उस दिन जब तुम
तुम बैठी थी
मेरे इसी बिस्तर पर
तुम प्रतीक्षा कर रही थी
मेरे स्पर्श की
और मैं भी काँपते हाथों से
तुम्हें छू लेना चाहता था
सहसा
पर्दे हिलकर अपनी उपस्थिति का
एहसास देने लगे थे
खिड़कियाँ कौतूहलवश कमरे के अन्दर
झाँकने लगी थी
कोने में उलटा लटका
अदना सा मकड़ा भी
मुस्कराने लगा था
याद है तुम्हें
पंखा भी उस दिन
अपेक्षाकृत तेज चलने लगा था.
और सहम गयी थी तुम
मैं भी तो सहमा था
बीच राह में दुबका स्पर्श भी तो
बुरी तरह से सहम गया था.
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आज फिर
जबकि तुम सामने हो
बेचैन हैं स्पर्श,
पर आतुर नहीं है
आखिर बार-बार सहमने की
आदत जो नहीं है
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ज़ज्बात पर मेरी 50वी रचना.


