बुधवार, 29 जुलाई 2009

पहलू में आग ---- !


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खु़द के पहलू में आग रखा करो
शफ्फ़ाक़ वज़ूद है दाग़ रखा करो

बहुत भरोसा मत करो ज़माने पर
साथ अपने एक नाग रखा करो

धूप से दोस्ती कर ली तुमने तो
एहसासों में अपने बाग़ रखा करो

कोई और हिसाब क्यूँ रखेगा भला
खु़द अपना गुणा-भाग रखा करो

ज़ेहन की नसें फटें क्यूँ शोर से
शिराओं में भैरव राग रखा करो

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बुधवार, 22 जुलाई 2009

गहराइयाँ लबालब -----




किसी की निगाहों से उतर गया पानी
किसी की निगाहों में ठहर गया पानी

कतरा-कतरा ओस मोती बन गया था
हवा के एक झोके से बिखर गया पानी



कब तक रहोगे हालात के गिरफ्त में
उठो, देखो तो सर से ऊपर गया पानी

फसल चीखते रहे नहीं बरसा, जालिम
जब बरसा तो बेपानी कर गया पानी

ताकि प्यास बुझ सके इस शहर की
पाईपों से हो-होकर हर-घर गया पानी

क्यूं बेवक्त हो रहे हो वक्त से पहले तुम
कह दो कि अन्दर का मर गया पानी

छुपाया तल्खियां पर निगाह का पानी
दूध का दूध, पानी का कर गया पानी

सारी रात रह-रह कर बरसात हुई है
गहराईयों में लबालब भर गया पानी


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बुधवार, 15 जुलाई 2009

ज़ज्बात फुनगियों पर ---



ज़ख्म क्यों हैं डरे -डरे, दर्द दिखलाते नहीं हैं

रूह में पैबस्त हैं ये जिस्म पर आते नहीं हैं



रोटियों से महरूम हैं रोज़ा तो लाजिमी है

कौन कहता है हम इन दिनों खाते नहीं हैं



लुट गए इनके साज़ इस शहर में आकर

गुमसुम हैं इसलिए आजकल गाते नहीं हैं



बानगी है ये तो अभी सिलसिला चलेगा

तलहटी तलक डूबे हैं ये उतराते नहीं हैं



बामुश्किल जो हुए हैं ज़िन्दगी से रूबरू

मौत की झलकियाँ उन्हें दिखलाते नहीं हैं



कोख के नाम कर रहे व्यथा की वसीयत

अपने किए पर मगर ये शरमाते नहीं हैं



अस्मत के लूटेरे और शर्मो-हया की बातें

ज़ज्बात को फुनगियों पर टिकाते नहीं हैं

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बुधवार, 8 जुलाई 2009

मुस्कराहट का मुखौटा ---!!!



सांझ ढलते ही दोपहर देखा है
जब से निगाहों में खंडहर देखा है

इतने आत्मघाती जज़्बात हो गये
लहरों पे तिरता ये शहर देखा है

चौराहे खडे़ हैं उफ! खंजर लेकर
उनके रिसाले का असर देखा है

पूछना मत पता किसी
शख्स का
हर एक को मैंने दर-बदर देखा है

खूब बिकेगा मुस्कराहट का मुखौटा
सिसकता हुआ चेहरा घर-घर देखा है

मासूम चेहरों पर यकीन करें कैसे
वहशियों का मैंने जब कहर देखा है

दरख्त छांव देने से मना कर रहे
नज़र ए आफताब में ज़हर देखा है

शनिवार, 4 जुलाई 2009

खुर्राट आए हैं ----- ! !



ज़िन्दगी को जड़ से काट आए हैं
मुर्दों के शहर में दवा बांट आए हैं

इन्हें गुमान है अपने बड़प्पन का
बच्चों की हँसी तक डांट आए हैं

घर से ये बाहर निकलते ही नहीं
बहुत सुना था कि खुर्राट आए हैं

इन्हें भी अपने गुनाह धोने हैं
इसीलिए तो ये गंगा-घाट आए हैं

फिर वही तालाब खोदा जाएगा
काग़ज़ों में जिसको पाट आए हैं

बुधवार, 1 जुलाई 2009

मनचली है ---- ! !




बाहु ही नहीं हैं जो बाहुबली हैं
ऐसे फितरती तो गली-गली हैं


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माली तैयार बैठे हैं तोड़ने को
खिलने को आतुर जो कली हैं


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कल ही ब्याह कर आयी थी
देखिये वो आज अधजली है


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श्वासों पर भी पहरा है उसके
जिसे कहते हैं नाज़ों पली है


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हँस कर दो बोल वो बोली
सभी कहने लगे मनचली है


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चित्र : साभार गूगल सर्च