बुधवार, 15 जुलाई 2009

ज़ज्बात फुनगियों पर ---



ज़ख्म क्यों हैं डरे -डरे, दर्द दिखलाते नहीं हैं

रूह में पैबस्त हैं ये जिस्म पर आते नहीं हैं



रोटियों से महरूम हैं रोज़ा तो लाजिमी है

कौन कहता है हम इन दिनों खाते नहीं हैं



लुट गए इनके साज़ इस शहर में आकर

गुमसुम हैं इसलिए आजकल गाते नहीं हैं



बानगी है ये तो अभी सिलसिला चलेगा

तलहटी तलक डूबे हैं ये उतराते नहीं हैं



बामुश्किल जो हुए हैं ज़िन्दगी से रूबरू

मौत की झलकियाँ उन्हें दिखलाते नहीं हैं



कोख के नाम कर रहे व्यथा की वसीयत

अपने किए पर मगर ये शरमाते नहीं हैं



अस्मत के लूटेरे और शर्मो-हया की बातें

ज़ज्बात को फुनगियों पर टिकाते नहीं हैं

.

31 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

बहुत ही बढिया ......एक खुबसूरत रचना....बधाई

कडुवासच ने कहा…

रोटियों से महरूम हैं रोज़ा तो लाजिमी है
कौन कहता है हम इन दिनों खाते नहीं हैं
... बहुत खूब !!!!

ktheLeo (कुश शर्मा) ने कहा…

अस्मत के लूटेरे और शर्मो-हया की बातें.....

वाह क्या बात है,सुन्दर है,बधाई.

मैं अगर कुछ कहूं तो इतना ही के,

"हंस हंस के जला देते है,रिश्तों की लाश को,
ये लोग हैं के, चलते फ़िरते श्मशान है."

पूरी बात नीचे दिये Link पर पढने का कष्ट करें.

http://sachmein.blogspot.com/2009/01/blog-post_11.html

USHA GAUR ने कहा…

अस्मत के लूटेरे और शर्मो-हया की बातें
ज़ज्बात को फुनगियों पर टिकाते नहीं हैं
बहुत सुन्दर, हर शेर मे वजन, शानदार

अमिताभ मीत ने कहा…

ज़ख्म क्यों हैं डरे डरे ......

बहुत ही बढ़िया है.

Asha Joglekar ने कहा…

बहुत खूबसूरत शेर कहते हैं आप और ये तो कमाल है।

रोटियों से महरूम हैं रोज़ा तो लाजिमी है
कौन कहता है हम इन दिनों खाते नहीं हैं ।

Razia ने कहा…

कोख के नाम कर रहे व्यथा की वसीयत
अपने किए पर मगर ये शरमाते नहीं हैं
वाकई यह व्यथा की वसीयत है. बहुत सुन्दर शेर.
बहुत खूब

Vinay ने कहा…

ख़ूबसूरत अशआर से सजी उम्दा ग़ज़ल
--------------]
गुलाबी कोंपलें · चाँद, बादल और शाम

रंजना ने कहा…

बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल....हर शेर दिल में उतर गए वाह !!!

सदा ने कहा…

रोटियों से महरूम हैं रोज़ा तो लाजिमी है
कौन कहता है हम इन दिनों खाते नहीं हैं ।

बहुत ही गहरे भावों के साथ हर शब्‍द को व्‍यक्‍त करती हुई सशक्‍त रचना के लिये बधाई ।

Urmi ने कहा…

बहुत ही ख़ूबसूरत और उम्दा ग़ज़ल लिखा है आपने जो दिल में उतर गई!

Prem Farukhabadi ने कहा…

रोटियों से महरूम हैं रोज़ा तो लाजिमी है
कौन कहता है हम इन दिनों खाते नहीं हैं

bahut hi sundar!

adwet ने कहा…

सचमुच काफी अच्छे भाव बने हैं। बधाई।

shama ने कहा…

Asmat ke lutere hee sharmo haya kee baaten karte hain..!
Rachana kaushaly ke baareme kuchh kahun,ye qabiliyat nahee..!

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anil ने कहा…

बहुत बढ़िया सुन्दर रचना आभार !

रंजू भाटिया ने कहा…

कोख के नाम कर रहे व्यथा की वसीयत
अपने किए पर मगर ये शरमाते नहीं हैं

बहुत ही बढ़िया लिखा है आपने ..बहुत खूब

* મારી રચના * ने कहा…

रोटियों से महरूम हैं रोज़ा तो लाजिमी है
कौन कहता है हम इन दिनों खाते नहीं हैं

wah kya khub kaha....

गुंजन ने कहा…

वर्मा जी,

एक नई साहित्यिक पहल के रूप में इन्दौर से प्रकाशित हो रही पत्रिका "गुंजन" के प्रवेशांक को ब्लॉग पर लाया जा रहा है। यह पत्रिका प्रिंट माध्यम में प्रकाशित हो अंतरजाल और प्रिंट माध्यम में सेतु का कार्य करेगी।

कृपया ब्लॉग "पत्रिकागुंजन" पर आयें और पहल को प्रोत्साहित करें। और अपनी रचनायें ब्लॉग पर प्रकाशन हेतु editor.gunjan@gmail.com पर प्रेषित करें। यह उल्लेखनीय है कि ब्लॉग पर प्रकाशित स्तरीय रचनाओं को प्रिंट माध्यम में प्रकाशित पत्रिका में स्थान दिया जा सकेगा।

आपकी प्रतीक्षा में,

विनम्र,

जीतेन्द्र चौहान(संपादक)
मुकेश कुमार तिवारी ( संपादन सहयोग_ई)

स्वप्न मञ्जूषा ने कहा…

रोटियों से महरूम हैं रोज़ा तो लाजिमी है
कौन कहता है हम इन दिनों खाते नहीं हैं
bahut khoob..
zabardast..

admin ने कहा…

कोख के नाम कर रहे व्यथा की वसीयत
अपने किए पर मगर ये शरमाते नहीं हैं

Bahut badhiya prastuti. Badhaai

vikram7 ने कहा…

बहुत खुबसूरत रचना बधाई

ज्योति सिंह ने कहा…

बानगी है ये तो अभी सिलसिला चलेगातलहटी तलक डूबे हैं ये उतराते नहीं हैं

ज़ख्म क्यों हैं डरे -डरे, दर्द दिखलाते नहीं हैंरूह में पैबस्त हैं ये जिस्म पर आते नहीं हैं.
bahut hi khoob ,behatrin .

सुनीता शानू ने कहा…

रोटियों से महरूम हैं रोज़ा तो लाजिमी है
कौन कहता है हम इन दिनों खाते नहीं हैं ।
बहुत सुन्दर! बहुत ही उम्दा ग़ज़ल है...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

रोटियों से महरूम हैं रोज़ा तो लाजिमी है
कौन कहता है हम इन दिनों खाते नहीं हैं

सुन्दर रचना के लिए बधाई।

Harshvardhan ने कहा…

bahut sundar rachna hai.......

Dr. Ravi Srivastava ने कहा…

bahut sundar bhaav......रोटियों से महरूम हैं रोज़ा तो लाजिमी है
कौन कहता है हम इन दिनों खाते नहीं हैं
... बहुत खूब

zindagi ki kalam se! ने कहा…

bahut umda!

प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' ने कहा…

"रोटियों से महरूम हैं रोज़ा तो लाजिमी है
कौन कहता है हम इन दिनों खाते नहीं हैं"
बहुत ही बढिया रचना....बहुत बहुत बधाई''

shama ने कहा…

Uff ! Is rachna pe kya kaha jay? Aur khaas kar tab, jab aise,aise diggaj kah gaye hon...!

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शारदा अरोरा ने कहा…

ज़ख्म क्यों हैं डरे -डरे, दर्द दिखलाते नहीं हैं
रोटियों से महरूम हैं रोज़ा तो लाजिमी है
कौन कहता है हम इन दिनों खाते नहीं हैं
बामुश्किल जो हुए हैं ज़िन्दगी से रूबरू
मौत की झलकियाँ उन्हें दिखलाते नहीं हैं
ye sher to khaskar bahut pasand aaye .

प्रज्ञा पांडेय ने कहा…

बहुत सुंदर रचनाएँ हैं आपकी .. त्रासदी भरे समय में कविता मनोबल बढाती है .इससे बढ़ कर क्या बात हो सकती है