Thursday, May 14, 2009

बिस्तरों पर अजगर ------

समुंदर में वे पूरा शहर रखते हैं

हालात पर फिर नज़र रखते हैं


मरीज़ की हालत सुधरे भी कैसे

दवा की जगह वे ज़हर रखते हैं


कर रहे हैं होशों-हवास का दावा

जो कदम इधर, कभी उधर रखते हैं


हर बात में सूखे पत्ते सा कांपते हैं

जो कहते हैं शेर का जिगर रखते हैं


बड़े फख्र से फिर वही दुहराते हैं

दाव में बीबी-बच्चे, घर रखते हैं


वे ही मिलेंगे ख़बरों की सुर्खियों में

जो सारे ज़हान की ख़बर रखते हैं


सोते रहोगे कब तक, देखो तो

बिस्तरों पर वे अजगर रखते हैं

5 comments:

SWAPN said...

bahut khoob, verma ji, behatareen.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

वर्मा जी, यकीन मानिए आपकी हर गजल लाजवाब होती है।

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ओझा उवाच: यानी जिंदगी की बात...।
नाइट शिफ्ट की कीमत..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

हर बात में सूखे पत्ते सा कांपते हैं
जो कहते हैं शेर का जिगर रखते
वे ही मिलेंगे ख़बरों की सुर्खियों में
जो सारे ज़हान की ख़बर रखते हैं

बहुत सटीक गज़ल ...

Kuldeep Thakur said...


सुंदर प्रस्तुति...
मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक 05-07-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल पर भी है...
आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाएं तथा इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और नयी पुरानी हलचल को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी हलचल में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान और रचनाकारोम का मनोबल बढ़ाएगी...
मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।



जय हिंद जय भारत...


मन का मंथन... मेरे विचारों कादर्पण...

Pratibha Verma said...


बहुत खूब।