool' me fish pakadna badi sachchi baat kahi hai apne...

शिवम् मिश्रा said...

वर्मा जी ,
नमस्कार !
खुशदीप भाई की पोस्ट से पता चला ...............अब आप कैसे है ?
आपके पूरी तरह स्वस्थ होने की शुभकामनाएं !
आपका
शिवम् मिश्रा
मैनपुरी, उत्तर प्रदेश

शोभना चौरे said...

`koi bhi kahan sweekarta hai ?ki mera vardat me hath nhi tha .
achha kataksh.

sada said...

मैं अपने अपनों के बीच था
अपने सपनो के बीच था

बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

Prem said...

vबहुत अर्थ पूर्ण रचना ,शुभकामनायें ।

शरद कुमार said...
This comment has been removed by the author.
शरद कुमार said...

Bahut hi rochak rachana eske liye apko bahut-2 bdhai....

विनोद कुमार पांडेय said...

बंदूक पकड़ाना भी कम गुनाह नही होता है..वर्मा जी बेहतरीन कहे तो उचित होगा कविता के साथ साथ एक बढ़िया प्रहार कुछ सामाजिकता का स्वांग रचने वाले व्यक्तियों पर..बहुत बहुत बधाई

शरद कोकास said...

बहुत बढ़िया वर्मा जी । यह बच्चे भी चूज़ो जैसे हे तो है जिनके हाथ् मे बन्दूक है ।

Sudhir (सुधीर) said...

वर्मा जी ऐसा लगता हैं कि डेविड हेडली और राणा की स्वीकारोक्ति दर्ज कर दी हो आपने इन पंक्तियों में...

अच्छी रचना

Science Bloggers Association said...

क्या बात करते हैं आप, हमें तो पूरा विश्वास है कि आपका ही हाथ है। तभी तो आप सफाई दे रहे हैं।
ह ह हा।
चित्र और कविता दोनों बहुत सुंदर।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Harkirat Haqeer said...

क्योंकि वारदात के समय
पंचतारा होटल के
स्विमिंग पूल में
मैं निर्वस्त्र मछलियाँ
पकड रहा था

जी वर्मा साहब अब हमें यकीं हो गया आपका वारदात में कोई हाथ नहीं .....बहुत ही लाजवाब....!!

रचना दीक्षित said...

बहुत भावुक कर गयी आपकी ये कृति. बहुत बहुत बहुत बधाई इस सुंदर प्रस्तुती पर

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

Harsh said...

bahut sundra rachna,

महेन्द्र मिश्र said...

सर बहुत ही भावपूर्ण रचना . आभार

अर्कजेश said...

सटीक व्‍यंग ।

ज्योति सिंह said...

bahut badi aur gahri baate hai is rachna me ,manovriti ko bahut sundarta se ubhara hai
मैं अपने अपनों के बीच था
अपने सपनो के बीच था
bahut badhiya

रवि कुमार, रावतभाटा said...

बेहतर...

मासूमियत से आपने कविता को पंचतारा होटलों के स्वीमिंग पूल में ले जा पटका है...

जहां पर हर वारदात का हाथ अटका है...

लता 'हया' said...

आपके कमेन्ट के लिए शुक्रिया , आपकी रचना 'इसमें मेरा कोई हाथ नहीं है ' मेरे बंदूक़ वाले शेर की ही तस्दीक़ करता प्रतीत होता है ; सबका है ANDAZ APNA APNA .

अर्शिया said...

बहुत सुंदर।
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11वाँ राष्ट्रीय विज्ञान कथा सम्मेलन।
गूगल की बेवफाई की कोई तो वजह होगी?